बाबा तामेश्वरनाथ धाम मंदिर: माता कुंती ने की थी शिवलिंग की स्थापना; भगवान बुद्ध ने कराया था मुंडन

संत कबीर नगर में स्थित प्राचीन तामेश्वरनाथ मंदिर एक महत्वपूर्ण आस्था केंद्र है. महाभारत काल से संबंधित इस मंदिर में पांडवों की माता कुंती ने शिवलिंग स्थापित किया था, यह भगवान बुद्ध के मुंडन स्थल के रूप में भी प्रसिद्ध है. महाशिवरात्रि पर मुंडन और जलाभिषेक के लिए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है.

संत कबीर नगर जनपद मुख्यालय खलीलाबाद से मात्र सात किलोमीटर की दूरी पर स्थित देवाधिदेव महादेव बाबा तामेश्वरनाथ मंदिर (तामेश्वरनाथ धाम) की महत्ता अन्नत (आदि) काल से चली आ रही है. वर्तमान में भी इस स्थान की महिमा और आस्था का केन्द्र होने के कारण भक्तों का तांता लगा रहता है.
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यही वह स्थान है जहां क़रीब ढाई हज़ार वर्ष पूर्व दुनिया में बौद्ध धर्म का संदेश का परचम लहराने वाले महात्मा बुद्ध ने मुण्डन संस्कार कराने के पश्चात अपने राजश्री वस्त्रों का परित्याग कर दिया था. भगवान बुद्ध के यहां मुण्डन संस्कार कराने के नाते यह स्थान मुंडन के लिए प्रसिद्ध है.
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जनश्रुति के अनुसार, यह स्थल महाभारत काल में महाराजा विराट के राज्य का जंगली इलाका रहा. यहां पांडवों का वनवास क्षेत्र रहा है और अज्ञातवास के दौरान कुंती ने पांडवों के साथ यहां कुछ दिनों तक निवास किया था. इसी स्थल पर माता कुंती ने शिवलिंग की स्थापना की थी, यह वही शिवलिंग है.
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इसके बाद इस स्थान की महत्ता दिन-प्रतिदिन बढ़ती गयी और कालांतर में यह ताम्रगढ़ बांसी नरेश राज्य में आ गया. जिन्होंने यहां पर आने वाले श्रद्धालुओं की भारी तादाद को देखते हुए मंदिर का निर्माण कराया. यहां शिव आराधना के लिए दूर-दराज के भक्त आते हैं और बच्चों का मुंडन कराने की परंपरा है.
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बांसी के राजा ने क़रीब डेढ़ सौ साल पहले मंदिर की पूजा अर्चना के लिए गोरखपुर के हरनही के समीप जैसरनाथ गांव से गुसाई परिवार बुलाकर जिम्मदारी सौंप दी. तबसे उनके वंशज पूजा पाठ का जिम्मा संभाल रहे हैं. उनके पूर्वजों में एक बुजुर्ग ने मंदिर के सामने जीवित समाधि ले ली थी, वे सिद्ध व्यक्ति थे. उनकी समाधि पर आज भी शिवार्चन के बाद गुड़भंगा चढ़ाया जाता है.
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यह मंदिर आठ फुट ऊंचे चबूतरे पर बना हुआ है. इससे प्राचीन मंदिर परिसर में छोटे-बड़े नौ और सटे ही 5 अन्य मंदिर है. इनमें एक मंदिर मुख्य मंदिर के ठीक सामने है देवताओं का नहीं देव स्वरूप उस मानव का है जिसने जीते जीई यहां पर समाधि ले ली थी. लोग कहते हैं कि वह समय-समय पर उपस्थित होकर विघ्र बाधा और कठिनाईयों का निराकरण करते हैं.
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देव स्वरूप उस मानव को गोस्वामी बुझावन भारती बाबा के नाम से पुकारा जाता है. इन्हीं के वंशज यहां के गोस्वामी भारतीगण है, जो बाबा तामेश्वरनाथ मंदिर की देखभाल करते है. इस स्थान का नाम ताम्रगढ़ और बाद में तामा पड़ा. तामा गांव के उत्तर दो बड़े तालाब थे. इसे लठियहवां और झझवा नाम से कहते हैं.
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वर्ष में तीन बार यहां विशाल मेला लगता है जिसमें ज़िले ही नहीं पूरे पूर्वांचल के लोग जुटकर जलाभिषेक करते है. इस स्थान पर देश विदेश के संतों और महात्माओं ने अनुष्ठान एवं सत्संग के आयोजन किए है. स्वामी करपात्रीजी, जगद्गुरु शंकराचार्य अभिनव विद्यार्थी जी महाराज, महर्षि देवरहवा बाबा आदि महापुरुषों ने इस मंदिर पर आकर पूजा अर्चना की है.
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