डिजिटल रेप की शिकायत पर FIR में देरी पर हाईकोर्ट सख्त; DGP को जांच का आदेश
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजियाबाद पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है. अदालत ने कहा कि गंभीर संज्ञेय अपराधों में पुलिस को कानून के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए. शिकायत में गंभीर अपराध के आरोप के बाद भी रिपोर्ट दर्ज न करना घोर लापरवाही है, जो बर्दाश्त के बाहर है.
गाजियाबाद के वेव सिटी थाने में डिजिटल रेप, छेड़छाड़, यौन उत्पीड़न और आपराधिक धमकी जैसे गंभीर आरोपों की शिकायत पर FIR दर्ज करने में देरी को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है. कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए उत्तर प्रदेश के DGP को पूरे मामले की जांच अपने स्तर से कराने के निर्देश दिए हैं.
हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायत में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के आरोप होने के बावजूद पुलिस ने तत्काल मुकदमा दर्ज नहीं किया. यहां तक कि 7 जुलाई को पुलिस कमिश्नर को दी गई शिकायत पर भी FIR दर्ज नहीं हुई और प्रभावी जांच शुरू नहीं की गई. इसके बाद पीड़िता ने मजिस्ट्रेट की अदालत का रुख किया, कोर्ट के आदेश के बाद FIR दर्ज की गई.
प्रमोशन का लालच देकर उत्पीड़न का आरोप
मामले में पीड़िता ने आरोप लगाया कि अर्पित गुप्ता नाम के आरोपी ने प्रमोशन का लालच देकर उसका यौन उत्पीड़न किया. शिकायत में छेड़छाड़ और डिजिटल रेप के भी आरोप लगाए गए हैं. पीड़िता के मुताबिक, आरोपी ने उसे धमकाया और मामले की दूसरे को बताने पर जान से मारने की बात कही. पीड़िता थाने गई तो पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने से मना कर दिया.
पुलिस कमिश्नर को शिकायत दिए जाने के बाद भी कार्रवाई नहीं हुई तो, आखिर में पीड़िता मजिस्ट्रेट के पास पहुंची. मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ BNS की धारा 64 समेत कई धाराओं में मुकदमा दर्ज किया. FIR में महिला की गरिमा भंग करने, यौन उत्पीड़न, कपड़े उतारने के इरादे से हमला और आपराधिक धमकी जैसे आरोप हैं.
FIR रद्द करने की मांग वाली याचिका खारिज
दरअसल, आरोपी पक्ष की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि पीड़िता की शिकायत में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर संज्ञेय अपराध की ओर इशारा करते हैं. साथ ही आरोपों की गंभीरता और मामले के तथ्यों को देखते हुए FIR रद्द करने से इनकार कर दिया.
जस्टिस चंद्र धारी सिंह और जज तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने मामले में सुनवाई की. कोर्ट ने कहा कि संज्ञेय अपराध के आरोप पर पुलिस FIR दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकती. यह कहना कि WhatsApp चैट, कॉल रिकॉर्डिंग या दूसरे सबूत उपलब्ध नहीं कराए गए, यह पुलिस की जांच का हिस्सा है, शिकायतकर्ता पर इसकी जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती.
थाना प्रभारी और कमिश्नर की भूमिका की जांच
हाईकोर्ट ने DGP को जांच कराने और चार सप्ताह के भीतर व्यक्तिगत शपथपत्र के जरिए रिपोर्ट दाखिल करने के आदेश दिए हैं. जांच में यह देखा जाए कि शिकायत पर पुलिस ने किस तरह कार्रवाई की और FIR दर्ज करने में देरी क्यों हुई?. वेव सिटी थाना प्रभारी, गाजियाबाद पुलिस कमिश्नर और अन्य की भूमिका की भी पड़ताल करने को कहा गया है.
कोर्ट ने साफ किया कि FIR दर्ज करने के स्तर पर पुलिस को आरोपों की अंतिम सत्यता तय नहीं करनी होती. संज्ञेय अपराध पर कानून के मुताबिक कार्रवाई करना पुलिस का दायित्व है. आरोप सही हैं या गलत, इसका पता जांच के दौरान किया जाता है. अब अगली सुनवाई में DGP की जांच रिपोर्ट और पुलिस की कार्रवाई का रिकॉर्ड कोर्ट के सामने रखा जाएगा.
