रविदास से प्रेम, प्रेमचंद से दूरी! महापुरुषों को लेकर बीजेपी सेलेक्टिव क्यों? उठे बड़े सवाल
वाराणसी में बीजेपी पर महापुरुषों के सम्मान को लेकर दोहरा मापदंड अपनाने का आरोप लग रहा है. जहां कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद और साहित्यकार धूमिल जैसी हस्तियों की जयंती उपेक्षित है, वहीं संत रविदास की जयंती को समय से पहले ही भव्य रूप से मनाया जा रहा है. इसको लेकर अब सवाल उठ रहे हैं.
महज कुछ घंटे बाद ही कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 146 वीं जयंती देश भर में मनाई जाएगी. लेकिन उनके अपने पैतृक निवास स्थान लमही में ना तो कोई तैयारी दिख रही है और ना ही उनके जयंती को लेकर यूपी सरकार की ही कोई मंशा दिखी कि उनकी जयंती से सरकार का कोई सरोकार भी है. सरकारी आयोजन के अभाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं.
सरकार की नियत पर ये सवाल इसलिए भी उठ रहा है क्योंकि बीते बुधवार को सूबे के मुखिया योगी आदित्यनाथ सहित पूरी सरकार और कई प्रदेशों और केंद्र के मंत्री इसी बनारस में मौजूद थे. और संत शिरोमणि रविदास जी महाराज की जयंती सात महीने पहले से मनानी शुरू कर दी. बीजेपी पर महापुरुषों को लेकर सेलेक्टिव होने के आरोप लग रहे हैं.
संत रविदास के मानने वालों का एक बड़ा वोट बैंक
संत रविदास की साहित्य परंपरा पर लंबे समय तक काम कर चुके बीएचयू के रिटायर्ड प्रोफेसर सदानंद शाही कहते हैं कि आषाढ़ की पूर्णिमा का दिन भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश देने के दिन के रूप में महत्वपूर्ण है जो उन्होंने काशी के सारनाथ में दी थी. गुरू पूर्णिमा पर ही रविदास जी की जयंती मनाने की शुरुवात समझ से परे है.
उनका कहना है कि इसमें कोई तथ्य नज़र नहीं आता सिवाय इसके कि संत रविदास के मानने वालों का एक बड़ा वोट बैंक है. सरकार का दावा भी कि डबल इंजन की सरकार संत रविदास के दर्शन पर ही चल रही है, ये भी पॉलिटिकल करेक्ट स्टेटमेंट है. जो कुछ मंच से संत रविदास के बारे में कहा गया उसका अधिकांश हिस्सा तो उनके साहित्य में नही मिलता.
दलित समाज में संत शिरोमणि महाराज की मास अपील
वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार कहते हैं कि संत रविदास जी की सात महीने पहले से जयंती मनाना दलित वोट बैंक साधने की रणनीति है. बाबा साहेब के नाम से जितना लाभ बीजेपी ले सकती थी ले चुकी अब संत रविदास के नाम का इस्तेमाल करने की योजना है. बीजेपी, बसपा के कोर वोटर्स में सेंध लगाने के लिए संत रविदास का सहारा ले रही है.
राजेंद्र कुमार का मानना है कि बीजेपी को पता है की दलित समाज में संत शिरोमणि रविदास जी महाराज की मास अपील है.
यूपी में 403 में से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए रिज़र्व है. 21% वोटर्स 150 सीटों पर दलित समाज डिसाइसीव है. पंजाब और उत्तराखंड में भी 34 और 15 सीटें रिज़र्व है. इसलिए बीजेपी के दिल में संत रविदास के प्रति प्रेम उमड़ रहा है.
प्रेमचंद को भूली सरकार? प्रेमचंद जी के प्रपौत्र क्या बोले?
