‘बनारस के यार जुलाहे’… हैंडलूम डे पर काशी के बुनकरों की हालत को बयां करती ग्राउंड रिपोर्ट

नेशनल हैंडलूम डे के 11 साल बाद भी बनारस के बुनकरों की जिंदगी में बदलाव को लेकर सवाल कायम हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग, सरकारी योजनाओं, हैंडलूम मेले और नए ब्रांड्स के आने से सेक्टर में रिवाइवल हुआ है. बनारसी साड़ी की मांग और बाजार बढ़ा है, लेकिन कई बुनकर अब भी पावरलूम से मुकाबला, कम मजदूरी और सरकारी योजनाओं की जानकारी के अभाव से जूझ रहे हैं. असली चुनौती हैंडलूम की पहचान बचाने और बुनकरों को स्थायी रोजगार देने की है.

बनारस में करीब 90 हज़ार से ज़्यादा पॉवर लूम हैं, जबकि 8 हज़ार से ज़्यादा हैंडलूम हैं.

‘दिवस हमेशा कमजोर का ही मनाया जाता है—जैसे महिला दिवस, अध्यापक दिवस, मजदूर दिवस… पर कभी ‘थानेदार दिवस’ नहीं मनाया जाता.’ जाने-माने व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई की ये पंक्तियां भले ही अलग संदर्भ में कही गई हों, लेकिन इनमें ‘बुनकर दिवस’ या ‘हैंडलूम डे’ जोड़ दें तो भी इन पंक्तियों का भावार्थ बहुत नहीं बदलता. सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि सरकार खुद मानती है कि देश का हैंडलूम सेक्टर कमजोर हुआ है.

यही वजह है कि 2015 से देश में नेशनल हैंडलूम डे मनाने की शुरुआत हुई. नेशनल हैंडलूम डे की शुरुआत करते हुए केंद्र सरकार ने कहा था कि बुनकरों की जिंदगी में खुशहाली लाने और स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए यह दिवस मनाया जाएगा, लेकिन 11 साल बाद सवाल अब भी वही है कि क्या 2015 के बाद देश के बुनकरों के हालात में वाकई बदलाव आया है? क्या बनारस का बुनकर अपने पुश्तैनी हुनर से खुशहाल हुआ है?

‘1990 से 2010 तक त्राहिमाम की स्थिति थी, अब हैंडलूम में रिवाइवल’

बनारसी साड़ी और बुनकर उद्योग पर लंबे समय से काम कर रहे पद्मश्री डॉ. रजनीकांत, जो जीआई एक्सपर्ट भी हैं, बदलाव को सकारात्मक मानते हैं. हमने उनसे पूछा कि 2015 से नेशनल हैंडलूम डे मनाए जाने के बाद इन 11 वर्षों में हैंडलूम बुनकरों की स्थिति में क्या बदलाव आया? इस पर डॉ. रजनीकांत कहते हैं कि 1990 से 2010 तक हैंडलूम सेक्टर में त्राहिमाम वाली स्थिति थी, सरकार का ढुलमुल रवैया, चीन का नकली रेशम और दम तोड़ता टेक्सटाइल उद्योग बुनकरों के पलायन और बुनकरी छोड़ने की वजह बने.

उनके मुताबिक आज हैंडलूम सेक्टर रिवाइवल की स्थिति में है. वह कहते हैं कि हैंडलूम डे मनाए जाने के बाद इस क्षेत्र को लेकर सरकार और बाजार दोनों स्तरों पर काम हुआ है. डॉ. रजनीकांत के मुताबिक आज टाटा का तनैरा, बिड़ला का आनंदम और रिलायंस का स्वदेस जैसे ब्रांड हैंडलूम बना रहे हैं. उनका कहना है कि अडानी भी अपना हैंडलूम ब्रांड लेकर बाजार में आने की तैयारी में है. उनके मुताबिक, आज हैंडलूम पर काम करने वाले बुनकरों के पास काम है और कोविड के बाद से हैंडलूम बुनकरों की संख्या करीब 40 फीसदी तक बढ़ी है.

बनारसी साड़ी उद्योग में भी बढ़ोतरी का दावा

डॉ. रजनीकांत के मुताबिक, बनारसी साड़ी उद्योग का सालाना कारोबार करीब 3 हजार करोड़ से 5 हजार करोड़ रुपये के बीच है और बीते पांच सालों में इसमें करीब 20 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई है. उनका दावा है कि हैंडलूम की साड़ी पर प्रॉफिट भी करीब दो गुना बढ़ा है और इसका सीधा लाभ हैंडलूम बुनकरों को मिला है. वह कहते हैं कि आज 800-1000 रुपये से कम मजदूरी में हैंडलूम का बुनकर मिलना मुश्किल है.

