कार्यकाल बढ़ाएगी या प्रशासक बनाएगी? पंचायत चुनाव टलना तय, योगी सरकार अब क्या करेगी
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव टलना तय है. ग्राम प्रधानों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो रहा है, पर OBC आरक्षण रिपोर्ट, नई मतदाता सूची प्रक्रिया पूरी न होने से चुनाव आगे खिसक रहे हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट में भी यह मुद्दा उठ चुका है और सरकार ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि बिना आरक्षण और मतदाता सूची के चुनाव संभव नहीं.
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का शोर तो पहले से था, लेकिन अब यह लगभग तय माना जा रहा है कि 26 मई 2026 को समाप्त हो रहे ग्राम प्रधानों, क्षेत्र पंचायत सदस्यों और जिला पंचायत पदाधिकारियों का कार्यकाल समय पर पूरा नहीं होगा. चुनाव टलने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और योगी सरकार के सामने दो बड़े विकल्प हैं.
मौजूदा प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाना या प्रशासक (एडमिनिस्ट्रेटर) समिति नियुक्त करना! संवैधानिक प्रावधान के मुताबिक चुनाव समय पर कराने की जिम्मेदारी है, लेकिन ओबीसी आरक्षण के लिए गठित पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट, नई मतदाता सूची का तैयार न होना और आरक्षण प्रक्रिया पूरी न होने जैसी वजहों से चुनाव कार्यक्रम पीछे खिसक गया है.
हाईकोर्ट ने 19 मई तक राज्य सरकार से मांगा जवाब
सरकार ने भी साफ कर दि है कि बिना आरक्षण और मतदाता सूची के चुनाव संभव नहीं. इसके लिए पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन सबसे अहम है. दूसरी ओर हाईकोर्ट की लखनउ पीठ ने राज्य सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है कि पंचायत चुनाव से पहले विशेष पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन अब तक क्यों नहीं किया गया और पंचायती राज विभाग को नोटिस जारी किया है.
जस्टिस सौरभ लवानिया की एकल पीठ ने पंचायती राज विभाग के अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव अनिल कुमार को नोटिस जारी कर 19 मई तक जवाब दाखिल करने को कहा है. यह मामला अवमानना याचिका के रूप में सामने आया है. क्योंकि, 4 फरवरी 2026 को हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के भरोसे पर उस समय संबंधित याचिका का निस्तारण कर दिया था.
हाई कोर्ट में अवमानना याचिका पर जारी हुआ नोटिस
राज्य सरकार ने आश्वासन दिया था कि आयोग का गठन कर उसकी रिपोर्ट के आधार पर ही ओबीसी आरक्षण लागू किया जाएगा. अब अवमानना याचिका में कहा गया है कि सरकार ने अपने ही वादे का पालन नहीं किया, जो न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आता है. साथ ही संवैधानिक प्रक्रिया और न्यायालय के आदेशों की गरिमा बनाए रखने के लिए सख्त कार्रवाई की जाए.
इस मामले ने पंचायत चुनाव की तैयारियों पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. यदि आयोग का गठन समय पर नहीं होता, तो ओबीसी आरक्षण को लेकर चुनाव प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है. ऐसे में सरकार के सामने कानूनी और राजनीतिक दोनों तरह की चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं. और पंचायत चुनाव की प्रक्रिया ओबीसी आरक्षण को लेकर फिर अटक सकती है.
कार्यकाल बढ़ाना या प्रशासक समिति नियुक्त करना
मौजूदा प्रधानों का कार्यकाल बढ़ाना या प्रशासक (एडमिनिस्ट्रेटर) समिति नियुक्त करना. कई प्रधान संगठन और कुछ मंत्री इस पक्ष में हैं कि लोकतांत्रिक निरंतरता बनाए रखने के लिए वर्तमान पंचायतों का कार्यकाल 6 महीने या एक साल बढ़ा दिया जाए. पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने भी कहा कि इस प्रस्ताव को मुख्यमंत्री के समक्ष रखा जाएगा.
प्रधानों का तर्क है कि प्रशासक लगाने से विकास कार्य प्रभावित होंगे और लोकतंत्र की भावना का हनन होगा. पंचायती राज विभाग के नियमों के अनुसार, कार्यकाल समाप्त होने पर एडीओ (पंचायत) या अन्य अधिकारी प्रशासक नियुक्त होते हैं. इस बार सिर्फ एक प्रशासक के बजाय पूरी प्रशासक समिति बनाने पर विचार चल रहा है, ताकि विकास कार्य प्रभावित न हों.
‘प्रधान को ही प्रशासक बनाकर कार्यकाल बढ़ाया जाय़’
इसी बीच पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने बड़ा संकेत देते हुए कहा कि प्रदेश सरकार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तराखंड की तर्ज पर मौजूदा पदेन पदाधिकारियों, जिला पंचायत अध्यक्ष, ब्लॉक प्रमुख और ग्राम प्रधान को ही प्रशासक बनाकर उनका कार्यकाल बढ़ाने का प्रस्ताव मुख्यमंत्री के सामने रखेगी. इसपर सीएम योगी को अंतिम निर्णय लेना है.
कुछ मंत्री जैसे ओम प्रकाश राजभर, संजय निषाद ने भी संकेत दिए हैं कि पंचायत चुनाव अब 2027 विधानसभा चुनाव के बाद ही संभव हैं. गांवों में चुनावी सरगर्मी से पहले विधानसभा की तैयारी को प्राथमिकता दी जा रही है. वहीं, विपक्षी दलों समेत कुछ प्रधान संगठन प्रशासक नियुक्ति को लोकतंत्र पर हमला बता रहे हैं और कार्यकाल बढ़ाने की मांग कर रहे हैं.
योगी सरकार जल्द ही इस पर ले सकती औपचारिक फैसला
सूत्रों के अनुसार, योगी सरकार जल्द ही इस पर औपचारिक फैसला ले सकती है. अगर प्रशासक समिति बनाई गई तो यह अस्थायी व्यवस्था होगी, जिसके बाद चुनाव की नई तारीख घोषित की जाएगी. कानूनी रूप से छह महीने तक प्रशासक रखे जा सकते हैं, लेकिन स्थिति को देखते हुए लंबी व्यवस्था की तैयारी नजर आ रही है.
ग्रामीण उत्तर प्रदेश में पंचायतें विकास की रीढ़ हैं. चाहे कार्यकाल बढ़े या प्रशासक आए, सरकार पर दबाव है कि विकास कार्य ठप न पड़ें और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का सम्मान बरकरार रहे. वहीं, सरकार का फोकस विकास कार्यों को बिना रुकावट चलाने पर है. अंतिम फैसला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में कैबिनेट स्तर पर होने वाला है.
