800 साल पुरानी नहीं बीहड़ वाले सैय्यद बाबा की मजार, कोर्ट ने कहा- अवैध कब्जा हटाओ वरना…

इटावा में बीहड़ वाले सैय्यद बाबा की मजार को वन विभाग की अदालत ने अवैध घोषित कर दिया है. इसे आरक्षित वन भूमि पर अतिक्रमण कर बनाया गया था. मजार के 800 साल पुराने होने के दावे को पक्षकार दस्तावेजी सबूतों से साबित नहीं कर पाए. कोर्ट ने तत्काल कब्ज़ा हटाने का आदेश दिया है, न हटाने पर प्रशासन द्वारा कार्रवाई की जाएगी. यह फैसला भारतीय वन अधिनियम 1927 के तहत आया है.

सैय्यद बाबा की मजार

दो महीने चली सुनवाई के बाद आखिरकार इटावा में बीहड़ वाले सैय्यद बाबा के मजार को लेकर वन विभाग की अदालत का फैसला आ गया है. कोर्ट ने इस मजार को पूर्णत: अवैध बताते हुए इसे तत्काल खाली करने के आदेश दिए हैं. कोर्ट ने कहा कि यह मजार आरक्षित वन भूमि पर अवैध तरीके से कब्जा कर बनाई गई है. जबकि कोर्ट में इस मजार के 800 साल पुरानी होने का दावा किया गया. बताया गया कि इस मजार से लोगों की आस्था जुड़ी है. हालांकि पक्षकार इस संबंध में कोई तथ्यात्मक या दस्तावेजी सबूत कोर्ट में पेश नहीं कर पाए.

ऐसे में वन विभाग की अदालत ने फाइनल फैसला सुनाते हुए कहा कि मजार की भूमि वन विभाग की आरक्षित श्रेणी में आती है. इस स्थान पर किसी भी प्रकार का गैर वानिकी कार्य अवैध है. इसलिए यह मजार भी अवैध है. न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि मजार से संबंधित भूमि वर्ष 1916, 1939 और 1946 के गजट में भी आरक्षित वन भूमि बताई गई है. ऐसे में इस भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण या धार्मिक गतिविधि वन विभाग की अनुमति के बिना नहीं की जा सकती.

1800 वर्गफीट में है मजार

अभियोजन पक्ष ने अदालत में बताया कि करीब 1800 वर्गफीट वन भूमि को घेर कर अवैध तरीके से इस मजार का निर्माण किया गया है. इसका उद्देश्य वन भूमि पर कब्जा है. वन विभाग के तर्क का विरोध कर रहे मजार के पक्षकार फजले इलाही को अपना पक्ष साबित करने के पांच मौके दिए गए. सबूत पेश करने को कहा गया, लेकिन सुनवाई के दौरान कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके. ऐसे में कोर्ट ने मजार को नियम विरुद्ध बताते हुए अवैध घोषित कर दिया. इसी के साथ मजार को हटाने के आदेश देते हुए कहा कि ऐसा नहीं करने पर प्रशासन द्वारा हटवा दिया जाएगा.

फर्जी निकला दावा

पक्षकारों के अनुसार इस मजार की पहचान 800 साल से बीहड़ वाले सैय्यद बाबा के नाम से है. यहां हर वर्ष सालाना उर्स का आयोजन होता है. इसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. हालांकि मजार पक्ष इस संबंध में कोई दस्तावेजी सबूत नहीं दे सका. साक्ष्य नहीं पेश कर पाने की स्थिति में कोर्ट ने मजार को अवैध मान लिया. यह पूरी कार्रवाई भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 20 के तहत की गई है.

जनवरी में दर्ज हुआ था वाद

इस मामले की शुरुआत 23 जनवरी को हुई, जब वन रेंजर अशोक कुमार शर्मा ने मजार को आरक्षित वन भूमि पर अवैध बताते हुए ध्वस्तीकरण का वाद दायर किया था. इसके बाद मजार के पक्षकारों को नोटिस जारी किया गया और 5 फरवरी से सुनवाई शुरू हुई. अलग-अलग तारीखों पर पक्षकारों को जवाब दाखिल करने और साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए समय दिया गया. आखिर में कोर्ट ने 17 अप्रैल को अपना निर्णय सुनाया है.

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