नहीं बताई गिरफ्तारी की वजह, 3 महीने तक जेल में रखा; HC ने लिया बड़ा एक्शन… हिल गई सरकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस और प्रशासन को अवैध हिरासत के एक मामले में कड़ी फटकार लगाई है. उन्नाव के एक युवक को बिना वजह बताए 3 महीने जेल में रखने पर हाईकोर्ट ने ₹10 लाख का हर्जाना लगाया, जिसे जिम्मेदार अधिकारियों के वेतन से वसूला जाएगा. कोर्ट ने अपर मुख्य सचिव (गृह) की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए हैं, जिससे सरकार में हड़कंप मच गया है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ

उत्तर प्रदेश में पुलिस और प्रशासन को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने कड़ी फटकार लगाई है. वहीं अवैध हिरासत के एक मामले में हाईकोर्ट ने ₹10 लाख का हर्जाना लगाया है. साथ ही व्यवस्था दी है कि हर्जाने की रकम संबंधित अधिकारियों के वेतन से वसूल किया जाए.इसी के साथ कोर्ट ने टिप्पणी की है कि जब इतने बड़े अधिकारी अपर मुख्य सचिव, गृह का ये हाल है तो अन्य अधिकारी और कर्मचारी किस स्तर पर काम कर रहे होंगे. कोर्ट के इस एक्शन से हड़कंप मच गया है.

मामला उन्नाव के रहने वाले एक युवक को बिना सूचना दिए अरेस्ट करने, अरेस्टिंग का कोई लिखित कारण ना बताने और तीन महीने तक जेल में रखने का है. युवक द्वारा दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने युवक को तत्काल प्रभाव से रिहा करने का आदेश दिया है. मामले की सुनवाई हाईकोर्ट में जस्टिस अब्दुल मोइन और जस्टिस प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ में हुई. इसमें कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि राज्य सरकार इस राशि को जिम्मेदार अधिकारियों से वसूल कर सकती है.

एसीएस होम पर उठाए सवाल

हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए अपर मुख्य सचिव गृह की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने यह कहते हुए नोट किया कि अपर मुख्य सचिव गृह ने हलफनामे में यह तक नहीं बताया कि हर्जाना क्यों न लगाया जाए. इस मामले में फैसला सुनाते समय खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला दिया. कहा कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का कारण लिखित रूप में बताना एजेंसी का संवैधानिक दायित्व है. वहीं इसे नजरअंदाज करना नागरिक के मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है.

क्या है पूरा मामला?

याचिकाकर्ता मनोज कुमार को 27 जनवरी 2026 को उन्नाव जिले के असिवन थाने में दर्ज एक मामले में गिरफ्तार किया गया था. कोर्ट ने पाया कि गिरफ्तारी के बाद तीन महीने तक मनोज कुमार को उसकी गिरफ्तारी का कारण नहीं बताया गया, बावजूद इसके उसे जेल में रखा गया. पुलिस ने न तो कोई स्पष्ट आरोप तय किए और ना ही जेल में रखने का कारण बताया. मामले की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि यदि मनोज कुमार के खिलाफ कोई अन्य मामला ना हो तो उसे तत्काल रिहा किया जाए. इसी के साथ कोर्ट ने अधिकारियों को चेताया कि गिरफ्तारी का कारण लिखित रूप में बताना अनिवार्य है.

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