काशी में जन्मे कबीर ने अपने अंत समय के लिए मगहर को क्यों चुना था? यहां जानें
कबीर दास के काल में लोगों के बीच एक भ्रम ये था कि जिसकी मृत्यू मगहर में होती है वह गधा होता है, जो काशी मरता है वह स्वर्ग में जाता है. उन्होंने इस भ्रम मिटाने का प्रयास किया.इसी कारण कबीर दास अपने जीवन के अंत समय में मगहर चले आए थे.
कबीर स्थली के नाम से प्रसिद्ध संत कबीर नगर यूपी का एक विशिष्ट और ऐतिहासिक जिला है. इस जिले का नाम महान संत, निर्गुण भक्ति परंपरा के प्रवर्तक, कवि और समाज सुधारक संत कबीर दास के नाम पर रखा गया है. यह जिला संत कबीर के जीवन, उनकी साधना और उनके ओजस्वी विचारों से गहराई से जुड़ा हुआ है, जिसके कारण इसे विशेष आध्यात्मिक पहचान प्राप्त है.
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औपचारिक शिक्षा से दूर रहने के बावजूद कबीर की वाणी में गहन आध्यात्मिक ज्ञान और सामाजिक चेतना स्पष्ट झलकती है. उन्होंने गुरु रामानंद को अपना मार्गदर्शक माना और निर्गुण भक्ति के माध्यम से सत्य और ईश्वर की खोज का मार्ग पर आगे बढ़ते रहे. कबीर ने ज्ञान के आडंबर और दिखावे पर प्रहार करते हुए कहा था कि-“पोथी पढ़-पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय. ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय”. इस दोहे के माध्यम से उन्होंने प्रेम, करुणा और मानवीय संवेदना को सच्चे ज्ञान का आधार बताया.
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कबीर दास ने काशी से मगहर तक की यात्रा समाज में प्रचलित उस धारणा को तोड़ने के लिए की जिसके मुताबिक लोग कहते थे कि काशी में मृत्यु होने से मोक्ष और मगहर में मृत्यु होने से नरक मिलता है. संत कबीर ने अपने जीवन के अंतिम समय में काशी त्यागकर मगहर को अपना निवास बनाया. उनका मानना था कि मुक्ति स्थान से नहीं, बल्कि कर्म और भक्ति से मिलती है. बता दें मगहर के इस स्थान को कई लोग कबीर चौरा के नाम से भी जानते हैं. यह आज देश-विदेश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों के लिए आस्था का केंद्र है.
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कबीर दास ने जाति-पाति, ऊंच-नीच और सामाजिक भेदभाव का खुलकर विरोध किया. उन्होंने मानव को मानव से जोड़ने का संदेश देते हुए कहा था कि“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान. मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान”.उनका यह संदेश आज भी सामाजिक समरसता और समानता की प्रेरणा देता है.
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कबीर के शरीर त्यागने के बाद, हिंदू शिष्य दाह संस्कार चाहते थे और मुस्लिम शिष्य दफनाने पर अड़े थे, जिससे विवाद हो गया. विवाद के बीच, कबीर के शरीर के स्थान पर केवल फूल मिले. आधे फूलों से हिंदू शिष्यों ने समाधि (मंदिर) बनाई और बाकी आधे से मुस्लिम शिष्यों ने मजार (मकबरा) बनाई. दोनों आज भी 100 फीट की दूरी पर स्थित है.
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बता दें कि कबीर दास जी का जन्म तथा स्थान सन्त कबीर दास का जन्म 1398 ई० में काशी मे हुआ था. उनका पालन पोषण नीरू नीमा नामक जुलाहा दाम्पत्ति ने किया था. वहीं, कुछ विद्वानों का मत है कि इनका जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ. लेकिन उसने लोक लाज के कारण कबीर दास को लहर ताश नामक तालाब के किनारे रख दिया था. वहीं, से कबीर दास को मुस्लिम जुलाहा दम्पति ने उठा लिया था. इनका विवाह लोई नामक स्त्री से हुआ. इनकी दो संताने थीं.
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मजार के प्रबंधक ने बताया कि कबीर दास की मृत्यू के बाद यह मजार लगभग 600 वर्ष पहले बनाया गया था. लोगों का भ्रम था कि मगहर में मरता है वह नरक में जाता है जो काशी मरता है वह स्वर्ग में जाता है उसी भ्रम को तोड़ने के लिए कबीर दास ने कहा कि यदि काशी में शरीर छोड़ता हूं तो राम की भक्ति और अल्लाह की इबादत नहीं कर पाएंगे. इससे अच्छा है कि मगहर में चलते हैं जहां राम और अल्लाह की इबादत हो सके.
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संत रामशरण दास प्रधान पुजारी बताया कि कबीर दास के आने से पहले यहां एक आडंबर था कि जो मगर मरता है वह गधा होता है, जो काशी मरता है वह स्वर्ग में जाता है. उन्होंने इस भ्रम मिटाने का प्रयास किया. कबीर दास ने कहा था कि जो राम का भजन करता है और भगवान से प्रेम करता है वह कहीं भी मरता है तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है. फिर चाहे वह काशी मरे या मगहर.