कानपुर: मुफ्त में प्लॉट नहीं दिया तो रच दी फर्जी मुठभेड़ की कहानी! 35 साल बाद 12 पुलिसकर्मियों पर FIR
कानपुर में एक व्यक्ति द्वारा प्लाट देने से इनकार करने पर 35 साल पहले फर्जी मुठभेड़ रची गई थी. इस मामले में अब 12 पुलिसकर्मियों पर मुकदमा दर्ज हुआ है. सीबीसीआईडी जांच में खुलासा हुआ कि पुलिस ने झूठी कहानी गढ़कर 12 लोगों को फंसाया था.
कानपुर में मुफ्त में प्लाट देने से इनकार करने पर एक व्यक्ति को कथित तौर पर फर्जी मुठभेड़ में फंसाने के मामले में 35 साल बाद बड़ी कार्रवाई हुई है. CBCID की जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है. आरोप है कि साल 1991 में महाराजपुर पुलिस ने लूट और मुठभेड़ की झूठी कहानी तैयार कर 12 लोगों को गिरफ्तार दिखाया था. इनमें से कई का कथित घटना से कोई संबंध नहीं था.
इस मामले में सीबीसीआइडी ने साल 1995 में अपनी अंतिम जांच रिपोर्ट में 18 पुलिसकर्मियों को दोषी माना था. इनमें से छह की मृत्यु हो चुकी है, जबकि कई अन्य सेवानिवृत्त हो चुके हैं. शासन से आवश्यक मंजूरी मिलने के बाद अब 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया है. मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी.
GT रोड पर लूट और मुठभेड़ का था दावा
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, 22 अगस्त 1991 की रात महाराजपुर पुलिस ने कानपुर-प्रयागराज हाईवे पर जीटी रोड के पास बदमाशों के साथ मुठभेड़ होने का दावा किया था. तत्कालीन थानाध्यक्ष विद्यासागर त्रिपाठी की तहरीर पर राकेश पाठक और उनके 11 साथियों की गिरफ्तारी दिखाई गई थी. पुलिस ने इनके पास से अवैध हथियार और विस्फोटक पदार्थ बरामद होने की बात भी कही थी.
इसके बाद सभी के खिलाफ लूट, हत्या के प्रयास और शस्त्र व विस्फोटक पदार्थ से संबंधित धाराओं में दो मुकदमे दर्ज कर उन्हें जेल भेज दिया गया. आरोपितों को करीब 40 दिन जेल में बिताने पड़े.
प्लाट देने से इनकार बना विवाद की वजह
चकेरी के गांधीग्राम निवासी राकेश पाठक के परिवार का आरोप था कि तत्कालीन थानाध्यक्ष ने मुफ्त में प्लाट देने से इनकार करने पर राकेश को सबक सिखाने के लिए यह पूरा मामला रचा था. परिवार के मुताबिक, पुलिस ने राकेश के मामा और तीन मजदूरों समेत कई ऐसे लोगों को भी गिरफ्तार दिखा दिया, जिनका कथित लूट से कोई लेना-देना नहीं था.
राकेश के बड़े भाई देव प्रसाद पाठक ने इस कार्रवाई को गलत बताते हुए शासन से जांच कराने की मांग की थी. उनका आरोप था कि पुलिस घर से उनके पिता की लाइसेंसी डबल बैरल बंदूक और राइफल भी जबरन ले गई थी और बाद में इन्हीं हथियारों को मुठभेड़ में बरामद दिखा दिया गया.
ट्रक चालक-कंडक्टर के बयान से खुला मामला
शिकायत के बाद CBCID की कानपुर यूनिट ने जांच शुरू की. जांच के दौरान उस डीसीएम के चालक और कंडक्टर के बयान अहम साबित हुए, जिसका जिक्र पुलिस ने लूट की घटना में किया था. दोनों ने पुलिस की कहानी का समर्थन नहीं किया. उनके मुताबिक, वे साबुन लादकर कानपुर से वाराणसी जा रहे थे. रामादेवी चौराहे पर एक सिपाही उनकी गाड़ी में बैठा और बाद में कुछ अन्य लोग भी उसमें सवार हो गए.
इसके बाद घटनाक्रम को लूट और मुठभेड़ का रूप दिए जाने का आरोप सामने आया. साक्ष्यों के अभाव में साल 1996 में इस मामले के सभी आरोपितों को अदालत से दोषमुक्त कर दिया गया था. हालांकि, राकेश पाठक की बाद में एक हादसे में मृत्यु हो गई. उनके बड़े भाई देव प्रसाद पाठक ने अब पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने पर संतोष जताया है.
सीआइडी के अधिकारियों के मुताबिक, मामले में कार्रवाई में देरी शासन से मंजूरी मिलने में लगे समय के कारण हुई. अब स्वीकृति मिलने के बाद आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू हो सकेगी.
