अब स्लीपर बसों में ट्रेनों की FDSS डिवाइस, आग लगने पर खुद ही बुझा देगी लपटें
लगातार हो रहे सड़क हादसों के बीच स्लीपर बसों के संचालन में AIS मानक 52 और 119 के उल्लंघन की बात सामने आ रही है. माना जा रहा है कि इसके दुर्घटनाएं भी बढ़ रही हैं. ऐसे में अब मानवाधिकार आयोग ने परिवहन विभाग को इन हादसों को रोकने के लिए स्लीपर बसों के संबंध में कुछ जरूरी निर्देश दिए हैं, जिनका पालन अनिवार्य है.
ठंड की शुरुआत के बाद से ही सड़क हादसों में बढ़ोतरी देखी गई. खासकर बस से जुड़े हादसों में कई लोगों की जान भी गई है ऐसे में सरकार ने स्लीपर कोच बसों को तय मानकों का पालन अनिवार्य कर दिया है. हादसों को लेकर मानवाधिकार आयोग में रिट भी दाखिल किया गया था. आयोग ने इसको लेकर सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ रोड ट्रांसपोर्ट से सुझाव मांगे थे. अब इन सुझावों का पालन कराने का निर्देश यूपी परिवहन विभाग को दे दिया गया है. अगर स्लीपर बसें इनका उल्लंघन करते पाई जाएंगी तो उनके खिलाफ कड़ा एक्शन लिया जाएगा.
इन मानकों का उल्लंघन कर रही हैं स्लीपर बसें
जानकारी के मुताबिक स्लीपर कोच बसें AIS मानक 52 और 119 का उल्लंघन कर रही हैं. इसके चलते लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं. ऐसे में अब मानवाधिकार आयोग के निर्देश के बाद अब बसों में चालकों के लिए बनाया गया अलग से केबिन को हटाया जाएगा. बस में बने फिटेड स्लाइडर को भी निकाला जाएगा. साथ ही स्लीपर कोच में फायर डिटेक्शन एंड सप्रेशन सिस्टम डिवाइस भी (FDSS) लगाया जाएगा. इसके अलावा बसों में 10 किलोग्राम के फायर एक्सटिंग्विशर लगाना जरूरी है. इसके अलावा जिन बसों की बॉडी मानक से ज्यादा बढ़ी हुई है उनके संचालन पर रोक लगाई जाएगी. साथ ही बसों में बस की माप, दरवाजों की स्थिति और आपात निकास के ले आउट से संबंधित मानचित्र लगाए जाएंगे.
परिवहन विभाग को बसों का फिटनेस जांचने का निर्देश
परिवहन विभाग को मानवाधिकार आयोग की तरफ से स्लीपर बसों को ऑफिस बुलाकर फिटनेस जांचने का निर्देश दिया गया. किसी भी तरीके की कमी पाने पर इन्हें सही कराया जाए अन्यथा ये गाड़ियां अगर सड़क पर चलते हुए पकड़ी गई तो अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी.
मानक से बड़ी बस और ड्राइवर केबिन हादसों को दे रही दावत
बता दें कि बसों में ड्राइवर का केबिन अलग रहने के चलते एक बड़ा खतरा पैदा हो सकता है. दरअसल, बस चलाते वक्त ड्राइवर को नींद आ सकती है. ऐसी स्थिति में केबिन अलग होने के चलते यात्रियों को इसकी जानकारी नहीं हो पाती है. वह ड्राइवर को आगाह नहीं कर पाते हैं. इस स्थिति में हादसे का खतरा बढ़ जाता है. इसके अलावा मानक से बड़ी बस का संचालन भी खतरे को दावत देता है. दरअसल, बस खरीदते वक्त उसकी बॉडी की साइज सही रहती है. लेकिन बस मालिक बाद में उसको मॉडिफाई कर बड़ा करा लेते हैं. इस दौरान वे इमरजेंसी गेट बंद कर देते और फायर एक्सटिंग्विशर भी मानक के हिसाब से नहीं लगाते हैं.
बसों में FDSS सिस्टम होने से टल सकती है आग की घटनाएं
मानवाधिकार आयोग ने बसों में फायर डिटेक्शन एंड सप्रेशन सिस्टम(FDSS) भी लगाने का निर्देश दिया है. यह सिस्टम ट्रेनों में लगाए जाते हैं. यह डिवाइस आग लगने वाली है इसका पता पहले से लगा लेती है. फिर उसे बुझाने के लिए ऑटोमेटेड सुरक्षा प्रणाली के तौर पर काम करती है. ऐसे में अगर इसे बसों में लगाया जाता है तो इसका सिस्टम धुएं और गर्मी का पता चलते ही प्री-अलार्म और फिर फायर-अलार्म बजाकर खुद को एक्टिव कर देगा. पानी के छिड़काव से आग लगने से पहले ही उसे बुझा देगा.
