‘बनारसी पान ने भी लड़ी थी आजादी की लड़ाई’, पत्ते में छिपकर निकलती थी गुप्त सूचना
देश अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाने जा रहा है. इस अवसर पर आजादी की लड़ाई से जुड़ी अनूठी कहानियां सामने आती हैं. 'बनारसी पान' और 'तिरंगी बर्फी' ने भी आजादी की लड़ाई लड़ी थी. जानिए बनारसी पान ने कैसे अंग्रेजों की आंखों में धूल झोंककर क्रांतिकारियों की मदद की.
15 अगस्त 2026: देश अपना 80वां स्वतंत्रता मनाने जा रहा है. ये एक ऐसा मौका है जब हम आजादी की लड़ाई से जुड़े हर एक घटना और विषय के बारे में जानना चाहते हैं. वाराणसी में भी भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान एक ऐसी ही घटना घटी थी. वो दिलचस्प घटना काशी के सांस्कृतिक प्रतीक मशहूर ‘बनारसी पान’ और तिरंगी बर्फी से जुड़ी हुई है.
बनारस की सबसे पुरानी पान की दुकान होने का दावा करने वाले नेताजी पान भंडार के संचालक राजेश चौरसिया बताते हैं कि ब्रिटिश राज के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन में तिरंगे के प्रदर्शन और उपयोग पर कई जगह पाबंदियां थीं. तब बनारस के राम नारायण चौरसिया, जिनकी पान की दूकान थी, पान के जरिए राष्ट्रवाद की अलख जगाने का अनोखा रास्ता निकाला.
पान के पत्ते में छिपा होता था पुलिस का राज
राम नारायण चौरसिया, चौक थाने के बगल में पान की दुकान चलाते थे. उन्होंने पान के जरिए क्रांतिकारियों तक सन्देश पहुंचाने की अनूठी तरकीब निकाली. वह जिस पत्ते में पान लगाकर क्रान्तिकारियों को देते थे, उस पत्ते के नीचे चौक थाने की हलचल और पुलिस की मूवमेंट से जुड़ी जानकारी होती थी. इस तरह महत्वपूर्ण सूचनाएं क्रांतिकारियों तक पहुंचाई जाती थीं.

उस समय चौक थाना बनारस के महत्वपूर्ण पुलिस थानों में शामिल था और यहां बड़ी संख्या में क्रांतिकारियों को रखा जाता था. ऐसे में पुलिस की गतिविधियों की जानकारी आंदोलनकारियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती थी. आसान भाषा में कहा जाए तो, बनारसी पान आजादी की लड़ाई में क्रांतिकारियों के लिए सही मायने में एक अहम संदेशवाहक था.
शास्त्री से लेकर नेहरू-इंदिरा तक खाते थे पान
राजेश चौरसिया के मुताबिक, नेताजी पान भंडार के संस्थापक राम नारायण चौरसिया के खास दोस्तों में लाल बहादुर शास्त्री, पंडित कमला पति त्रिपाठी और रघुनाथ सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानी शामिल थे. आजादी के बाद जब इनमें से कई नेता सांसद, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री जैसे पदों तक पहुंचे, तब भी बनारस आने पर इस दुकान पर पान खाने पहुंचते थे.

दावा है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और के. कामराज जैसे बड़े नेता भी नेताजी पान भंडार पर आ चुके हैं.
तिरंगे पर रोक लगी तो मिठाई से दिखाया देशप्रेम
इतिहासकार प्रोफेसर राजीव श्रीवास्तव कहते हैं कि बनारस की भूमिका 1905, काकोरी कांड और 1942 के आंदोलनों में काफी महत्वपूर्ण रही थी. इस वजह से तिरंगा लेकर चलने और फहराने पर रोक लगा दी गई थी. इस वजह से बनारसियों के द्वारा पान और तिरंगी बर्फी जैसे माध्यमों से राष्ट्रवाद का संदेश देने की अनूठी परंपरा विकसित हुई.
ठठेरी बाजार के मदन गोपाल गुप्ता और कचौड़ी गली के बचानू साव जैसे प्रसिद्ध हलवाइयों ने मिठाई के जरिए देशभक्ति प्रदर्शित करने का प्रयोग किया. कई प्रयोगों के बाद तिरंगे के तीन रंगों वाली बर्फी तैयार की गई. मदन गोपाल गुप्ता के 5वीं पीढ़ी, श्रीराम भंडार के अधिष्ठाता वरुण गुप्ता ने बताया कि दादाजी इसे बादाम, पिस्ता और केसर से तैयार करते थे.
GI टैग के बाद बढ़ी तिरंगी बर्फी की लोकप्रियता
वरुण गुप्ता ने बताया कि इसके अलावा उनके दादाजी ने जवाहर लड्डू, गांधी गौरव और वल्लभ संदेश जैसी मिठाइयां भी तैयार की थीं. उस दौर में काशी के हलवाई समाज ने अपना राष्ट्र प्रेम और देश के प्रति उनकी जो श्रद्धा थी उसका तो उन्होंने प्रदर्शन किया ही इसके साथ अंग्रेजों के तिरंगे पर प्रतिबंध लगाए जाने का भी अनोखा जवाब दिया.
वरुण गुप्ता के मुताबिक, तिरंगी बर्फी को पिछले साल GI टैग मिलने के बाद इसकी लोकप्रियता और बढ़ी है. आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के मौके पर तिरंगी बर्फी और जवाहर लड्डू की बिक्री बढ़ जाती है. हालांकि अब तिरंगी बर्फी काजू और मावा से बनाई जाती है. वहीं, बनारसी पान को आधिकारिक तौर पर अप्रैल 2023 में ही GI टैग मिल गया था.