कढ़ुआ और तीन-चार रंगों में साड़ी तैयार होने पर मजदूरी एक हजार रुपये से ऊपर पहुंच जाती है. उनके मुताबिक, पांच साल पहले यही मजदूरी करीब 400 रुपये थी. डॉ. रजनीकांत के अनुसार, आज 8 हजार रुपये से कम में ओरिजिनल हैंडलूम साड़ी मिलना मुश्किल है, बनारसी ब्रोकेड, ड्रेस मटेरियल और ओरिजिनल जरी की मांग भी बढ़ी है.

क्या सिर्फ हैंडलूम डे की वजह से हुआ बदलाव?

लेकिन क्या इस बदलाव का पूरा श्रेय सिर्फ नेशनल हैंडलूम डे को दिया जा सकता है? इस सवाल पर डॉ. रजनीकांत कहते हैं कि इसके पीछे कई कारण हैं. इनमें सबसे बड़ा कारण पूरे देश में बना जीआई का माहौल है. हालांकि बनारसी साड़ी को वर्ष 2009 में ही जीआई टैग मिल गया था, लेकिन इसकी टैगिंग 2015 के बाद से शुरू हुई. डॉ. रजनीकांत के मुताबिक, जीआई टैगिंग ने बनारसी साड़ी की जबरदस्त ब्रांडिंग की और इससे कंज्यूमर अवेयरनेस बढ़ी.

हैंडलूम मेले से लेकर इंटरनेशनल बायर मीट तक

अब उपभोक्ता सिल्क खरीदता है तो वह हैंडलूम भी तलाशता है. डॉ. रजनीकांत के मुताबिक, दूसरा बड़ा कारण सरकार की तरफ से हैंडलूम का प्रमोशन है. आज हैंडलूम मेले, प्रदर्शनियां, बायर-सेलर मीट और इंटरनेशनल बायर्स मीट जैसे आयोजन किए जा रहे हैं. इससे बनारसी साड़ी की ब्रांडिंग हो रही है और उसे बाजार मिल रहा है. उनके मुताबिक, सरकार ने पिछले दस साल में एक्सपोर्ट प्रमोशन पर भी काफी काम किया है.

इसका असर यह हुआ कि बनारसी ब्रोकेड, फैब्रिक और कपड़ा पहले की तुलना में ज्यादा मात्रा में विदेशों तक पहुंचा है. होम फर्निशिंग में सिल्क-कॉटन के पर्दे, कुशन और बेड कवर से लेकर लेटेस्ट फैशन में बनारसी हैंडलूम का इस्तेमाल लगातार बढ़ा है.

बनारस में NIFT की ब्रांच, डिजाइन संस्थान की भी तैयारी

डॉ. रजनीकांत बताते हैं कि NIFT जैसी संस्था, जो सामान्य तौर पर एक राज्य में एक ही हो सकती है, पहले रायबरेली में थी. इसके बावजूद सरकार ने बनारस में भी NIFT की ब्रांच खोली. अब नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजाइन की ब्रांच भी बनारस में खुलने जा रही है. उनके मुताबिक पिछले दस सालों में हैंडलूम को लेकर इस तरह के कई प्रयास किए गए हैं.

लेकिन नेशनल हैंडलूम अवॉर्डी की राय अलग

जहां डॉ. रजनीकांत हैंडलूम सेक्टर में सुधार देखते हैं, वहीं नेशनल हैंडलूम अवॉर्ड से सम्मानित अमरेश मौर्या मानते हैं कि तस्वीर इतनी आसान नहीं है. अमरेश मौर्या से जब पूछा गया कि क्या हैंडलूम डे मनाने से बनारसी बुनकरों की स्थिति सुधरी है, तो उन्होंने कहा कि हैंडलूम डे की शुरुआत यह जरूर बताती है कि सरकार और प्रधानमंत्री की मंशा हैंडलूम और बुनकरों का भला करने की थी… इसका कुछ फायदा भी हुआ.

लेकिन उनके मुताबिक सबसे बड़ी समस्या यह है कि हैंडलूम और पावरलूम के बीच अंतर स्पष्ट करने वाला मजबूत सिस्टम नहीं है. अमरेश मौर्या कहते हैं कि अब जीआई टैग लगाकर सूरत और बेंगलुरु के पावरलूम उत्पादों को हैंडलूम बताकर बेचे जाने की शिकायत है. उनके मुताबिक इस पर नियंत्रण और निगरानी की कमी है.

‘बुनकरों की न्यूनतम मजदूरी तय हो’

अमरेश मौर्या का कहना है कि बुनकरों की कोई न्यूनतम मजदूरी आज तक तय नहीं है. वह कहते हैं कि यह सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि पूरे हैंडलूम सेक्टर से जुड़े लोगों की चिंता का विषय होना चाहिए. उनका सुझाव है कि सरकार को ऐसा कानून बनाना चाहिए, जिससे कम से कम हैंडलूम बुनकर को 600 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी मिल सके. अमरेश मौर्या बताते हैं कि उन्हें मार्केटिंग के क्षेत्र में हैंडलूम का नेशनल अवॉर्ड मिला है. उनके 220 हैंडलूम करघे चलते हैं. उन्होंने नीता अंबानी और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को भी साड़ी दी है.

