सामाजिक न्याय से लेकर MLA-MP की मीटिंग तक… दलित वोटों के लिए कांग्रेस-सपा क्या कर रही?
उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोटों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. बसपा के कमजोर होते जनाधार के बीच समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दलित मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में जुटी हैं. कांग्रेस 21 अगस्त से सामाजिक न्याय सम्मेलन शुरू कर रही है, जिसमें ‘जितनी आबादी, उतना हक’ जैसे मुद्दे प्रमुख होंगे. वहीं सपा अपने दलित विधायकों और नेताओं के साथ बैठक कर चुनावी रणनीति तैयार कर रही है.
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी जंग जैसे-जैसे करीब आ रही है, दलित वोट बैंक को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ती जा रही है. कभी बहुजन समाज पार्टी का मजबूत आधार रहे दलित मतदाताओं के बीच अब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस अपनी पैठ बढ़ाने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही हैं. दोनों दलों की नजर उस राजनीतिक स्पेस पर है, जो पिछले कुछ चुनावों में बसपा के कमजोर होने से बना है.
कांग्रेस ने इस दिशा में अभियान शुरू करने का फैसला किया है. पार्टी 21 अगस्त से प्रदेश में सामाजिक न्याय सम्मेलन आयोजित कर रही है. लखनऊ से शुरू होने वाले इस अभियान के जरिए दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं तक पहुंच बनाने के साथ ‘जितनी आबादी, उतना हक’ जैसे मुद्दों को प्रमुखता देने की तैयारी है. वहीं, समाजवादी पार्टी (सपा) ने अपने दलित विधायकों के साथ मीटिंग शुरू कर दी. इसमें दलित वोटरों को अपने पाले में लाने की रणनीति बनेगी.
कांग्रेस का सामाजिक न्याय सम्मेलन, दलित-पिछड़ों पर फोकस
कांग्रेस की रणनीति सिर्फ सम्मेलन तक सीमित नहीं है. पार्टी ने दलित नेता राजेंद्र पाल गौतम को यूपी का प्रभारी बनाकर संकेत दिया है कि 2027 की लड़ाई में दलित सामाजिक समीकरण उसके लिए अहम है. कांग्रेस लंबे समय बाद अपने पुराने दलित जनाधार को वापस पाने की कोशिश में जुटी है. 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस गठबंधन को दलित मतदाताओं के एक हिस्से का समर्थन मिला था. अब दोनों दलों की कोशिश इस समर्थन को 2027 के विधानसभा चुनाव तक बनाए रखने और उसे और व्यापक करने की है.
सपा भी दलित नेताओं से बना रही सीधा संपर्क
कांग्रेस की सक्रियता के बीच समाजवादी पार्टी भी दलित वोटों को लेकर लगातार रणनीतिक काम कर रही है. पार्टी नेतृत्व दलित समाज से जुड़े नेताओं, सांसदों और विधायकों को पार्टी कार्यालय बुलाकर अलग-अलग मुलाकात कर रहा है. इनमें रागिनी सोनकर और अवधेश प्रसाद जैसे प्रमुख दलित चेहरे शामिल हैं. इसके अलावा विधायक गौरव रावत, सांसद आरके चौधरी, तूफानी सरोज, इंद्रजीत सरोज, जितेंद्र कुमार दोहरे, रमेश गौतम, छोटेलाल खरवार, योगेश चौधरी और मिठाई लाल भारती समेत कई दलित नेताओं के साथ अलग-अलग बैठकें कर पार्टी की रणनीति पर चर्चा की जा रही है.
सूत्रों के मुताबिक, इन बैठकों में दलित समाज से जुड़े मुद्दों, संगठन में उनकी भूमिका और 2027 के चुनाव में दलित मतदाताओं तक पार्टी की पहुंच बढ़ाने की रणनीति पर फोकस किया जा रहा है. इसके अलावा संगठन से जुड़े दलित नेताओं के साथ भी संवाद बढ़ाया जा रहा है. सपा की कोशिश इन नेताओं को केवल चुनावी समर्थन तक सीमित रखने की नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए उन्हें पार्टी के व्यापक सामाजिक गठजोड़ का हिस्सा बनाने की है.
मायावती के कमजोर होते आधार ने खोला नया सियासी मैदान
दलित राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि लंबे समय तक इस वर्ग की राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा मायावती रही हैं. बसपा का राजनीतिक प्रभाव कमजोर होने के बाद दलित वोटों का एक हिस्सा अलग-अलग दलों की ओर जाता दिखाई दिया है. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी दलित मतदाताओं के बीच बदलाव देखने को मिला और सपा-कांग्रेस गठबंधन को इसका लाभ मिला.
यही वजह है कि 2027 से पहले सपा और कांग्रेस दोनों इस संभावना को अपने पक्ष में मजबूत करना चाहते हैं. कांग्रेस जहां सामाजिक न्याय, आरक्षण और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों के जरिए दलित-पिछड़े वर्ग को जोड़ने की कोशिश कर रही है, वहीं सपा अपने पीडीए यानी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक सामाजिक समीकरण को और मजबूत करने में जुटी है.
सपा की रणनीति- मायावती के सामने नया विकल्प खड़ा करना
सपा की रणनीति का एक बड़ा हिस्सा यह संदेश देने की कोशिश भी माना जा रहा है कि दलित हितों की राजनीति का विकल्प सिर्फ बसपा नहीं है. पार्टी दलित नेताओं को संगठन में सक्रिय भूमिका देने और उनके जरिए समाज के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने पर जोर दे रही है. सपा-कांग्रेस गठबंधन की स्थिति में यह रणनीति और महत्वपूर्ण हो सकती है. दोनों दलों की कोशिश मुस्लिम-यादव के पार जाकर दलितों और अन्य पिछड़े वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की है.
राजनीतिक समीकरण के लिहाज से देखें तो यदि दलित, पिछड़ा और अल्पसंख्यक वोट का एक बड़ा हिस्सा विपक्ष के साथ जुड़ता है, तो यह 2027 के विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण बढ़त बन सकता है. हालांकि, दलित मतदाताओं का रुझान एकसमान नहीं है और अलग-अलग क्षेत्रों में इनके राजनीतिक व्यवहार में अंतर भी देखने को मिलता है.
दलित वोटों की लड़ाई अब त्रिकोणीय से ज्यादा व्यापक
उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता करीब 21-22 प्रतिशत माने जाते हैं. यही वजह है कि 2027 के चुनाव में यह वर्ग किसी भी दल की जीत-हार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है. फिलहाल दलित वोटों को लेकर मुकाबला केवल भाजपा और बसपा के बीच सीमित नहीं दिख रहा. सपा, कांग्रेस और भाजपा—सभी अपने-अपने तरीके से दलित समाज तक पहुंच बनाने में जुटे हैं. 2027 की चुनावी लड़ाई में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि मायावती के पारंपरिक दलित वोट बैंक में सेंध लगाने में सपा-कांग्रेस कितनी कामयाब होती हैं?