‘सिस्टम’ ने ली 15 जिंदगियां? लखनऊ अग्निकांड में एक के बाद एक बड़े खुलासे

लखनऊ के अलीगंज अग्निकांड में 15 लोगों की मौत के बाद सामने आए दस्तावेजों ने प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. जांच में पता चला कि जिस इमारत में आग लगी, वह स्वीकृत मानकों के विपरीत कमर्शियल रूप से संचालित हो रही थी. फायर सेफ्टी इंतजाम, इमरजेंसी एग्जिट और आवश्यक एनओसी का अभाव था. 2016 में अवैध निर्माण पर ध्वस्तीकरण का आदेश भी जारी हुआ, जिसे बाद में वापस ले लिया गया. अब सवाल उठ रहे हैं कि कार्रवाई क्यों नहीं हुई और क्या जांच 15 मौतों के असली जिम्मेदारों तक पहुंच पाएगी?

लखनऊ अग्निकांड में प्रशासन की लापरवाही सामने आने लगी है Image Credit: AI Generated

लखनऊ के अलीगंज में हुआ अग्निकांड हादसा था या फिर सिस्टम की लापरवाही से हुआ एक हत्याकांड? यह सवाल हम इसलिए पूछ रहे हैं क्योंकि 15 लोगों की मौत के बाद अब जो दस्तावेज, जांच और खुलासे सामने आ रहे हैं, वो कई बड़े सवाल खड़े कर रहे हैं. जिस इमारत में आग लगी, वह नियमों के मुताबिक बनी ही नहीं थी. अवैध निर्माण पर कार्रवाई हुई, ध्वस्तीकरण का आदेश भी जारी हुआ, लेकिन दो महीने बाद उसे वापस ले लिया गया. फायर सेफ्टी के इंतजाम नहीं थे, इमरजेंसी एग्जिट नहीं था, छत का दरवाजा बंद था और बच्चों के पास जान बचाने का कोई रास्ता नहीं बचा.

सवाल यह है कि आखिर इन 15 मौतों का जिम्मेदार कौन है? सोमवार को दोपहर करीब दो बजकर पंद्रह मिनट पर अलीगंज के पुरनिया इलाके की एक बहुमंजिला इमारत से अचानक आग की लपटें उठने लगीं. देखते ही देखते आग ने पूरी बिल्डिंग को अपनी चपेट में ले लिया. तीसरी मंजिल पर मौजूद एनिमेशन और गेमिंग सेंटर में अफरा-तफरी मच गई. अंदर फंसे बच्चों और युवाओं ने जान बचाने के लिए खिड़कियों से छलांग लगाई. कुछ ने बिजली के केबल पकड़कर नीचे उतरने की कोशिश की, जबकि कई लोग बाथरूम में छिप गए. लेकिन वही बाथरूम उनकी आखिरी मंजिल बन गए.

दम घुटने से 15 लोगों की मौत हो गई और कई गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन अब इस हादसे की परतें खुल रही हैं और सामने आ रहा है कि यह सिर्फ आग नहीं थी, बल्कि नियमों की खुलेआम हत्या का नतीजा थी. ये है लापरवाही की पूरी चार्जशीट

बेसमेंट

अनुमति : केवल 40 प्रतिशत हिस्से तक उपयोग
हकीकत : 90 प्रतिशत से ज्यादा बेसमेंट कवर

निर्माण

अनुमति : सिंगल हाउसिंग यूनिट
हकीकत : बहुमंजिला कमर्शियल कॉम्पलेक्स

कवरेज एरिया

अनुमति : अधिकतम 65 प्रतिशत निर्माण
हकीकत : लगभग 100 प्रतिशत निर्माण

अलीगंज की इस बिल्डिंग में लगी आग

खुली जगह

नियम : चारों ओर खाली स्थान जरूरी
हकीकत : बिना खुली जगह छोड़े निर्माण

बेसमेंट एनओसी

नियम : विभागीय एनओसी अनिवार्य
हकीकत : रिकॉर्ड में कोई एनओसी नहीं

ऊंचाई

अनुमति : 15 मीटर
हकीकत : 19 मीटर से अधिक

फायर सेफ्टी

नियम : पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था
हकीकत : कोई इंतजाम नहीं

निकासी मार्ग

नियम : पर्याप्त एंट्री-एग्जिट
हकीकत : सिर्फ एक संकरा रास्ता

15 लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन?

