सोमनाथ ही नहीं, UP के इस मंदिर पर भी लूटेरों ने किया बार-बार हमला; हर बार बढ़ी बुलंदी
गुजरात का सोमनाथ मंदिर कई बार टूटने के बाद अपने ऐतिहासिक पुनर्निर्माण के लिए प्रसिद्ध है. मौजूदा मंदिर का उद्घाटन 1951 में हुआ था, और आज इसकी 75वीं सालगिरह पर अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है. सिर्फ सोमनाथ ही नहीं, उत्तर प्रदेश के इस मंदिर पर भी लुटेरों ने कई बार हमला किया, लेकिन हर बार बुलंदी बढ़ी.
गुजरात के वेरावल में अरब सागर के तट पर स्थित सोमनाथ मंदिर, 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम है. यह मंदिर अपनी भव्यता और इतिहास में कई बार नष्ट होने के बाद पुनर्निर्माण के लिए प्रसिद्ध है. भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 1951 में मौजूदा मंदिर का उद्घाटन किया था. आज इसकी 75वीं सालगिरह पर अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है.
सोमनाथ मंदिर ने अनेक आक्रमण झेले- PM मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सोमवार को सोमनाथ अमृत महोत्सव में शामिल हुए. उन्होंने मंदिर में अभिषेक, ध्वज पूजा और कई अनुष्ठान में भाग लिए. इसके बाद सद्भावना मैदान में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि इतिहास के लंबे कालखंड में इस मंदिर ने अनेक आक्रमण झेले, बार-बार मंदिर को तोड़ा गया. ये बार-बार बनता रहा… हर बार उठ खड़ा होता रहा.
उन्होंने कहा कि महमूद गजनवी, अलाउद्दीन खिलजी जैसे अनेक आक्रांता आए. लुटेरों ने सोमनाथ मंदिर का वैभव मिटाने का प्रयास किया. वो सोमनाथ को एक भौतिक ढांचा मानकर उससे टकराते रहे. उन्हें लगता था कि वे हमारी ज़मीन की पहचान को तोड़ सकते हैं। लेकिन, वे गलत थे. भारत माता के हिम्मती बच्चों की वजह से, सोमनाथ फिर से बनता रहा.
यूपी के इस पावन स्थल ने सदियों उतार-चढ़ाव देखें
पीएम मोदी ने आगे कहा कि मंदिर तोड़ने वालों को मालूम नहीं था कि हमारे राष्ट्र का वैचारिक सामर्थ्य क्या है. हम भौतिक शरीर को नश्वर मानने वाले लोग हैं. उसके भीतर बैठी आत्मा अविनाशी है और शिव तो सर्वात्मा हैं. बता दें कि उत्तर प्रदेश में भी दूनिया भर में प्रसिद्ध एक ऐसा मंदिर है, जो कई बार तोड़ा गया, लेकिन फिर उससे भी भव्य बनकर खड़ा हो जाता.
हम बात कर रहे हैं, मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर की. इस पावन स्थल ने सदियों से उतार-चढ़ाव देखे हैं. मंदिर कई बार बना और तोड़ा गया, जिसमें 1669 में औरंगजेब द्वारा ईदगाह का निर्माण भी शामिल है. बिड़ला और मालवीय जी के प्रयासों से आधुनिक मंदिर बना. वर्तमान में, गर्भ गृह और 13.37 एकड़ भूमि के स्वामित्व को लेकर मामला कोर्ट में है.
1669 में औरंगजेब ने एक हिस्से पर बनाया ईदगाह
माना जाता है कि पहली बार भगवान कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने जन्मस्थान पर मंदिर का निर्माण कराया था. गुप्त काल (400 ईस्वी) में सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने एक भव्य मंदिर बनवाया, जिसे 1017 में महमूद गजनवी ने लूटा और नष्ट कर दिया. इसके बाद मध्य काल (1150 ईस्वी) में राजा विजयपाल देव इसे दोबारा बनाया, लेकिन सिकंदर लोधी ने तुड़वा दिया.
मुगल काल (1618 ईस्वी): ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेला ने चौथी बार भव्य मंदिर बनवाया. लेकिन 1669 में औरंगजेब के आदेश पर इसे तोड़कर इसके एक हिस्से पर ईदगाह मस्जिद का निर्माण कराया गया. वहीं, मंदिर को उसके वर्तमान स्वरूप में लाने का श्रेय पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रेरणा और जुगलकिशोर बिड़ला के संकल्प को जाता है.
1815 में बनारस के राजा ने नीलामी में जमीन खरीदी
जानकारी के मुताबिक, साल 1815 में बनारस के राजा पटनीमल ने यह जमीन नीलामी में खरीदी थी. बाद में बिड़ला जी ने 1944 में यह जमीन राजा पटनीमल के वंशजों से खरीद ली. इसके बाद साल 1951 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट की स्थापना हुई. और 1958-1982 में वर्तमान श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर और भागवत भवन का निर्माण कार्य पूरा हुआ था.
हालांकि, औरंगजेब के अत्याचार और ईदगाह के निर्माण से भूमि के स्वामित्व को लेकर मामला हाईकोर्ट में है. हिंदू पक्ष की दलीलें हैं कि असली ‘गर्भ गृह’ (जन्म स्थान) वर्तमान में मस्जिद के ढांचे के नीचे स्थित है. साथ ही 13.37 एकड़ जमीन के मालिकाना हक को लेकर विवाद है, जिसमें से कुछ हिस्सा मस्जिद के पास है, जिसपर सुनवाई चल रहा है.
