100 साल बाद भी वही स्वाद, सरहद पार बढ़ी मुरादाबादी बिरयानी की डिमांड; जानें क्यों है खास

मुरादाबाद की आलम बिरयानी की लोकप्रियता देश के साथ-साथ विदेशों में भी है. इसे बनाने में अब भी वही नुस्खा इस्तेमाल जाता है जो 100 साल पहले अपनाया गया था. यही वजह है तब से लेकर अब तक इसके खुशबू और स्वाद में कोई कमी नहीं आई है.

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मुरादाबाद की गलियों से निकलकर सात समंदर पार अपनी खुशबू बिखेरने वाली ‘आलम बिरयानी’ आज किसी पहचान की मोहताज नहीं है. तकरीबन एक सदी पहले हाजी अब्दुल गफ्फार का शुरू किया गया था, यह जायका आज मुरादाबाद की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है.
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आलम बिरयानी की सबसे बड़ी खासियत इसका 100 साल पुराना पारंपरिक नुस्खा है. इस बिरयानी में साबुत मसालों, दूध, दही और नींबू के रस देखने को मिलता है, आज यह ब्रांड इतना लोकप्रिय हो चुका है कि दुनिया के अलग अलग इलाके से मुरादाबाद की बिरयानी का लुत्फ उठाने के लिए लोग आते हैं.
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संचालक जहीर आलम के नेतृत्व में यह विरासत न केवल कायम है, बल्कि गुणवत्ता और स्वाद के मामले में आज भी उतनी ही उम्दा है जितनी 100 साल पहले थी. अपनी सादगी और बेहतरीन खुशबू के कारण यह बिरयानी नॉनवेज प्रेमियों की पहली पसंद बनी हुई है.
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​मुरादाबाद में आलम बिरयानी की नींव हाजी अब्दुल गफ्फार ने रखी थी, जो मशहूर खानसामा जहीर आलम के पिता थे. 35 साल पहले इस जायके को ‘आलम बिरयानी’ के नाम से नई पहचान मिली. इसे बनाने में वही पुरानी विधि अपनाई जाती है, जिसमें लौंग, जावित्री, जायफल और सौंफ जैसे साबुत मसालों का प्रयोग होता है.
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हसनैन ने बताया वे गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं करते हैं. यही कारण है कि उनके नाम से आज देश भर में आउटलेट्स चल रहे हैं. यह बिरयानी केवल भोजन नहीं, बल्कि एक खानदानी विरासत है. इसी वजह 100 साल बीत जाने के बाद भी इसकी डिमांड लोगों के बीच बनी हुई है.
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बता दें कि आलम बिरयानी की दिल्ली, लखनऊ और पंजाब जैसे राज्यों के अलावा दुबई, कतर, ओमान और सऊदी अरब में भी डिमांड होती है. यहां से भी लोग इस दुकान पर बिरयानी का लुत्फ उठाने आते हैं और स्वाद की तारीफ करते हैं.
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