राम मंदिर में CEO की नियुक्ति की सुगबुगाहट, संत बोले- नौकरशाही का दखल मंजूर नहीं

राम मंदिर चढ़ावा अनियमितता मामले के बीच मंदिर में CEO नियुक्ति की चर्चाओं पर नया विवाद खड़ा हो गया है. अखिल भारतीय संत समिति ने मंदिर प्रशासन में नौकरशाही की भूमिका बढ़ाने का विरोध करते हुए कहा कि मठ और मंदिरों का संचालन संत परंपरा और श्रद्धालुओं के हाथ में रहना चाहिए. समिति का तर्क है कि जिस तरह मस्जिद, गुरुद्वारे और चर्च अपने-अपने धार्मिक निकायों द्वारा संचालित होते हैं, उसी तरह हिंदू मंदिरों में भी सरकारी हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए.

अयोध्या स्थित राम मंदिर Image Credit: AI Generated

राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले को लेकर चल रही हलचल के बीच अब श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) की नियुक्ति की सुगबुगाहट से पहले नया विवाद खड़ा हो गया है. अखिल भारतीय संत समिति ने सरकार द्वारा मंदिर प्रशासन में नौकरशाही की भूमिका बढ़ाने के प्रयासों का कड़ा विरोध करते हुए कहा है कि मठ और मंदिर श्रद्धालुओं और धार्मिक परंपराओं के अनुसार ही संचालित होने चाहिए, न कि सरकारी अफसरों के जरिए.

संत समिति ने साफ शब्दों में कहा कि यदि मस्जिदों का संचालन वक्फ बोर्ड करता है, गुरुद्वारों का प्रबंधन शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) करती है और चर्चों का संचालन चर्च काउंसिल करती है, तो केवल हिंदू मंदिरों के संचालन में सरकार हस्तक्षेप क्यों करना चाहती है? संतों ने इसे धार्मिक संस्थाओं की स्वायत्तता का प्रश्न बताया और सरकार से चार लाख से अधिक हिंदू मंदिरों पर कथित सरकारी नियंत्रण समाप्त करने की मांग भी उठाई.

‘सरकारी नियंत्रण में नहीं लाया जाना चाहिए’

यह बयान ऐसे समय आया है जब राम मंदिर में चढ़ावा अनियमितता मामले की जांच के बाद ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं और मंदिर प्रशासन को अधिक पारदर्शी बनाने के लिए CEO नियुक्त किए जाने की चर्चा तेज है. अखिल भारतीय संत समिति ने विरोध दर्ज कराया है. संत समिति का कहना है कि किसी भी प्रशासनिक सुधार के नाम पर मंदिरों की स्वतंत्र धार्मिक व्यवस्था को सरकारी नियंत्रण में नहीं लाया जाना चाहिए.

‘व्यापक विरोध किया जाएगा’

अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय सचिव स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि देश में अलग-अलग धर्मों की संस्थाओं के संचालन की अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं. उन्होंने कहा, ‘मस्जिद वक्फ बोर्ड चलाता है, गुरुद्वारे एसजीपीसी चलाती है और चर्चों का संचालन चर्च काउंसिल करती है.. फिर केवल हिंदू मंदिरों को ही सरकार क्यों चलाना चाहती है?’ उन्होंने कहा कि यदि सरकार प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ती है तो इसका व्यापक विरोध किया जाएगा.

‘मंदिरों पर कब्जा नहीं किया जा सकता’

स्वामी जितेंद्रानंद ने कहा कि देश के कई प्रसिद्ध मंदिरों में पहले भी आर्थिक या प्रशासनिक विवाद सामने आए हैं, पद्मनाभस्वामी मंदिर, तिरुपति बालाजी मंदिर और शनि शिंगणापुर मंदिर में भी समय-समय पर विभिन्न प्रकार के विवाद सामने आए थे. उनका कहना था कि यदि किसी मंदिर में अनियमितता हुई है तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन पूरे मंदिर प्रशासन को सरकारी नियंत्रण में देना उचित नहीं होगा.

‘संचालन संत परंपरा और श्रद्धालुओं के हाथ में’

वहीं, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं मणिराम छावनी पीठाधीश्वर महंत नृत्यगोपाल दास के 88वें जन्मोत्सव समारोह में देशभर से जुटे संतों ने ध्वनिमत से प्रस्ताव पारित कर राम मंदिर के संचालन में नौकरशाही की भूमिका का विरोध किया. संतों ने कहा कि मंदिर का संचालन संत परंपरा और श्रद्धालुओं के हाथ में रहना चाहिए, न कि नौकरशाहों के. रामकथा की व्यासपीठ से मुख्य वक्ता आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण ने सबसे पहले इस मुद्दे को उठाया.

PM मोदी और CM योगी से अपील

उन्होंने सवाल किया, ‘अयोध्या में राम मंदिर बनेगा और उसे ब्यूरोक्रेट्स चलाएंगे?’ उन्होंने कहा कि अयोध्या संतों, श्रद्धालुओं और सनातन धर्मावलंबियों की है, इसलिए राम मंदिर की व्यवस्था भी संत परंपरा के अनुसार ही होनी चाहिए. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से आग्रह किया कि यदि ट्रस्ट का पुनर्गठन करना है तो उसमें विभिन्न परंपराओं के संतों और विश्वसनीय लोगों को स्थान दिया जाए, लेकिन मंदिर को “सत्ता का उपनिवेश” न बनाया जाए.

11 जुलाई की बैठक पर नजर

सूत्रों के अनुसार, 11 जुलाई को प्रस्तावित ट्रस्ट की बैठक में संगठनात्मक ढांचे में बड़े बदलाव, ट्रस्ट के पुनर्गठन, चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा के इस्तीफों के साथ ही प्रशासनिक व्यवस्था पर महत्वपूर्ण फैसले हो सकते हैं. यही वजह है कि बैठक से पहले ही संत समाज ने अपनी आपत्तियां सार्वजनिक कर दी हैं.

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