यानी जिस इमारत में रोजाना दर्जनों लोग आते-जाते थे, वह शुरुआत से ही नियमों के खिलाफ बनाई गई थीय सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब प्रशासन की नजरों से छिपा नहीं था. दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 2013 में यह संपत्ति खरीदी गई. 2014 में आवासीय उपयोग के लिए नक्शा पास हुआ, लेकिन उसी इमारत को कमर्शियल इस्तेमाल में लाया जाने लगा. अवैध निर्माण पाए जाने पर एलडीए ने मुकदमा दर्ज किया. 10 मई 2016 को ध्वस्तीकरण का आदेश भी जारी कर दिया गया, लेकिन महज दो महीने बाद, 5 जुलाई 2016 को यह आदेश वापस ले लिया गया.

ध्वस्तीकरण आदेश वापस किसने लिया?

यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि आखिर वह कौन था, जिसने अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई रोक दी? इस इमारत की संरचना भी हादसे को और भयावह बनाने वाली साबित हुई. बेसमेंट में पेट फीड और एक्सेसरीज का गोदाम था. ग्राउंड फ्लोर पर पेट शॉप और क्लिनिक संचालित हो रहे थे. पहली और दूसरी मंजिल पर हेक्सार स्टूडियो का संचालन हो रहा था, जहां 30 से ज्यादा तकनीकी और क्रिएटिव युवा पेशेवर काम करते थेय यहीं 3डी गेम डेवलपमेंट, 3डी एनीमेशन और उससे जुड़े कोर्स भी चलाए जाते थे, लेकिन पूरी बिल्डिंग में कोई वेंटिलेशन सिस्टम नहीं था.

छत पर जाने वाला दरवाजा लॉक था. मुख्य प्रवेश द्वार के पास एसी के आउटर यूनिट और इलेक्ट्रिकल पैनल लगे थे. एल्यूमिनियम फ्रेम, फाइबर और ग्लास पैनल से फ्रंट को कवर किया गया था. दीवारों में पीवीसी पैनल और वॉलपेपर लगाए गए थे. पूरी बिल्डिंग में फॉल्स सीलिंग थी. विशेषज्ञों के मुताबिक, ये सभी सामग्री आग को तेजी से फैलाने वाली थीं. प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, आग लगने के दौरान बायोमेट्रिक लॉक सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया. जिन बच्चों ने साहस दिखाया, उन्होंने खिड़कियों से छलांग लगाकर या बिजली के केबल पकड़कर अपनी जान बचा ली.

क्या असली गुनहगार बच जाएंगे?

लेकिन जो बच्चे बाथरूम में छिप गए, उन्हें लगा कि वे सुरक्षित हैं. उन्हें क्या पता था कि बंद जगह में धुआं ही उनकी सांसें छीन लेगा. फिलहाल दो घायलों का इलाज ट्रॉमा सेंटर में चल रहा है. वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने केजीएमयू पहुंचकर पीड़ित परिवारों से मुलाकात की और भरोसा दिलाया कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा, लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़े हैं… अगर निर्माण अवैध था तो उसे गिराया क्यों नहीं गया? 2016 में ध्वस्तीकरण आदेश वापस किसने लिया?

दस साल तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

क्या पिछले दस वर्षों में किसी अधिकारी ने इस बिल्डिंग का निरीक्षण नहीं किया? क्या फायर ऑडिट हुआ था? अगर हुआ था, तो खामियां क्यों नहीं पकड़ी गईं? और सबसे बड़ा सवाल क्या 15 लोगों की मौत के असली जिम्मेदारों तक जांच पहुंच पाएगी, या फिर हर बार की तरह फाइलें बंद हो जाएंगी? लखनऊ का यह अग्निकांड सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की जवाबदेही की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया है, क्योंकि इन 15 मौतों के साथ सिर्फ परिवारों के सपने नहीं जले, बल्कि यह सवाल भी खड़ा हो गया कि क्या नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं?

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