UP में BJP अपनाएगी ‘गुजरात मॉडल’? 40-50% मौजूदा विधायकों के टिकट पर संकट

बीजेपी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए टिकट बंटवारे में बड़ा बदलाव कर रही है. 'गुजरात मॉडल' की तर्ज पर 'जीतने की क्षमता' को प्राथमिकता दी जाएगी, जिससे 40-50% मौजूदा विधायकों के टिकट कट सकते हैं. आंतरिक सर्वे और जमीनी फीडबैक के आधार पर उम्मीदवारों का चयन होगाय

यूपी बीजेपी की नई रणनीति

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी संगठन और टिकट वितरण को लेकर बड़े बदलाव की तैयारी में जुटी है. पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं के मुताबिक, इस बार टिकट बंटवारे में ‘जीतने की क्षमता’ यानी विनिवेबिलिटी को सबसे अहम पैमाना बनाया जा सकता है. माना जा रहा है कि करीब 40 से 50 फीसदी मौजूदा विधायकों के टिकट पर दोबारा विचार हो सकता है.

दिलचस्प बात यह है कि टिकट कटने या नए चेहरे को मौका दिए जाने का फैसला किसी एक नेता की पसंद-नापसंद पर निर्भर नहीं होगा. पार्टी का सर्वे, जमीनी फीडबैक, संगठन की रिपोर्ट और स्थानीय स्तर पर जनता और कार्यकर्ताओं के बीच विधायक की पकड़, इन सभी पहलुओं को मिलाकर उम्मीदवार के भविष्य का फैसला किए जाने की तैयारी है.

यानी इस बार सिर्फ यह मायने नहीं रखेगा कि विधायक ने पिछला चुनाव जीता था या नहीं. पार्टी यह भी देखेगी कि अगले चुनाव में वही चेहरा दोबारा जीत दिलाने की स्थिति में है या नहीं.

इंटरनल सर्वे में एंटी-इंकम्बेंसी के संकेत

बीजेपी ने हाल में एक इंटरनल सर्वे कराया है. पार्टी सूत्रों के मुताबिक इस सर्वे में बड़ी संख्या में मौजूदा विधायकों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर एंटी-इंकम्बेंसी यानी नाराजगी के संकेत मिले हैं. सर्वे में सिर्फ आम मतदाताओं की राय ही नहीं, बल्कि स्थानीय कार्यकर्ताओं और संगठन से जुड़े लोगों के फीडबैक को भी अहम माना गया है.

नाराजगी के पीछे कई स्थानीय कारण बताए जा रहे हैं. इनमें जनप्रतिनिधियों की कथित निष्क्रियता, जनता से दूरी और संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ संवाद की कमी जैसे मुद्दे प्रमुख हैं.

उम्मीदवार दोहराने का फैसला नुकसानदेह

दरअसल, चुनावी राजनीति में कार्यकर्ता सिर्फ पोस्टर लगाने या बूथ संभालने वाला व्यक्ति नहीं होता. वह अपने इलाके में पार्टी और जनता के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होता है. ऐसे में अगर वही कार्यकर्ता अपने विधायक से नाराज है, तो संगठन के लिए यह महज एक आंतरिक शिकायत नहीं बल्कि चुनावी संकेत भी माना जा सकता है.

बीजेपी के 2024 लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन की समीक्षा में भी उम्मीदवारों को लेकर एक अहम बात सामने आई थी. पार्टी के भीतर हुई समीक्षा में यह चर्चा हुई कि कई मौजूदा सांसदों को लगातार दोहराने का फैसला कुछ सीटों पर पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हुआ.

‘कौन जीत सकता है’ इस बार रहेगा अहम

अब विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी उसी अनुभव से सबक लेते हुए पहले से ज्यादा सख्त उम्मीदवार चयन की रणनीति अपनाने की तैयारी में है. यही वजह है कि इस बार किसी विधायक की पुरानी जीत, राजनीतिक कद या लंबे समय से पार्टी से जुड़े होने भर को टिकट की गारंटी नहीं माना जा रहा.

‘किसका टिकट कटेगा’ से ज्यादा महत्वपूर्ण होगा ‘कौन जीत सकता है’. पार्टी के भीतर चर्चा का सबसे अहम बिंदु यही है कि टिकट वितरण में व्यक्तिगत पसंद या किसी एक नेता की सिफारिश के बजाय सिस्टम आधारित फीडबैक को प्राथमिकता दी जाए.

उम्मीदवार चयन में कठोर फैसले लिए जा सकते हैं

सूत्रों के मुताबिक केंद्रीय नेतृत्व और प्रदेश नेतृत्व के बीच इस बात पर सहमति है कि चुनाव में जीत के लक्ष्य के रास्ते में आने वाली हर राजनीतिक बाधा को दूर करने के लिए उम्मीदवार चयन में कठोर फैसले लिए जा सकते हैं. इसका मतलब साफ है इस बार सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि किस विधायक का टिकट काटना है, बल्कि उससे बड़ा सवाल यह होगा कि उसकी जगह कौन सा चेहरा पार्टी को चुनाव जिता सकता है.

बीजेपी की रणनीति सिर्फ अपने उम्मीदवारों तक सीमित रहने की संभावना नहीं है. यूपी में उसके सहयोगी दलों के उम्मीदवारों के चयन में भी बीजेपी की भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है. यानी गठबंधन की सीटों पर भी पार्टी का फोकस सिर्फ सीटों के बंटवारे तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उम्मीदवार की चुनावी स्वीकार्यता और जीतने की क्षमता को भी महत्व दिया जा सकता है.

इस बार टिकट वितरण का फॉर्मूला काफी अलग

  • सर्वे क्या कहता है?
  • जमीन पर जनता का मूड क्या है?
  • स्थानीय कार्यकर्ता क्या सोचते हैं?
  • विधायक की अपने क्षेत्र में सक्रियता कितनी है?
  • संगठन के साथ उसका तालमेल कैसा है?
  • और सबसे अहम, क्या वह अगले चुनाव में पार्टी को जीत दिलाने की स्थिति में है?

इन सवालों के जवाब टिकट के फैसले में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. अगर पार्टी की मौजूदा रणनीति इसी दिशा में आगे बढ़ती है, तो उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव का टिकट वितरण कई मौजूदा चेहरों के लिए बड़ा राजनीतिक इम्तिहान साबित हो सकता है.

बीजेपी के लिए यह सिर्फ टिकट बदलने की कवायद नहीं, बल्कि 2024 के लोकसभा चुनाव के अनुभव से सबक लेकर विधानसभा चुनाव के लिए संगठन, उम्मीदवार और जमीनी समीकरण को नए सिरे से साधने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

रिपोर्ट- अमोद राय, टीवी9 भारतवर्ष

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