कौन हैं जौनपुर के धनंजय सिंह, जिनकी चर्चा के बिना अधूरी है पूर्वांचल में बाहुबलियों की कहानी?
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में धनंजय सिंह की इमेज एक राजनेता और बाहुबली की हैं. अपराध और राजनीति के घनिष्ठ संबंधों के बीच उनकी यात्रा छात्र राजनीति से लेकर विधायक और सांसद तक चली. इस दौरान वह लगातार विवादों में भी रहे. यहां तक कि कुख्यात माफिया मुन्ना बजरंगी हत्याकांड में भी उनके ऊपर आरोप लगे.
उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल 80 के दशक में ही अपराध और अपराधियों की नर्सरी बन गया था. यही वह समय था जब अपराध का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण भी हुआ. इसी प्रयोग से हिन्दी की डिक्सिनरी में ‘बाहुबली’ शब्द का जन्म हुआ था. बाहुबली मतलब ऐसा नेता जिसका आपराधिक साम्राज्य भी हो, या फिर ऐसा अपराधी जिसका राजनीतिक वर्चस्व कायम हो. वैसे तो पूर्वांचल में हरिशंकर तिवारी से लेकर ब्रजेश सिंह तक दर्जनों बाहुबली हुए, लेकिन इनमें जौनपुर के धनंजय सिंह की कहानी कुछ अलग है. दो बार विधायक, एक बार सांसद रहे धनंजय सिंह की कहानी थोड़ी फिल्मी, थोड़ी हकीकत और बाकी फसाना है. आइए, इस प्रसंग में इसी कहानी को नए रूप में देखने की कोशिश करते हैं.
मूल रूप से जौनपुर के रहने वाले धनंजय सिंह का जन्म साल 1975 में कोलकाता में हुआ था. वह बचपन में बड़े शांत स्वभाव के थे, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ वो थोड़े मनबढ़ हुए और उनके अंदर नेतागिरी के गुण भी आ गए. उनके जन्म के कुछ समय बाद ही उनके माता-पिता कोलकाता से अपने पैत्रिक गांव आ गए. यहीं पर उनकी प्राथमिक शिक्षा हुई. इंटरमीडिएट के बाद उन्होंने पहले जौनपुर के टीडी कॉलेज और फिर लखनऊ यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया. यहीं पर उन्होंने छात्र राजनीति भी की. इसी दौरान मंडल कमीशन आया और उसका विरोध करते हुए धनंजय सिंह ने उत्तर प्रदेश में अपनी पहचान बना ली.
लखनऊ में हुई अभय सिंह से दोस्ती
लखनऊ यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान धनंजय सिंह की बाहुबली छात्र नेता और आज के विधायक अभय सिंह की दोस्ती हुई. कहा जाता है कि यहीं से दोनों ने मिलकर यूनिवर्सिटी में ‘दबंग’ राजनीति को जन्म दिया. दबंगई का आलम यह था कि उनका नाम हत्या, लूट, डकैती और सरकारी ठेकों से वसूली में प्रमुखता से आने लगा. देखते ही देखते उनके खिलाफ करीब दर्जन भर मुकदमे दर्ज हो गए. यहां तक कि 1998 में उत्तर प्रदेश पुलिस ने उनके खिलाफ 50 हजार रुपये का इनाम तक घोषित कर दिया. यहां तक कि 17 अक्टूबर 1998 को पुलिस ने उनका कथित तौर पर एनकाउंटर भी कर दिया. हालांकि कुछ ही दिन बाद पता चला कि धनंजय सिंह के नाम पर पुलिस ने किसी और का एनकाउंटर किया था.
दिलचश्प है एनकाउंटर की कहानी
धनंजय सिंह के इस कथित एनकाउंटर की कहानी भी काफी दिलचश्प है. दरअसल उस समय पुलिस ने दावा किया था कि धनंजय सिंह अपने तीन साथियों के साथ भदोही में एक पट्रोल पंप पर डकैती डालने वाले थे. मुखबिर से सूचना पर पुलिस ने घेराबंदी की और आमने सामने की फायरिंग में धनंजय सिंह मारे गए थे. पुलिस ने शव की पहचान भी करा ली. इस उपलब्धि पर जौनपुर पुलिस अपनी पीठ थपथपा ही रही थी कि फरवरी 1999 में धनंजय सिंह अचानक से उच्चाधिकारियों के सामने हाजिर हो गए. इसके बाद मामले को मानवाधिकार आयोग ने संज्ञान लिया और इस फर्जी एनकाउंटर में शामिल सभी 34 पुलिसकर्मियों पर एफआईआर दर्ज कराई गई. इसके बाद अक्टूबर 2002 में बनारस के टकसाल सिनेमा के सामने धनंजय सिंह के काफिले पर अंधाधुंध फायरिंग हुई थी. इस घटना में धनंजय सिंह के गनर और सचिव समेत 4 लोग घायल हुए थे. इस मामले में धनंजय सिंह ने कभी मित्र रहे रारी विधायक अभय सिंह के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी.
