पूर्व विधायक छोटे सिंह को HC से बड़ा झटका, डबल मर्डर केस में जमानत खारिज; जेल में ही रहेंगे

जालौन के चर्चित दोहरे हत्याकांड में दोषी पूर्व विधायक छोटे सिंह को बड़ा झटका लगा है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पूर्व विधायक की जमानत अर्जी खारिज कर दी है. डबल मर्डर की यह सनसनीखेज घटना 30 मई 1994 की है. छोटे सिंह को ट्रायल कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.

पूर्व विधायक छोटे सिंह (फाइल फोटो)

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गुरुवार को पूर्व विधायक छोटे सिंह को दोहरे हत्याकांड मामले में राहत देने से इनकार कर दिया. छोटे सिंह ने सजा के निलंबन और जमानत की मांग को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था. वहीं, कोर्ट ने उनकी अर्जी खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि मामले की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्य आरोपी के खिलाफ मजबूत हैं.

हाईकोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ और जज जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया. छोटे सिंह को ट्रायल कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी. इसके बाद वह 11 सितंबर 2025 को हाईकोर्ट में अपील दाखिल की थी. हाईकोर्ट ने 16 मार्च 2026 को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था, वहीं अब जमानत देने से इनकार कर दिया है.

दिनदहाड़े घर में घुसकर अंधाधुंध फायरिंग की

यह सनसनीखेज घटना 30 मई 1994 की है, जब चुर्खी थाना क्षेत्र के एक गांव में दिनदहाड़े घर में घुसकर अंधाधुंध फायरिंग की गई थी. इस हमले में राजकुमार और जगदीश शरण की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि एक अन्य व्यक्ति गंभीर रूप से घायल हो गया था. घटना के बाद राम कुमार द्वारा थाना चुर्खी में एफआईआर दर्ज कराई गई थी.

जांच के दौरान छोटे सिंह का नाम सामने आया और उन्हें अन्य आरोपियों के साथ चार्जशीट किया गया. लंबी सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी ठहराते हुए धारा 302/149 के तहत आजीवन कारावास, धारा 307/149 के तहत 10 साल कारावास सहित अन्य धाराओं में सजा सुनाई गई थी. वहीं, हाईकोर्ट में उनके वकील ने दलील दी कि उन्हें झूठा फंसाया गया था.

हाईकोर्ट में दोनों पक्षों ने क्या-क्या दलीलें दी?

छोटे सिंह के अधिवक्ताओं ने कोर्ट में तर्क दिया कि उनका नाम प्रारंभिक FIR में नहीं था और उन्हें बाद में झूठा फंसाया गया. साथ ही, मृतकों का परिजन बताते हुए उनकी गवाही पर सवाल उठाए गए. यह भी कहा गया कि मेडिकल साक्ष्य और हथियारों के प्रकार में विरोधाभास है. साथ ही बताया कि वह पहले जमानत पर रहने के दौरान कभी उल्लंघन नहीं किया.

वहीं, खंडपीठ ने बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि एफआईआर में नाम न होना अपने आप में निर्णायक नहीं है, खासकर जब घटना अत्यंत भयावह परिस्थितियों में हुई हो. अदालत ने कहा कि मृतकों के परिजन स्वाभाविक गवाह हैं और उनकी गवाही को केवल रिश्तेदारी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता है.

ट्रायल कोर्ट के सजा निलंबन के लिए ठोस आधार जरूरी

अदालत ने यह भी माना कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट, प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्य आरोपी की संलिप्तता को स्पष्ट रूप से सिद्ध करते हैं. साथ ही आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषसिद्धि के बाद आरोपी के पक्ष में ‘निर्दोषता की धारणा’ समाप्त हो जाती है. ऐसे में सजा निलंबन के लिए ठोस और पर्याप्त आधार जरूरी हैं, जो इस मामले में नहीं पाए गए.

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