Mirza Ghalib Death Anniversary: नहीं रहेगी वो दालमंडी जिसने ग़ालिब को बनारस से मोहब्बत करना सिखाया

वाराणसी की तीन सौ साल पुरानी विरासत 'दालमंडी' अब इतिहास बनने जा रही है. यह वही दालमंडी है जिसने मिर्ज़ा ग़ालिब को बनारस से प्रेम करना सिखाया. उनकी महान रचना 'चिराग़-ए-दैर' के लिए प्रेरणा बनी. ग़ालिब ने यहां तीन महीने बिताए, और इस शहर को 'हिंदुस्तान का काबा' कहा.

ग़ालिब का बनारस प्रेम

हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है… उर्दू और फारसी के महान शायर असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ ‘ग़ालिब’ की आज 150वीं पुण्यतिथि है. ग़ालिब का 15 फरवरी 1869 को निधन हो गया था. ग़ालिब का बनारस और दालमंडी से भी गहरा जुड़ाव रहा. चूंकी तीन सौ साल पुरानी दालमंडी अब इतिहास का हिस्सा बनने जा रही है. आधुनिकता की दौड़ में, अदब, संगीत और तहजीब की यह विरासत बस यादें बनकर रह जाएगी, जिनपर कभी दालमंडी को नाज़ था. इस गली से जुड़ा एक ऐसा ही पहलू है “मिर्ज़ा ग़ालिब”.

एक ऐसा फनकार जिसके लिए कहा गया है कि, ‘हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गालिब का है अन्दाज-ए-बयां और’. ग़ालिब बनारस में तीन महीने से ज़्यादा रुकें और बनारस को बड़ी करीब से देखा समझा. ग़ालिब बनारस 1827 के नवंबर लास्ट में आएं और फरवरी 1828 तक रुकें. यह कहानी मिर्जा गालिब की बनारस यात्रा और दालमंडी से जुड़ाव की है.

बीएचयू के उर्दू विभाग के प्रोफेसर अब्दुस समी कहते हैं कि ऐसा माना जाता है कि मिर्ज़ा ग़ालिब दालमंडी के घुघरानी गली के पास कहीं रुके थें. 1969 में जब ग़ालिब का शताब्दी वर्ष मनाया गया तब नज़ीर बनारसी के नेतृत्व में एक कमिटी बनी थी जो घुघरानी गली के बगल में एक छोटी सी गली जहां ग़ालिब रुके थे उसको कुचा-ए-ग़ालिब का नाम भी दिया था. हालांकि इसके लिखित प्रमाण नहीं मिलते.

बीएचयू के ही प्रोफेसर क़ासिम कहते हैं कि ग़ालिब अपने पेंशन के सिलसिले में दिल्ली से कलकत्ता जाने के दौरान बनारस पहुंचे थे. बनारस से पहले वो इलाहाबाद पहुंचे थे. लेकिन इलाहाबाद की आबो हवा उन्हें बिल्कुल रास नहीं आई और वो बीमार हो गए. इलाहाबाद में वो इस कदर आजिज़ आ गए थे कि उन्होंने यहां तक कह दिया कि ‘यदि जन्नत का रास्ता इलाहाबाद से होकर जाता है तो मुझे जन्नत नहीं चाहिए ‘.

बनारस ग़ालिब को इतना भाया कि वह अपने मित्र को लिखे एक पत्र में कहते हैं, ‘अगर दुश्मनों का डर नहीं होता तो मैं अपना धर्म छोड़कर, माथे पर तिलक लगाता, जनेऊ और ब्राह्मण के कपड़े पहनता और गंगा के किनारे तब तक बैठा रहता जब तक कि दुनियावी दिलचस्पी से मुक्त न हो जाता. अगर मैं इसे दुनिया के दिल का नुक़्ता कहूं तो दुरुस्त है. इसकी आबादी और इसके अतराफ़ के क्या कहने! अगर हरियाली और फ़ूलों के ज़ोर की वजह से मैं इसे ज़मीन पर जन्नत कहूं तो बजा है. इसकी हवा मुर्दों के बदन में रूह फूंक देती है.’

