कलियुग के भगीरथ! एक ऐसा IAS, जिसने भैंसी नदी में भी बहा दी निर्मल जलधारा; दशकों से सूखी थी

शाहजहांपुर के डीएम धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने अपने 'भगीरथ प्रयास' से दशकों से सूखी पड़ी भैंसी नदी को पुनर्जीवित कर दिया है. 'एक जनपद एक नदी' अभियान के तहत, ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों के सहयोग से अतिक्रमण मुक्त कर, 45 किलोमीटर तक नदी में जलधारा लौट आई है. इस असाधारण पहल से पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के लिए नई आशा जगी है.

भैंसी नदी के भगीरथ

पौराणिक ग्रंथों में आपने भगवान श्रीराम के पूर्वज भगीरथ की कथाएं खूब पढ़ी होंगी. वही भगीरथ, जिन्होंने महाराज सगर के 100 पुत्रों के मोक्ष के लिए पतित पावनी गंगा को धरती पर ले आए. इस कलियुग में भी एक भगीरथ इस समय खूब चर्चा में हैं. ये भगीरथ कोई और नहीं, बल्कि शाहजहांपुर के डीएम व वरिष्ठ आईएएस धर्मेंद्र प्रताप सिंह हैं. जिनके भगीरथ प्रयास से शाहजहांपुर की भैंसी नदी एक बार फिर पुर्नजीवित हो उठी है.

दशकों से इस नदी की जमीन पर भू माफियाओं का कब्जा था. लेकिन अब इस कब्जे से मुक्त होकर यह नदी एक बार फिर से सांस लेने लगी है. दशकों से सूखी पड़ी इस नदी में दोबारा पानी की जल धारा देखने के लिए सामाजिक संगठन और ग्रामीण भी अभिभूत हैं. भैंसी नदी के पुनर्जीवित होने से आसपास के गांवों में उम्मीद लौट आई है. डीएम शाहजहांपुर ने सामाजिक संगठनों और ग्रामीणों के साथ मिलकर अभियान चलाया. इससे नदी अपने प्राकृतिक प्रवाह में लगभग 45 किलोमीटर तक पहुंच चुकी है.

भैंसार बांध है नदी का उद्गम

पीलीभीत जिले के भैंसार बांध को इस नदी का उद्गम स्थल कहा जाता है. यहां से चलकर भैंसी नदी शाहजहांपुर जिले में प्रवेश करती है. जनपद के बंडा ब्लैक स्थित गहलोईया गांव के पास आकर इसमें दूसरी धारा मिलती है. फिर दोनों धाराएं दलेलापुर गांव के पास एक होकर लगभग 56 किलोमीटर का सफर तय करते हुए पन्ना घाट पर गोमती नदी में जाकर मिल जाती है.

हजारों हाथों का संकल्प

कलियुग के भागीरथ कहे जा रहे डीएम धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने जब शाहजहांपुर में सरकार की “एक जनपद एक नदी” योजना की शुरुआत की, जिले के तमाम सामाजिक संगठन उनके अभियान में जुड़ गए. देखते ही देखते एक लंबा कारवां बन गया. स्थानीय लोगों के मुताबिक इस नदी में 30-35 साल पहले नदी की जलधारा पूरे साल बहती थी. बाद में यह नदी अतिक्रमण की गिरफ्त में आकर सूखती चली गई.

क्यों जरूरी है भैंसी नदी?

पर्यावरण वैज्ञानिकों के मुताबिक नदी का प्राकृतिक मार्ग बाधित होने से उसका जल चक्र टूट जाता है. चूंकि नदियों के नीचे मौजूद प्राकृतिक जल स्रोत होते हैं, जिन्हें आर्टिशियल बेल कहा जाता है. यह नदी को पानी देते हैं और उसे रिचार्ज भी होते हैं. इससे ना केवल सिंचाई के लिए किसानों को पानी उपलब्ध होता है, बल्कि तमाम जीव जंतु और पशु पक्षी भी पानी पीकर तृप्त होते हैं. भैंसी नदी पुवायां तहसील के डाह, नेवादा रसूलापुर, देवकली मीरपुर जेवा सहित सैकड़ों गांव के लोग अब नदी को बहते हुए देखकर आशांवित हैं.

ऐसे हुआ भगीरथ प्रयास

डीएम धर्मेंद्र प्रताप सिंह के आहृवान पर भैंसी नदी को पुर्नजीवित करने के लिए सरकारी तंत्र के साथ सामाजिक संगठन और ग्रामीण खुद-ब-खुद शामिल होते चले गए. नदी की खुदाई की निगरानी खुद ग्रामीणों ने की और एक-एक किलोमीटर का एरिया आपस में बांट लिया. सामाजिक संगठनों ने सहभागिता करते हुए अभियान को धार दी. नदी की खुदाई के साथ किनारे पर पौधे रोपे गए. ग्रामीणों के मुताबिक भैंसी नदी को पुनर्जीवित करने का प्रयास सराहनीय है.

अब तक कब्जा मुक्त हुए 80 तालाब

स्थानीय लोगों के मुताबिक अब तक 80 से अधिक तालाब कब्जा मुक्त कराए गए हैं. नदी के किनारे लगभग 40000 से भी अधिक पेड़ लगाए जा चुके हैं. अभियान में सरकारी धन का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है, बल्कि लोग स्वयं का सहयोग और श्रम देकर इस नदी को पुनर्जीवित करने के अभियान में जुटे हुए हैं.

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