एक तरफ तो रविदास जी की जयंती सात महीने पहले से मनाया जा रहा है. लेकिन दूसरी तरफ कथा सम्राट की 146वीं जयंती पर कोई सुगबुगाहट तक नही है. दुर्गा प्रसाद श्रीवास्तव प्रेमचंद जी के प्रपौत्र ने बताया कि पहले प्रेमचंद जी की जयंती पर तीन दिन पहले से समारोह शुरू हो जाता था. लेकिन अब तो जयंती वाले दिन भी एहसान ही उतारा जाता है.
उन्होंने कहा, प्रेमचंद वोटबैंक नही हैं, शायद इसीलिए बीजेपी सरकार को यहां आने में कोई लाभ नही दिखता. तभी तो ना तो पीएम और ना ही सीएम कभी यहां आएं. प्रेमचंद जिस समाज से आते हैं शायद वो कभी वोटबैंक माना ही नहीं जाएगा. अगर ऐसा नहीं है तो दो दिन से मुख्यमंत्री और तमाम मंत्री इसी शहर में हैं लेकिन कोई झांकने तक यहां नहीं आया.
हिन्दी भाषी समाज ने अपने लेखकों का सम्मान नहीं किया
प्रोफेसर सदानंद शाही कहते हैं कि वोट बैंक और राजनैतिक लाभ -हानि तो एक कारण है ही. इसका दूसरा कारण भी है और वो ये है कि हिन्दी भाषी समाज ने कभी भी अपने लेखकों का सम्मान नहीं किया. ओडिशा में बंगाल में केरल में कर्नाटक में साहित्यकारों के नाम पर यूनिवर्सिटी हैं. लेकिन यूपी, बिहार, एमपी और राजस्थान में ये आपको देखने नहीं मिलेगा.
गोरखपुर में भी विश्वविद्यालय बना तो गुरू गोरखनाथ के नाम पर नहीं बना, वो बना पंडित दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर जिनका गोरखपुर से कोई लेना देना नहीं है.
इस सरकार में धूमिल भी उपेक्षित!
सत्ता का प्रतिरोध करने वाले साहित्यकार के रूप में सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ का ज़िक्र होता है. हिन्दी साहित्य में धूमिल एक बहुत बड़ा नाम है.लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि 26 जुलाई की आधी रात को किसी ने उनकी प्रतिमा तोड़ दी. और पांच दिन बीतने को आए ना तो अभी तक उनकी प्रतिमा ही बन पाई और ना ही सरकार और प्रशासन से कोई जिम्मेदार ही वहां पहुंचा है.
धूमिल के बड़े पुत्र रतिशंकर पाण्डेय कहते हैं कि अभी तक लोहता थाने में अज्ञात के ख़िलाफ एक मुकदमा लिखा गया है. इसके अलावे अभी तक कुछ भी नहीं हुआ है. रतिशंकर कहते हैं कि संसद से सड़क तक व्यवस्था और सरकार के ख़िलाफ जब भी आवाज़ उठाई जाती है तो धूमिल याद आते हैं. जंतर मंतर पर भी जेन ज़ी धूमिल की ही रचनाएं पढ़ रहे थे.
बीजेपी विपक्ष में थी तो धूमिल का सहारा लेती थी
बीजेपी भी जब विपक्ष में थी तो सरकार को घेरने के लिए धूमिल का सहारा लेती थी. लेकिन आज पूरी सरकार इसी शहर में थी और किसी को फुर्सत नहीं थी कि एक बार खेवली चलकर देख लें. धूमिल सत्ता के ख़िलाफ एक सशक्त हस्ताक्षर थे शायद इसी लिए विपक्ष धूमिल को सर पर बिठाता है लेकिन वही जब सत्ता में आता है तो धूमिल से किनारा कर लेता है.
वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार कहते हैं कि यदि प्रेमचंद और धूमिल उस समाज से आते जिनका अपना बड़ा वोट बैंक है तो बीजेपी सरकार के तमाम मंत्री और बड़े अधिकारी ना सिर्फ अफरा तफरी में वहां पहुंचते बल्कि सारी व्यवस्थाएं वहां बेहतर ढंग से बनाई जातीं जैसा कि संत रविदास की जन्मस्थली सीर गोवर्धनपुर में हुआ था.