डकैती के झूठे आरोप में 24 साल काटी जेल… कहानी मैनपुरी के आजाद की, जिसे रिहाई बमुश्किल मिली
सिस्टम की लचर व्यवस्था ने मैनपुरी के आजाद खान से जीवन के ढाई दशक छीन लिए. आजाद ख़ान को डकैती के झूठे मुकदमे में 24 साल 8 महीने से अधिक समय तक कैद रखा गया. इस दौरान दो बार उसे पागलखाने भी भेजा गया. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस पर सवाल उठाते हुए अब उन्हें निर्दोष बरी किया है.
मैनपुरी के रहने वाले आजाद खान को सिस्टम की लचर व्यवस्था का बड़ा बोझ उठाना पड़ा. डकैती के झूठे मुकदमे में 24 साल 8 महीने जेल में काटनी पड़ी. आजाद ख़ान जेल में रहते हुए दो बार पागलखाने भी गए. इस बीच हाईकोर्ट ने उन्हें निर्दोष बरी कर दिया है. लेकिन इसके बाद भी आजाद खान को जेल से बाहर आने में मुश्किलों का सामने करना पड़ा.
22 अक्टूबर 2000 को एलाऊ थाना में मुक़दमा दर्ज हुआ था. पिछले साल 19 दिसंबर 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उन्हें निर्दोष बरी कर दिया. लेकिन एक पुराने मामले में 7 हजार रुपये का जुर्माना बकाया था. इसको लेकर उन्हें जेल से छुटने में और इंतजार करना पड़ा, जिससे गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं.
पुलिस ने कोई ठोस सबूत या साक्ष्य पेश नहीं किए
आजाद ख़ान मैनपुरी के थाना एलाऊ क्षेत्र के ग्राम व्योति कटरा के रहने वाले है. इस मामले में साल 2000 को एलाऊ थाना में उनके साथ कुल सात लोगों पर मुक़दमा दर्ज हुआ था. मैनपुरी की अदालत में यह मुकदमा चल रहा था. इस मामले में अपर सत्र न्यायाधीश ने आजाद को धारा 395 और 397 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.
वहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टीस जेजे मुनीर की पीठ ने 19 दिसंबर 2025 को मामले की सुनवाई की. इस दौरान कोर्ट ने पुलिस और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया. साथ ही पाया कि पुलिस ने कोई ठोस सबूत या विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं की. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि केवल इकबालिया बयान के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता.
दोषमुक्त होने के बाद भी अटक गई थी रिहाई
हाईकोर्ट ने इसके बाद आजाद खान को डकैती के सभी आरोपों से पूरी तरह दोषमुक्त कर दिया. हालांकि, इसके बाद भी आजाद खान को ‘आजादी’ के लिए संघर्ष करना पड़ा. एक पुराना मामला उनके खिलाफ दर्ज था, जिसमें वह 10 साल की सजा पूरी कर चुका था, लेकिन 7 हजार रुपये का जुर्माना बकाया था. इससे आजाद की रिहाई अटल गई.
आजाद खान की रिहाई रुकने के बाद परिजन सात हजार रुपये इकट्ठा करने में लग गए. इस बीच मामला एक एनजीओ ‘छोटी सी आशा’ के पास पहुंचा. जिसके बाद एनजीओ ने पैसे की व्यवस्था कर उनका जमानत कराया. इसके बाद बुधवार देर रात आजाद अपने घर पहुंचे. लेकिन इस घटना ने न्याय व्यवस्था की खामियों को एक बार उजागर कर दिया है.