लेकिन उनका कहना है कि अगर सरकार वास्तव में हैंडलूम के लिए कुछ करना चाहती है तो सबसे पहले हैंडलूम और पावरलूम के बीच का अंतर उपभोक्ता को बताना होगा. इसके लिए अवेयरनेस प्रोग्राम और मजबूत मॉनिटरिंग सिस्टम जरूरी है. वरना उनके मुताबिक हैंडलूम का भला होना मुश्किल है.

‘महीने में 15-20 दिन काम मिल जाए तो तकदीरवाला’

बुनकर हाजी ओकास अंसारी की बात तस्वीर के दूसरे पहलू को सामने रखती है. उनका कहना है कि आज अगर महीने में 15 से 20 दिन भी बुनकरों को काम मिल जाए तो वह खुद को तकदीर वाला समझता है. वह कहते हैं कि बनारस के बुनकर सूरत और बेंगलुरु से परेशान हैं. जब कीमत के मामले में मुकाबला नहीं कर पाते तो कई लोग सूरत का माल बनारस का बताकर बेचने लगते हैं. हाजी ओकास अंसारी सवाल उठाते हैं कि सूरत की तैयार साड़ी की डिजाइन बनारस की, तकनीक बनारस की और कीमत आधी हो तो स्थानीय बुनकर आखिर कब तक मुकाबला करेगा?

‘बनारसी साड़ी की डिजाइन कॉपी करने पर रोक लगे’

उनका सवाल है कि सूरत में वहां की सरकार ने जो किया, वह हमारी सरकार क्यों नहीं कर पाई? हाजी अनवार अंसारी भी बनारस के बुनकरों की बदहाली के लिए सूरत को जिम्मेदार मानते हैं. उनका कहना है कि अगर बनारस के बुनकर और बनारसी साड़ी को बचाना है तो यहां की डिजाइन की कॉपी करने पर रोक लगानी होगी. उनके मुताबिक, बनारस में बदहाली की बड़ी समस्या पावरलूम सेक्टर में है, जो करीब 95 फीसदी है. हालांकि वह यह भी कहते हैं कि बनारसी कढ़ुआ का आज भी कोई मुकाबला नहीं है.

शिक्षा और सरकारी योजनाओं की जानकारी का अभाव

हाजी अनवार अंसारी के मुताबिक, बुनकरों की बदहाली का एक बड़ा कारण शिक्षा का अभाव भी है. सरकार ने प्रमोशन और ब्रांडिंग के लिए हस्तकला संकुल दिया है, लेकिन पढ़े-लिखे न होने के कारण कई बुनकर इसका लाभ नहीं उठा पाते.दूसरी समस्या बैंकिंग सेक्टर से मिलने वाले सहयोग की है. उनके मुताबिक, लोन और सरकारी योजनाओं को लेकर भी बुनकरों को अपेक्षित मदद नहीं मिलती. सरकारी योजनाओं की सही जानकारी न होने के कारण भी बुनकर उनका लाभ नहीं उठा पाते. वह अंतरराष्ट्रीय नीति को भी बुनकरों की स्थिति से जोड़ते हैं. उनके मुताबिक जब पाकिस्तान और बांग्लादेश में बनारसी माल की खपत थी, तब बुनकरों की स्थिति आज की तुलना में बेहतर थी.

सरकार की ओर से क्या किया जा रहा है?

हमने बुनकर सेवा केंद्र के सहायक निदेशक ऋषिकेश देसाई से पूछा कि सरकार बुनकरों के लिए क्या कर रही है. ऋषिकेश देसाई के मुताबिक सरकार ओरिजिनल धागों पर बुनकरों को 15 फीसदी तक सब्सिडी दे रही है. इसके अलावा मेलों और प्रदर्शनियों के माध्यम से बुनकरों को बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है. उनका कहना है कि बुनकरों को किसी भी तरह की समस्या हो तो वे बुनकर सेवा केंद्र से सीधे संपर्क कर सकते हैं.

हैंडलूम को बचाना है तो ‘हुनर’ बचाना होगा

हैंडलूम और बुनकरों पर पिछले कई सालों से काम कर रहे शैलेश सिंह समस्या का एक और पहलू सामने रखते हैं. उनके मुताबिक हैंडलूम में हुनर की कमी बड़ी चुनौती बन रही है. वह कहते हैं कि पैसा देने वाले लोग हैं और पैसा दिया भी जा रहा है, लेकिन हुनरमंद लोगों का न मिलना इस सेक्टर की बड़ी समस्या है. शैलेश सिंह के मुताबिक, आज हैंडलूम पर काम करने वाले बुनकर को करीब 700 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं और आठ घंटे काम करने पर यह करीब 20 हजार रुपये महीने की नौकरी के बराबर है.नफिर भी बुनकर को सामाजिक पहचान नहीं मिलती.

