आधार का चमत्कार, 5 साल में इस तरीके से 466 लापता लोगों को परिवार के पास पहुंचाया
आधार के जरिए पिछले 5 साल में कुल 466 लोगों को उनके परिवार तक पहुंचाया गया है. इनमें सबसे ज्यादा 125 मामले वाराणसी से सामने आए हैं. लखनऊ से 56 बिछड़ों को अपनो से मिलाया गया है. अन्य जिलों से भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं.
यूपी में आधार कार्ड एक उम्मीद की किरण बनकर उभरा है. पिछले 5 सालों में यूआईडीएआई (UIDAI) की पहल से 466 लापता या खोए हुए लोगों को उनके परिवारों से मिलाया गया है. ये मामले बताते हैं कि कैसे एक साधारण से पहचान पत्र से जीवन बदला जा सकता है. बिछ़ड़ों को अपनों से मिलवाया जा सकता है.
आधार के जरिए लोगों को अपनों मिलवाना का ये है तरीका
यूआईडीएआई के उपमहानिदेशक प्रशांत कुमार सिंह ने बताया कि शेल्टर होम, बालगृह और अन्य आश्रय केंद्रों में नियमित रूप से आधार एनरोलमेंट कैंप आयोजित किए जाते हैं. इन कैंपों में जब किसी व्यक्ति का नया आधार बनाने की कोशिश की जाती है, तो अगर उसका आधार पहले से मौजूद होता है, तो आवेदन रिजेक्ट हो जाता है. इसी रिजेक्शन से पुरानी डिटेल्स निकाली जाती हैं.
नाम, पता, मोबाइल नंबर सब कुछ. इसके बाद परिवार से संपर्क कर व्यक्ति को सौंप दिया जाता है.”आधार उन लोगों के लिए वरदान साबित हो रहा है जो बोल नहीं पाते या याद नहीं रख पाते. मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति या छोटे बच्चे अक्सर अपना कुछ नहीं बता पाते, लेकिन बायोमीट्रिक मैच से उनकी पहचान हो जाती है.
आधार ने कितने बिछड़े लोगों को परिवार से मिलवाया
- 2019: 2 लोग
- 2020-21: 95 लोग
- 2022: 48 लोग
- 2023: 46 लोग
- 2024: 152 लोग
- 2025: 123 लोग
आधार के जरिए कुल 466 लोगों को उनके परिवार तक पहुंचाया गया है. इनमें सबसे ज्यादा 125 मामले वाराणसी से सामने आए हैं. लखनऊ से 56 बिछड़ों को अपनो से मिलाया गया है. अन्य जिलों जैसे नोएडा, मुरादाबाद, कानपुर और बलिया से भी कई केस दर्ज हुए.
बच्चों का आधार जरूर अपडेट कराएं
प्रशांत कुमार सिंह ने अभिभावकों से अपील की कि पांच साल से कम उम्र के बच्चों का आधार बनवाते समय सिर्फ फोटो ली जाती है, बायोमीट्रिक नहीं. लेकिन पांच साल पूरे होने पर बायोमीट्रिक अपडेट जरूर कराएं. इससे अगर बच्चा कभी खो जाए तो उसकी पहचान आसानी से हो सकेगी. “लापरवाही न बरतें, यह छोटा कदम बड़े संकट से बचा सकता है.
प्रशांत कुमार सिंह ने आगे कहा कि पहल न केवल परिवारों को एकजुट कर रही है, बल्कि समाज में आधार की उपयोगिता को नई ऊंचाई दे रही है. कई सालों से बिछड़े लोग जब अपनों की गोद में लौटते हैं, तो आंसुओं के साथ खुशियां भी लौट आती हैं. आधार सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि अपनों से जोड़ने का सेतु है.