स्वयंभू हैं जौनपुर के त्रिलोचन महादेव, खुद झुककर सुलझाया था 2 गांवों का झगड़ा; बड़ी रोचक है कहानी
आज महाशिवरात्रि पर जौनपुर के त्रिलोचन महादेव मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ी. यह मंदिर अपने स्वयंभू शिवलिंग और पौराणिक महत्व के लिए विख्यात है, जिसका उल्लेख स्कंद पुराण में भी मिलता है. महादेव ने स्वयं प्रकट होकर दो गांवों का झगड़ा सुलझाया था. यह प्राचीन स्थल श्रद्धा और आध्यात्मिकता का केंद्र है.
आज महाशिवरात्रि है, मानें भगवान शिव का दिन. जब शिव की चर्चा हो और उत्तर प्रदेश के जौनपुर में त्रिलोचन महादेव की बात ना हो तो यह चर्चा ही अधूरी मानी जाती है. आज त्रिलोचन महादेव के मंदिर में जलाभिषेक के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी है. सुबह 3 बजे से ही श्रद्धालु कतार में आकर बाबा को श्रद्धा निवेदित कर रहे हैं. मंदिर और जिला प्रशासन द्वारा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए समुचित इंतजाम किए गए हैं. इस मंदिर के प्रधान पुजारी सोनू गिरी के अनुसार दोपहर 12 बजे तक करीब एक लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने जलाभिषेक किया है. रात में 8 बजे तक करीब ढाई लाख से अधिक श्रद्धालुओं के जलाभिषेक की उम्मीद है.
उन्होंने बताया कि महादेव का यहां जागृत शिवलिंग है. मान्यता है कि यह शिवलिंग स्वयंभू है. इस मंदिर का जिक्र स्कंद पुराण में भी मिलता है. दरअसल, काशी के प्राचीन मंदिरों में शामिल अपनी आध्यात्मिकता और पौराणिकता के लिए जाना जाने वाला महादेव का यह अलौकिक मंदिर जौनपुर में “त्रिलोचन महादेव” के नाम से विख्यात है. मान्यता है कि गाय के दूध से पाताल को भेदकर महादेव यहां स्वयं प्रकट हुए हैं. इस मंदिर की कहानी बड़ी रोचक है. त्रेतायुग का यह मंदिर द्वापर और कलियुग में भी अपरिवर्तित बना रहा. जौनपुर-वाराणसी हाइवे से सटे इस मंदिर में विराजमान शिवलिंग में महादेव के आंख, नाक, मुंह और कान स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं.
ऐसे हुआ स्वयंभू का प्राकट्य
त्रिलोचन महादेव मंदिर के प्राकट्य की बड़ी रोचक कहानी है. कथा आती है कि एक चरवाहा प्रतिदिन जंगल में अपनी गाय चराने जाता था. एक दिन वह जंगल के दूसरे हिस्से की तरफ गाय को लेकर चला गया. जब शाम में घर लौटा तो गाय ने दूध ही नहीं दिया. अगले दिन फिर गाय लेकर जंगल के उसी हिस्से में गया. उस दिन भी घर लौटने पर गाय ने दूध नहीं दिया. अचानक गाय के दूध नहीं देने से चरवाहा परेशान हो गया. अगले दिन उसने चुपके से गाय पर नजर रखी. देखा कि जंगल में एक ऊंचे स्थान पर झाड़ियों में जाकर खड़ी हो गई, जहां उसके थन से अपने आप दूध की धाराएं नीचे बहने लगीं. गाय तो अपना सारा दूध बहाने के कुछ देर बाद वहां से आगे बढ़ गई, लेकिन चरवाहे की उत्सुकता बढ़ गई.
खुदाई में मिला शिवलिंग
इसके बाद चरवाहा अगले दिन गांव के लोगों के साथ उस स्थान पर पहुंचा और खुदाई कराई. इस दौरान जमीन के नीचे एक शिवलिंग नजर आया. गांव वालों ने सोचा कि इसे गांव में रखकर मंदिर बनाएंगे, लेकिन कई दिन की खुदाई के बाद भी इस शिवलिंग का ओर-छोर नहीं मिला. आखिर में गांव वालों ने वहीं पर मंदिर बनवा दिया. चूंकि यह मंदिर दो गांवों की सीमा पर था, इसलिए दोनों गांवों के लिए आपस में लड़ने लगे. इस बात पर पंचायत हुई. तय हुआ कि इसका निराकरण खुद महादेव करेंगे. अगले दिन जब मंदिर का कपाट खोला गया तो शिवलिंग रेहटी गांव की तरफ झुका हुआ था.
स्कंद पुराण में है कथा
त्रिलोचन महादेव मंदिर का पौराणिक महत्व है. मंदिर के प्रधान पुजारी सोनू गिरी कहते हैं कि इस मंदिर की कथा स्कंद पुराण के पृष्ठ संख्या 674 पर दर्ज है. इससे मंदिर की प्राचीनता का भी अनुमान लगाया जा सकता है. उन्होंने बताया कि यह काशी के प्राचीन मंदिरों में से है. श्रद्धाभाव से आने पर यहां भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं. यहां स्थित कुंड में स्नान करने से चर्म रोगों से मुक्ति मिलती है. यहां मुंडन, पूजापाठ एवं शादी करने के लिए लोग विदेशों से भी आते हैं.