नाटकीय तरीके से शुरू हुई राजनीति
यूनिवर्सिटी में छात्र राजनीति कर चुके धनंजय सिंह की जौनपुर की राजनीति में प्रवेश की कहानी फिल्मी स्क्रिप्ट की तरह है. दरअसल 90 के दशक के आखिर में जौनपुर रारी विधानसभा सीट से विनोद नाटे चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे थे. विनोद ना केवल दबंग थे, बल्कि उन्हें मुन्ना बजरंगी का गुरु कहा जाता है. साल 2002 में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले उनका एक्सिडेंट हो गया और उनकी मौत के बाद धनंजय सिंह ने उनकी तस्वीर को सीने से लगाकर जनता की सिंपैथी हासिल करते हुए रारी सीट से निर्दलीय विधायक बने. फिर 2007 में वह जनता दल यूनाइटेड के टिकट पर इसी सीट से चुनाव जीते. वह साल 2008 में बसपा में शामिल हुए और 2009 के चुनावों में सांसद चुने गए. हालांकि 2011 में उन्हें बसपा सुप्रीमो मायवती ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के चलते पार्टी से बाहर कर दिया था. इसके बाद साल 2012 में उन्होंने अपनी पत्नी डॉ. जागृति सिंह को विधान सभा लड़ाया, लेकिन वह चुनाव हार गई. साल 2014 में वह खुद लोकसभा लड़े, फिर 2017 में विधानसभा लड़े. लेकिन दोनों ही चुनावों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा.
मुन्ना बजरंगी की हत्या का आरोप
साल 2018 में बागपत की जेल में मुन्ना बजरंगी की हत्या हुई थी. पुलिस ने तो इस गैंगवार माना ही था, बाद में मुन्ना बजरंगी की पत्नी सीमा सिंह ने भी आरोप लगाया था कि यह हत्या धनंजय सिंह ने कराई है. आरोप लगाया था कि धनंजय सिंह 2019 का चुनाव लड़ने वाले थे. चूंकि मुन्ना बजरंगी उनकी जीत में बाधा बन सकते थे, इसलिए उन्होंने मुन्ना को रास्ते से हटा दिया. इसके अलावा भी धनंजय सिंह का नाम कई बार विवादों में आया. उनकी पहली शादी साल 2010 में मीनू सिंह के साथ हुई थी. इस शादी के करीब 10 महीने बाद ही मीनू सिंह ने सुसाइड कर लिया था. उसके बाद धनंजय सिंह ने डॉ. जागृति सिंह से शादी की, जिनसे कुछ ही दिन बाद तलाक हो गया. हालांकि इससे पहले जागृति सिंह के नौकरानी की मौत हुई थी. इसमें जागृति सिंह पर हत्या का आरोप लगा था, वहीं धनंजय सिंह पर सबूतों को मिटाने का आरोप था. फिर धनंजय सिंह ने साल 2017 में आंध्र प्रदेश के एक राजनीतिक घराने की बेटी और व्यवसायी श्रीकला रेड्डी से पेरिस में शादी की. इस समय श्रीकला रेड्डी जौनपुर में जिला पंचायत की चेयरमैन हैं.
2017 में हुआ था बड़ा बवाल
2017 के विधानसभा चुनावों में धनंजय सिंह निषाद पार्टी के बैनर तले चुनाव में उतरे थे. उस समय उन्होंने अपने शपथपत्र में दावा किया था कि उनके खिलाफ तीन मुकदमे दर्ज हैं. इस चुनाव के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट में उनके खिलाफ एक पीआईएल दाखिल हो गया. इसमें राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को बताया कि उनके खिलाफ कुल 24 मुकदमे दर्ज हैं. इनमें 7 मुकदमे मर्डर के हैं. ऐसे में हाईकोर्ट ने उन्हें मिली ‘वाई सिक्योरिटी’ को लेकर सरकार से पूछा था कि ऐसे नेता की सुरक्षा में सरकारी मशीनरी को क्यों लगाया गया है. इसके बाद सरकार ने धनंजय सिंह को मिली सुरक्षा हटा ली थी.
33 साल और 36 मुकदमे
पुलिस के मुताबिक धनंजय सिंह का आपराधिक करियर करीब 33 साल का रहा है. उनके खिलाफ पहला मुकदमा साल 1990 में एक पूर्व शिक्षक की हत्या के आरोप में दर्ज हुआ था. फिर 1992 में टीडी कॉलेज जौनपुर में एग्जाम के दौरान एक छात्र की हत्या का मामला आया. इसमें वह गिरफ्तार हुए और बाकी पेपर पुलिस हिरासत में रहते हुए दिया. फिर 1998 तक उनके खिलाफ कुल 12 मुकदमे और साल 2024 तक 41 मुकदमे दर्ज हो गए. हालांकि इन सभी मुकदमों में गवाहों के मुकर जाने की वजह से ज्यादातर में वह बरी हो चुके हैं. केवल 5 या छह मुकदमे ही इस समय लंबित हैं. इन 33 वर्षों में वह केवल 2020 के नमामि गंगे प्रोजेक्ट मैनेजर अपहरण केस में दोषी करार दिए गए और उन्हें 7 साल की सजा हुई हैं. हालांकि इस समय वह जमानत पर बाहर हैं. साल 1997 में मायावती के शासनकाल में बन रहे अंबेडकर पार्क का काम कर रहो पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर गोपाल शरण श्रीवास्तव की हत्या में भी इनका नाम आया और यह फरार हो गए. इसके बाद ही पुलिस ने 50 हजार का इनाम घोषित किया था.