‘कमांडो सर्जरी’ और ‘चौघड़ पोला’ जैसे कोडवर्ड…60 लाख में होती थी डील; मजदूर से ऐसे किडनी कांड का किंग बना था रोहित

कानपुर किडनी रैकेट को लेकर पुलिस ने एक और बड़ा खुलासा किया है. कानून और खुफिया एजेंसियों की नजर से बचने के लिए आरोपियों ने एक समानांतर भाषा विकसित कर ली थी. इस नेटवर्क में जीवन रक्षक सर्जरी यानी किडनी ट्रांसप्लांट को 'कमांडो सर्जरी' कहा जाता था. हैरानी की बात यह है कि जिन अस्पतालों को जीवन दान का मंदिर माना जाता है, उन्हें इस गिरोह ने 'स्कूल' और 'कॉन्वेंट' का नाम दे रखा था. इसके अलावा कई और कोडवर्ड्स अलग-अलग कामों और नामों के लिए इस्तेमाल किया जाता था.

कानपुर किडनी रैकेट का मास्टरमाइंड रोहित Image Credit:

​अपराध की दुनिया में अक्सर हमने हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी के किस्से सुने हैं. लेकिन कानपुर में बेनकाब हुए किडनी कांड की कहानी सुनकर हर किसी की रूह कांप जाएगी. यह एक गिरोह नहीं बल्कि, कार्पोरेट के तर्ज पर चलने वाला एक खौफनाक सिंडिकेट था. इसने इंसानी अंगों को ‘कोडवर्ड’ में तब्दील कर दिया था. पुलिस की गिरफ्त में आए मास्टरमाइंड रोहित ने जो खुलासे किए हैं, वे किसी डार्क वेब थ्रिलर से कम नहीं हैं.

बना रखा था ​कोडवर्ड का मायाजाल

​इस सिंडिकेट की सबसे डरावनी बात इसकी कार्यप्रणाली थी. कानून और खुफिया एजेंसियों की नजर से बचने के लिए आरोपियों ने एक समानांतर भाषा विकसित कर ली थी. इस नेटवर्क में जीवन रक्षक सर्जरी यानी किडनी ट्रांसप्लांट को ‘कमांडो सर्जरी’ कहा जाता था. हैरानी की बात यह है कि जिन अस्पतालों को जीवन दान का मंदिर माना जाता है, उन्हें इस गिरोह ने ‘स्कूल’ और ‘कॉन्वेंट’ का नाम दे रखा था

आहूजा हॉस्पिटल को ‘आहूजा स्कूल’ और प्रिया हॉस्पिटल को ‘प्रिया कॉन्वेंट’ के नाम से पुकारा जाता था. यही नहीं, जेंडर के आधार पर मरीजों और डोनरों के नाम भी तय थे. पुरुष मरीज को ‘पांव’ और महिला मरीज को ‘पोला’ कहा जाता था. डॉ. सुरजीत आहूजा को ‘चौघड़ पांव’ और डॉ. प्रीति आहूजा को ‘चौघड़ पोला’ के कोडवर्ड से संबोधित किया जाता था.

मजदूर से मास्टरमाइंड तक का सफर

​इस पूरे खेल का केंद्र बिंदु रोहित है. वह कभी गाजियाबाद में मजदूरी करता था. फिर मेरठ के एक क्लीनिक में रिसेप्शनिस्ट बना. यहां उसकी मुलाकात किडनी रैकेट के गुर्गों से हुई. सफेद कोट के पीछे छिपे काले कारोबार की बारीकियां सीखकर रोहित ने अपना खुद का साम्राज्य खड़ा कर लिया. 2019 में उसने कानपुर को अपना ‘हॉटस्पॉट’ बनाया. फिर कल्याणपुर इलाके को अवैध ट्रांसप्लांट के लिए सुरक्षित ठिकाने के रूप में इस्तेमाल करना शुरू किया.

​सोशल मीडिया और एजेंटों का हाईटेक जाल

​रोहित ने गिरफ्तारी से बचने के लिए एक ‘लेयर्ड’ सुरक्षा कवच बनाया था. वह कभी सीधे तौर पर मरीज (रिसिपिएंट) के संपर्क में नहीं आता था. मरीजों को लाने का काम देशभर में फैले एजेंटों का था, जिनका मुखिया शिवम अग्रवाल उर्फ ‘मार्शल’ था. वहीं, किडनी देने वाले ‘डोनर्स’ को फंसाने के लिए टेलीग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जाता था. आर्थिक तंगी से जूझ रहे लोगों को टेलीग्राम के जरिए जाल में फंसाया जाता. फिर उन्हें कानपुर लाकर ‘कमांडो सर्जरी’ की मेज पर लिटा दिया जाता था.

​30 से 60 लाख की डील और गोवा का ऐश-ओ-आराम

यह कारोबार कितना मुनाफाबख्श था. इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक किडनी ट्रांसप्लांट का सौदा औसतन 30 लाख रुपये (जिसे कोड में ’30 एल’ कहते थे) में होता था. कुछ मामलों में यह रकम 60 लाख तक पहुंच जाती थी. इस काली कमाई का 50 प्रतिशत हिस्सा सीधे रोहित की जेब में जाता था. इसी पैसे के दम पर उसने अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़कर लिव-इन पार्टनर के साथ लग्जरी लाइफ जीना शुरू कर दिया था. वारदात के बाद वह अक्सर अपनी गर्लफ्रेंड के साथ गोवा जैसे शहरों में ऐश करने निकल जाता था.

गर्लफ्रेंड के चलते पुलिस के शिंकजे में आया रोहित

​शातिर रोहित अपनी पहचान छिपाने के लिए लगातार मोबाइल नंबर बदल रहा था. लेकिन उसकी सबसे बड़ी कमजोरी उसकी गर्लफ्रेंड बनी. फरारी के दौरान वह अपनी प्रेमिका से संपर्क करने की कोशिश में लगा रहा. पुलिस की सर्विलांस टीम ने जब संदिग्ध नंबरों को ट्रैक किया, तो कड़ियां जुड़ती गईं और आखिरकार पुलिस उस तक पहुंचने में कामयाब रही और रोहित को धर दबोचा गया.

इस रैकेट में शामिल हो सकते हैं कई सफेदपोश

​कानपुर पुलिस की इस कार्रवाई ने एक बड़े रैकेट को ध्वस्त तो कर दिया है, लेकिन अभी भी कई सवालों के दवाब मिलने बाकी हैं.. मेरठ के कुछ नामी डॉक्टर, ओटी स्टाफ और प्रयागराज के कई एजेंट अभी भी फरार हैं. जांच का दायरा अब उन बड़े अस्पतालों तक भी पहुंच रहा है, जिन्होंने मोटी रकम के लालच में इन ‘कमांडो सर्जरीज’ के लिए अपने दरवाजे खोले थे.

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