हत्या के केस में 10 साल तक जेल में रहा शख्स पहुंचा अनिरुद्धाचार्य के मंच पर, कह दी बड़ी बात
यह लेख गाजियाबाद की डासना जेल के एक पूर्व कैदी की मार्मिक कहानी बयां करता है, जिसने अनिरुद्धाचार्य के मंच पर अपने अनुभवों को साझा किया. हत्या के मामले में 10 साल जेल काटने के बाद, उसने बताया कि कैसे जेल ने उसे आत्मनिर्भर बनाया. डासना जेल अब सिर्फ कैदखाना नहीं, बल्कि एक सुधार गृह है जो बंदियों को जिम्मेदार नागरिक बनने में मदद करता है.
राष्ट्रीय राजधानी से सटे उत्तर प्रदेश में गाजियाबाद की जेल इस समय सुर्खियों में है. इस जेल का प्रसंग सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है. यह प्रसंग प्रसिद्ध कथा वाचक और मोटिवेटर अनिरुद्धाचार्य के मंच का है. इसमें मंच पर हत्या के मामले में 10 साल की सजा काट चुका एक व्यक्ति अनिरुद्धाचार्य से बात कर रहा है. इस दौरान गाजियाबाद जेल और यहां तैनात अफसरों की बड़ाई कर रहा है. इस कैदी का कहना है कि गाजियाबाद की डासना जेल अब सिर्फ अपराधियों को कैद करने की जगह नहीं रही.
इस पूर्व कैदी का कहना है कि यह जेल धीरे-धीरे एक ऐसे सुधार गृह में बदलती जा रही है, जहां बंदियों को ना केवल आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है, बल्कि उन्हें देश का जिम्मेदार नागरिक बनाने का काम भी हो रहा है. यह पूर्व बंदी महाराज जी को बता रहा है कि जेल की सलाखों के पीछे बिताया गया समय उसकी जिंदगी का सबसे कठिन दौर था, लेकिन उसके जीवन में बदलाव भी यही से आया और आज वह समाज में सिर उठाकर जीने के लायक हो सका है.
जेल में सीखा जिंदगी का हुनर
इस बंदी ने बताया कि जेल प्रशासन ने उसे सिर्फ कैदी मानकर नहीं देखा, बल्कि उसे एक भटका हुआ इंसान माना और बेहतर इंसान बनाने की दिशा में काम किया. जेल में रहते हुए उसने पेंटिंग और आर्ट का हुनर सीखा और खुद को मानसिक रूप से मजबूत बनाया. रिहा होने के बाद वही बंदी अपने हाथों से बनाई गई एक खूबसूरत पेंटिंग लेकर अनिरुद्ध आचार्य महाराज के दरबार में पहुंचा और उन्हें भेंट किया. मंच से उसने कहा कि यदि जेल प्रशासन का सहयोग न मिलता तो शायद वह कभी जिंदगी को नई दिशा नहीं दे पाता. उसने खास तौर पर जेल प्रशासन और वार्डन शिव कुमार शर्मा का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने उसे आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा दी.
बंदियों को ऐसे दी जा रही ट्रेनिंग
इस पूर्व बंदी ने बताया कि डासना जेल की बदलती तस्वीर के पीछे जेल विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और प्रदेश सरकार की सुधारवादी सोच जिम्मेदार है. इस जेल में बंद कैदियों और विचाराधीन बंदियों को उनकी रुचि के अनुसार हुनर सिखाया जा रहा है ताकि रिहाई के बाद वे सम्मानजनक जीवन जी सकें. पेंटिंग, हस्तकला, लेखन और अन्य रचनात्मक गतिविधियों के जरिए बंदियों को नई पहचान देने की कोशिश की जा रही है. जेल अधीक्षक बृजेश कुमार सिंह ने बताया कि गाजियाबाद की तरह गौतम बुद्ध नगर जेल में भी बंदियों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं.