मुस्लिम-दलित-गुर्जर पर नजर… पश्चिम UP फतह के लिए अखिलेश का प्लान, कम होगी जाट वोट पर निर्भरता

समाजवादी पार्टी ने 2027 के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी रणनीति बदली है. जयंत चौधरी के भाजपा में जाने के बाद अखिलेश यादव अब जाट-मुस्लिम समीकरण के बजाय मुस्लिम, दलित और गुर्जर वोटों पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. इस नई सामाजिक इंजीनियरिंग के तहत सपा 132-136 सीटों पर पैठ बनाने का लक्ष्य लेकर चल रही है, ताकि जाट वोटों की संभावित कमी की भरपाई हो सके.

सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव Image Credit: फाइल फोटो

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर समाजवादी पार्टी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी रणनीति को नए सिरे से तैयार करना शुरू कर दिया है. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव की नजर इस बार सिर्फ जाट-मुस्लिम समीकरण पर नहीं, बल्कि मुस्लिम-दलित-गुर्जर वोटों की नई सोशल इंजीनियरिंग पर है. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष जयंत चौधरी का भाजपा के साथ जाना माना जा रहा है.

पश्चिमी यूपी में जाट वोट लंबे समय तक रालोद के साथ खड़े रहे हैं. 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और रालोद के गठबंधन ने इसी जाट-मुस्लिम समीकरण को साधने की कोशिश की थी और कई इलाकों में इसका असर भी दिखाई दिया. लेकिन अब जयंत चौधरी एनडीए के साथ हैं. ऐसे में सपा के सामने पश्चिमी यूपी में जाट वोटों के पुराने समीकरण को दोहराने की चुनौती है. अखिलेश यादव अब जाट वोटों की संभावित कमी की भरपाई के लिए गुर्जर समाज पर फोकस बढ़ा रहे हैं.

गुर्जर समाज में पैठ बढ़ाने की कोशिश

सपा पश्चिमी यूपी में गुर्जर समुदाय तक पहुंच बनाने की रणनीति काम कर रही है. पार्टी 34 जिलों की 132 सीटों पर फोकस कर रही है, जहां गुर्जर मतदाताओं की संख्या प्रभावी है.यानी अखिलेश की रणनीति साफ दिखाई दे रही है, इसमें जाट का विकल्प जाट नहीं, बल्कि गुर्जर वोट है. इसी के साथ अखिलेश यादव की नजर दलित वोटों पर भी है. सपा की 2024 लोकसभा चुनाव में पीडीए रणनीति के तहत गैर-यादव ओबीसी और दलित वोटों को जोड़ने की कोशिश कामयाब रही थी. अब इसी प्रयोग को पश्चिमी यूपी में आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही है.

बड़ी आबादी पर फोकस

पश्चिमी यूपी में दलित और मुस्लिम मतदाताओं की बड़ी आबादी है. ऐसे में सपा यदि गुर्जर वोटों के साथ इन दोनों सामाजिक समूहों को अपने पक्ष में लामबंद करने में सफल होती है तो पार्टी के लिए कई सीटों पर मुकाबला बदलने की स्थिति बन सकती है. पश्चिमी यूपी में 26 जिलों की 136 विधानसभा सीटों को चुनावी रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है. सपा की रणनीति का तीसरा महत्वपूर्ण आधार मुस्लिम वोट है. पश्चिमी यूपी में कई जिलों और विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं. 2022 में भी सपा और उसके सहयोगियों के साथ मुस्लिम मतदाताओं का बड़ा हिस्सा गया था.

136 सीटों में 50 का आंकड़ा क्यों अहम?

पश्चिमी यूपी की 136 सीटें सपा के लिए इसलिए महत्वपूर्ण हैं. क्योंकि यहां बेहतर प्रदर्शन पार्टी को पूरे प्रदेश के सत्ता समीकरण में मजबूती दे सकता है. अगर मुस्लिम-दलित-गुर्जर समीकरण के साथ यादव वोट भी मजबूती से सपा के साथ आता है और पार्टी पश्चिमी यूपी में करीब 50 सीटें जीतने में सफल रहती है, तो यह 2027 की सत्ता की लड़ाई में अखिलेश यादव को मजबूत स्थिति में पहुंचा सकता है. हालांकि सिर्फ वोटों का जोड़ चुनावी जीत की गारंटी नहीं है.

अखिलेश के सामने सबसे बड़ी चुनौती

अखिलेश यादव के सामने चुनौती सिर्फ गुर्जरों और दलितों को जोड़ने की नहीं है, बल्कि इन समुदायों को संगठन और टिकट में पर्याप्त राजनीतिक हिस्सेदारी देने की भी है. सपा लंबे समय से पश्चिमी यूपी में किसी बड़े गुर्जर चेहरे की कमी महसूस कर रही है. पार्टी अब इस कमी को पूरा करने की दिशा में भी काम कर सकती है. सपा ने गुर्जर समाज के बीच पहुंच बढ़ाने के लिए रणनीति भी बनाई है. इससे साफ है कि अखिलेश यादव पश्चिमी यूपी को सिर्फ गठबंधन के भरोसे नहीं छोड़ना चाहते, बल्कि खुद सामाजिक समीकरण तैयार करने में जुटे हैं.

2027 में पश्चिमी यूपी बनेगा बड़ा रणक्षेत्र

कुल मिलाकर 2027 में पश्चिमी यूपी की लड़ाई सिर्फ भाजपा बनाम सपा नहीं होगी, बल्कि यह जाट, गुर्जर, दलित, मुस्लिम और गैर-यादव ओबीसी वोटों की सोशल इंजीनियरिंग की भी लड़ाई होगी. जयंत चौधरी के भाजपा के साथ होने से सपा के सामने जाट वोटों का पुराना समीकरण कमजोर हुआ है. ऐसे में अखिलेश यादव अब मुस्लिम + यादव के पुराने आधार में दलित + गुर्जर को जोड़कर नया ‘पीडीए प्लस’ फॉर्मूला तैयार करने की कोशिश में हैं.

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