हालांकि ग़ालिब के बनारस में रुकने की ठीक-ठीक जगह कौन सी है इसको लेकर भी दो मत हैं. एक तो ये है कि ग़ालिब दालमंडी की घुघरानी गली में अपने एक रिश्तेदार के पास रुके थे जबकि दूसरा मत ये है कि वो बनारस के औरंगाबाद के एक सराय में रुके थे.

उर्दू के प्रसिद्ध शायर और नाटककार आगा हश्र कश्मीरी के पोते आगा निहाल अहमद शाह कहते हैं कि ग़ालिब कहां रुकें थे इसपर भले दो मत हो लेकिन अपने बनारस प्रवास के दौरान उनका एक लम्बा वक़्त दालमंडी में बीता. दालमंडी में उनके रिश्तेदार मिर्ज़ा बिस्मिल्लाह रहते थें जहां ग़ालिब का अच्छा खासा वक़्त बीतता था.

बीएचयू के उर्दू विभाग के प्रोफेसर क़ासिम कहते हैं कि मिर्ज़ा ग़ालिब की पॉपुलैरिटी तब तक काफी बढ़ गई थी. लेकिन ग़ालिब अपने पेंशन के संबंध में कलकत्ता जा रहे थे लिहाजा उन्होंने अपने बनारस आने की जानकारी काशी नरेश को भी नही दिएं. वो बेहद लो प्रोफाइल के साथ बनारस में रहें और बनारस को महसूस किया.

प्रोफेसर क़ासिम कहते हैं कि मिर्ज़ा ग़ालिब की बनारस-यात्रा की ये बात मशहूर है कि उन्होंने बनारस में जो कुछ भी देखा था उसे अपने एक मसनवी ‘चिराग-ए-दैर’ में लिखा. यह मसनवी उन्होंने फ़ारसी में लिखी थी. बनारस पहुंचकर जब ग़ालिब ने यहां 3 हफ़्ते गुज़ारे और शहर से परिचित हो गए तब उन्होंने अपने दोस्त मौलवी मोहम्मद अली खां को एक लंबा पत्र लिखा.

इस पत्र में बनारस के संबंध में उनकी मन:स्थितियों का बेहद मार्मिक चित्रण मिलता है. वे लिखते हैं, ‘जब मैं बनारस में दाखिल हुआ, उस दिन पूरब की तरफ़ से जान बख़्शने वाली, जन्नत की-सी हवा चली, जिसने मेरे बदन को तवानाई अता की और दिल में एक रूह फूंक दी. उस हवा के करिश्माई असर ने मेरे जिस्म को फ़तह के झंडे की तरह बुलंद कर दिया. ठण्डी हवा की लहरों ने मेरे बदन की कमजोरी दूर कर दी. “

ग़ालिब ने अपने बनारस प्रवास के अनुभव पर फारसी मसनवी चरागे-ए-दैर लिखा.चराग-ए-दैर मतलब मंदिर का दीपक होता है. ये 108 छंदों की एक पोएट्री है जिसमें ग़ालिब ने बनारस को गंगा-जमनी तहज़ीब का ह्रदय बताया है. प्रोफेसर क़ासिम कहते हैं कि बनारस को लेकर अपनी पोएट्री चराग-ए-दैर में ग़ालिब लिखते हैं कि “तआला अल्लाह ! बनारस, चश्म-ए-बद्दूर बहिश्त-ए -ख़ुर्रम-ओ -फ़िरदोस-ए-मामूर” (अनुवाद: सुब्हान अल्लाह! वाह-वाह! बनारस के क्या कहने हैं. वह तरोताज़ा जन्न्त और भरी-पूरी फ़िरदौस है. )

इबादत ख़ाना-ए-नाक़ूसियानस्त
हमाना काबा-ए-हिंदोस्तानस्त

अनुवाद

मैं आंखों देखे
और कानों सुने
अपने अनुभव
ज़ेहन में रखकर
यह कहता हूं

बनारस
आस्थावानों का
इक पावन
इबादतख़ाना है

बेशक यह
हिंदुस्तान का
काबा है…….

बनारस से जाने के करीब पैंतीस साल बाद अपने एक मित्र को मिर्जा गालिब ने पत्र लिखा था कि अगर मैं अपनी जवानी में काशी जाता तो इस शहर को छोड़कर नहीं जा पता.इस शहर का जादू ऐसा है कि आज तक मैं उसे भूल नहीं सका……