वह बताते हैं कि बुनकर परिवार के लोग 12-14 हजार रुपये महीने पर जियो और एयरटेल में दस घंटे काम कर लेंगे, लेकिन पुश्तैनी बुनकरी का काम नहीं करना चाहते. यही इस सेक्टर की नई चुनौती है. शैलेश सिंह कहते हैं कि इसके लिए पिछली सरकारें भी कम दोषी नहीं हैं, क्योंकि आज 600-700 रुपये की मजदूरी दिखाई दे रही है, जबकि कुछ साल पहले तक इतनी मजदूरी बुनकर के लिए सपना हुआ करती थी.

‘बच्चे पुश्तैनी काम में नहीं आना चाहते’

आज बुनकर अपने बच्चे को इस पेशे में नहीं लाना चाहता. सरकार ने हैंडलूम में उस्ताद योजना और समर्थ योजना के जरिए हुनर पैदा करने की कोशिश की, लेकिन शैलेश सिंह के मुताबिक, अधिकारियों की हिलाहवाली के कारण ये योजनाएं भी अपेक्षित रूप से सफल नहीं हो पाईं. आज बनारस में करीब 30 हजार पावरलूम कनेक्शन हैं. एक कनेक्शन पर तीन बुनकर मानें तो इस हिसाब से 90 हजार से ज्यादा पावरलूम बुनकर हैं. इसके मुकाबले 8 हजार से ज्यादा हैंडलूम बुनकर हैं.

शहर में हैंडलूम बुनकरों की संख्या बमुश्किल एक हजार भी नहीं होगी. ज्यादातर हैंडलूम बुनकर शहर के आउटरस्कर्ट में रहते हैं. रामनगर, जंसा, गंगापुर, चोलापुर, चंदापुर, कोटवां और लोहता में हैंडलूम का काम ज्यादा है. शैलेश सिंह कहते हैं कि करीब पांच लाख लोगों का पेट भरने वाला टेक्सटाइल सेक्टर योजनाओं के सही क्रियान्वयन और बुनकरों में अवेयरनेस की कमी के कारण आज भी चुनौती से जूझ रहा है. सरकार को भी इस सेक्टर के लिए बड़ा दिल दिखाना होगा.

बिजली की कीमत भी बड़ी चुनौती

शैलेश सिंह पावरलूम की बिजली दर को भी बुनकरों की समस्या से जोड़ते हैं. उनके मुताबिक, 2023 तक 143 रुपये प्रति हॉर्स पावर की दर से बिजली की कीमत वसूली जाती थी. इससे बुनकरों को राहत थी, लेकिन 1 अप्रैल 2023 से यह बढ़कर 800 रुपये प्रति हॉर्स पावर कर दी गई. वहीं पांच हॉर्स पावर से ऊपर के कनेक्शन पर 10 रुपये प्रति यूनिट की दर से चार्ज किया जाने लगा. शैलेश सिंह का कहना है कि सरकार को बुनकरों की स्थिति को देखते हुए इसमें कमी लानी होगी.

तो फिर ‘अच्छे दिन’ कब आएंगे?

नेशनल हैंडलूम डे के 11 साल पूरे होने के बाद बनारस के बुनकरों की तस्वीर दो हिस्सों में दिखाई देती है. एक तरफ डॉ. रजनीकांत जैसे विशेषज्ञ हैं, जो हैंडलूम सेक्टर में रिवाइवल, बढ़ते बाजार, जीआई टैग, ब्रांडिंग, एक्सपोर्ट और बढ़ती मजदूरी को बदलाव का संकेत मानते हैं. दूसरी तरफ अमरेश मौर्या, हाजी ओकास अंसारी, हाजी अनवार अंसारी और शैलेश सिंह जैसे लोग हैं, जो बताते हैं कि बुनकरों के सामने अभी भी कई बुनियादी चुनौतियां मौजूद हैं.

बनारस ऐसा शहर है जहां रोजाना करीब दो लाख पर्यटक आते हैं. इसी शहर की पहचान दुनिया भर में उसकी बनारसी साड़ी और बुनकरी के हुनर से है. लेकिन सवाल यही है कि जिस शहर में लाखों पर्यटक रोज पहुंचते हैं, उसी शहर की सबसे खूबसूरत चीज तैयार करने वाले लोग अगर आज भी अपने भविष्य को लेकर परेशान हैं तो आखिर कमी कहां रह गई?

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