हाथी भी नहीं हिला पाया शिवलिंग, यहां स्वयंभू हैं महादेव; रहस्यमयी है UP का ये शिव मंदिर
फतेहपुर के जागेश्वर महादेव मंदिर की महिमा अनूठी है. यहां स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है, जिसे द्वापर युग से माना जाता है. लोककथा के अनुसार, एक हाथी भी इसे अपनी जगह से हिला नहीं पाया था. यह मंदिर मनकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रसिद्ध है, विशेषकर सावन में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है.
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में जागेश्वर महादेव मंदिर की अद्भुत कहानी है. जिला मुख्यालय से करीब 22 किलोमीटर दूर गाजीपुर-असोथर मार्ग पर स्थित इस मंदिर की ख्याति दूर-दूर तक फैली है. सावन के महीने में यूपी ही नहीं, अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु यहां आते हैं और बाबा का अभिषेक कर मनौतियां मांगते हैं. खासकर सावन के सोमवार को सुबह से ही मंदिर में भक्तों की लंबी कतार लग जाती है. इस मंदिर से जुड़ी कई कहानियां स्थानीय लोककथाओं में पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं.
स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस मंदिर की स्थापना पांडवों ने की थी. सैकड़ों साल पहले इस मंदिर के आसपास घना जंगल हुआ करता था. उस समय चरवाहों को इस स्थान पर एक शिवलिंग मिला. कहा जाता है कि उस समय इस स्थान पर साधु-संत पूजा-पाठ किया करते थे. स्थानीय लोगों का मानना है कि यह एक स्वयंभू शिवलिंग है. हालांकि इस दावे को प्रमाणित करने के लिए कोई शिलालेख या ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध नहीं है.
द्वापर युग में था मंदिर का अस्तित्व
मान्यता है कि इस मंदिर का अस्तित्व द्वापर युग में भी था. एक प्रचलित लोककथा के मुताबिक, उन दिनों यहां भेड़ चराने आए चरवाहे की नजर जमीन पर पड़े एक पत्थर पर गई. वह इसी पत्थर पर अपने हंसिए की धार तेज करने लगा. इसी दौरान उसे आभाष हुआ कि यह पत्थर नहीं, बल्कि शिवलिंग है. यह बात उसने गांव में जाकर बताई. इसके बाद लोगों ने इस स्थान की साफ सफाई कराकर इस स्थान पर पूजा पाठ शुरू कर दिया.
हाथी भी नहीं हिला पाया शिवलिंग
एक और कथा आती है कि असोथर के राजा ने इस शिवलिंग को दूसरी जगह स्थापित कराने का प्रयास किया था. पहले राजा ने यहां सैनिक भेजे, फिर हाथी की मदद से शिवलिंग को उठाने का प्रयास किया गया. काफी प्रयास के बाद भी शिवलिंग अपनी जगह ने नहीं हिला. बल्कि यहां से वापस लौटते समय वह हाथी झब्बापुर के पास पहुंचते ही धड़ाम से गिरा और उसकी मौत हो गई. इसके बाद सैनिकों ने उसे वहीं दफना दिया. उस स्थान पर अब आम का बाग है और स्थानीय लोग इस बाग को ‘हथिया आम’ के नाम से जानते हैं.
गोपी साहू ने बनवाया मंदिर
स्थानीय लोगों के मुताबिक संवत 1950 में बाबू गोपी साहू नामक व्यक्ति ने इस स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण कराया. उसके बाद तो समय के साथ स्थानीय ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के सहयोग से मंदिर परिसर में कई विकास कार्य और जीर्णोद्धार के काम हुए. आज यह स्थान क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है. मंदिर के नाम को लेकर मान्यता है कि भगवान शिव यहां जागृत स्वरूप में हैं. इसलिए इन्हें जागेश्वर महादेव कहा जाता है.
मनौती मांगने दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु
लोक मान्यता है कि इस मंदिर में मांगी गई मनौती सहज ही पूरी हो जाती है. लोग यहां पहले विवाह, संतान, परिवार की खुशहाली और सुख-समृद्धि आदि की मनौती मांगने आते हैं. वहीं मनौती पूरी होने के बाद दोबारा मंदिर में आकर जागेश्वर महादेव की पूजा करते हैं. वैसे तो इस मंदिर में पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन सावन के महीने में मंदिर की रौनक कई गुना बढ़ जाती है.
