यूपी में है ऐसा सिद्ध पीठ, जहां अंग्रेजों का सिर काटकर चढ़ाते थे बाबू बंधू सिंह; होती है हर मनोकानमा पूरी
यूपी के गोरखपुर में एक ऐसा सिद्ध पीठ है, जहां हजारों भक्त मां के दर्शन को आते हैं. इस मंदिर का गहरा संबंध अमर बलिदानी शहीद बंधु सिंह से है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के छक्के छुड़ाए थे. बाबू बंधु सिंह यहां अंग्रेजों का सिर काटकर मां के सिद्ध पीठ पर अर्पित करते थे.
गोरखपुर में एक ऐसा सिद्ध पीठ है जहां हजारों की संख्या में दूर दराज से लोग मां का दर्शन करने आते हैं. यह गोरखपुर मुख्यालय से लगभग 20 से 22 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. मान्यता है की यहां माता के दर्शन मात्र से भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती हैं. यह वही सिद्ध पीठ है, जहां पर एक वीर शाहिद ने अंग्रेजों की बलि दी थी.
गोरखपुर शहर से देवरिया रोड पर स्थित मां तरकुलहा देवी का मंदिर है जो प्रसिद्ध सिद्ध पीठ है. मां तरकुलहा देवी की कहानी अमर बलिदानी बाबू बंधू सिंह से जुड़ी हुई है. शहीद बंधू सिंह आजादी के उस दौर में अंग्रेजों का सिर काट कर माता की सिद्ध पीठ पर चढ़ाते थे. पकड़े जाने पर अंग्रेजों ने उनको फांसी की सजा सुनाई थी, लेकिन बार-बार फांसी टूट जाती थी.
बाबू बंधू सिंह के नाम से ही कांपते थे अंग्रेज
अमर बलिदानी बाबू बंधू सिंह का नाम देशभक्ति में पूरे सम्मान के साथ लिया जाता है. स्वाधीनता की लड़ाई में बंधू सिंह ने अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया था. मां तरकुलहा देवी की कहानी कम लोगों को ही पता होती है कि उन्हें सिद्ध पीठ के रूप में पहचान दिलाने वाले कौन थे. लेकिन आजादी का अमृत महोत्सव पर श्रद्धालुओं को यह जानकारी दी जा रही है.
डुमरी रियासत के बाबू शिव प्रताप सिंह के पुत्र अमर बलिदान बाबू बंधू सिंह का नाम उन देशभक्तों में पूरे सम्मान के साथ लिया जाता है जो स्वाधीनता की पहली ही लड़ाई में अंग्रेजों के लिए नासूर बन गए थे. बाबू बंधू सिंह का आतंक इतना था कि अंग्रेज उनके नाम से कांपते थे. बाबू बंधू सिंह ने आजादी की लड़ाई के लिए अपना राज पाठ कुर्बान कर दिया था.
गुरिल्ला युद्ध प्रणाली से अंग्रेजों के छुड़ाएं छक्के
बंधू सिंह तरकुलहा सिद्ध पीठ के पास घने जंगलों में ही रहते थे. उन्होंने वहीं रहकर अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंके थे. बंधु सिंह जंगल में रहकर मां तरकुलहा की पूजा करते थे और अंग्रेजों का सिर काटकर मां के सिद्ध पीठ पर चढ़ाते थे. उन्होंने ने गुरिल्ला युद्ध प्रणाली अपनाकर अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया था.
उनकी इस प्रणाली और अपने अफसरों को खोने से भयभीत अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए हर पूरी कोशिश कर डाली थी और अपने मुखबिरों का जाल भी बिछा दिया था. अंग्रेजों के काफी प्रयास करने के बाद उन्हें धोखे से गिरफ्तार करने में वो सफल हो गए. जिसके बाद अंग्रेजी सरकार ने बंधु सिंह को फांसी की सजा सुनाई थी.
फांसी पर चढ़ाते थे तो टूट जाती थी फंदा, फिर…
बताया जाता है कि अंग्रेजों ने जब बंधू सिंह को फांसी दे रहें तो बार-बार फांसी का फंदा टूट जाता था. बार-बार वह बंधू सिंह को फांसी पर चढ़ाते थे और फांसी टूट जाती थी काफी प्रयास के बाद भी अंग्रेज उन्हें फांसी देने में असफल रहे. सात बार असफल होने के बाद स्वंय बंधु सिंह ने मां तरकुलहा माता से अपने चरणों में लेने का अनुरोध किया.
उसके बाद जब उनके गले में फांसी का फंदा डाला गया और वह हंसते-हंसते उस पर झूल गए. तब जाकर अंग्रेजों के सांस में सांस आयी. बंधु सिंह को गोरखपुर के कोतवाली थाना क्षेत्र के अलीनगर (आर्य नगर) में फांसी दी गई थी. मां तरकुलहा देवी मंदिर में नवरात्र में काफी भीड़ रहती है. चैत्र नवरात्र के बाद यहां मेला लगता है, जहां देश-विदेश से लोग आते हैं.
