गढ़ मुक्तेश्वर को मिलेगा पुराना गौरव! सनातन परंपरा में काशी जैसा क्रेज, कभी था पहाड़ से समंदर तक व्यापार का केंद्र

गढ़ मुक्तेश्वर, जिसे 'पश्चिम का काशी' कहा जाता है, डेढ़ हज़ार साल पहले तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रमुख धार्मिक और व्यापारिक केंद्र था. मुस्लिम आक्रमणों के कारण इसकी महिमा कम हो गई थी. अब उत्तर प्रदेश सरकार इस प्राचीन तीर्थ और व्यापारिक स्थल के पुराने गौरव को लौटाने के लिए प्रयास कर रही है, ताकि यह फिर से सनातन परंपरा और पर्यटन का केंद्र बन सके.

गढ़ मुक्तेश्वर धाम, हापुड़

उत्तर प्रदेश के हापुड में गढ़ मुक्तेश्वर धाम की सनातन परंपरा में बड़ी महिमा है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में जो क्रेज काशी का था, करीब डेढ़ हजार साल पहले तक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में वही क्रेज गढ़ मुक्तेश्वर का था. लोग चाहते थे कि उनकी मौत भी हो तो इसी ब्रजघाट पर हो. यदि ऐसा ना हो पाए तो उनकी अस्थियां जरूर यहां गंगा में प्रवाहित हों. मुस्लिम अक्रांताओं के आने के बाद इस प्रमुख तीर्थ की महिमा घटती गई और धीरे धीरे यह शहर ही उपेक्षित हो गया. लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार एक बार फिर से इस शहर के पुराने गौरव को लौटाने की दिशा में काम शुरू कर चुकी है.

कभी गढवाल वंश की राजधानी रहे गढ़ मुक्तेश्वर की चर्चा पुराणों में भी मिलती है. शिव पुराण में तो स्पष्ट तौर पर इस स्थान की महिमा का बखान करते हुए लिखा गया है कि ‘गणानां मुक्तिदानेन गणमुक्तीश्वर: स्मृत:’ अर्थात भगवान शिव के गणों को भी मुक्ति देने वाला गणमुक्तेश्वर. कहा जाता है कि दिल्ली में पृथ्वीराज चौहान के शासन तक इस स्थान का काफी वैभव हुआ करता था. कालांतर में पहले मुगल काल फिर अंग्रेजी हुकूमत के दौर में तमाम बंदिशों और सुविधाओं के अभाव में यह वैभव धीरे धीरे कम होता चला गया.

इसलिए है पश्चिम का काशी

पूर्वी उत्तर प्रदेश में तो लोग अपने पूर्वजों की अस्थियां काशी के मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद घाट पर प्रवाहित करते हैं और तर्पण करते हैं, लेकिन पौराणिक मान्यताओं के अधार पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली व दक्षिण हरियाणा के लोग अपने पूर्वजों की अस्थियां लेकर गढ़ मुक्तेश्वर आते हैं. इन सभी इलाकों से दाह संस्कार के लिए भी सैंकड़ों की तादात में यहां शव लाए जाते हैं. ऐसे में यहां भी कभी चिता की आग बुझने नहीं पाती. इसलिए इस स्थान को पश्चिम का काशी कहा जाता है.

ये है पौराणिक महत्व

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से करीब 90 किलोमीटर और मेरठ से 42 किलोमीटर दूर यह शहर गंगा तट पर बसा है. श्रीमद भागवत महापुराण और महाभारत के प्रसंगों में इस शहर का जिक्र मिलता है. यहां भगवान शिव का मुक्तेश्वर मदिर है. इसके अलावा एक प्राचीन शिवलिंग कारखण्डेश्वर भी यहीं पर है. शिवपुराण में कथा आती है कि जब भगवान नारायण के गणों को जय विजय को सनत कुमारों ने शॉप दिया था तो वह पिशाच योनि से मुक्ति लिए दुनिया भर में भटके. आखिर में देवर्षि नारद की सलाह पर गढ़ मुक्तेश्वर आए और भगवान शिव की पूजा की और मोक्ष का प्राप्त हुए.

आज भी है व्यापार का बड़ा केंद्र

हापुड़ की गुड़ मंडी को एशिया की सबसे बड़ी गुड़ मंडी कहा जाता है. दस्तावेजों से पता चलता है कि अंग्रेजी शासन तक गढ़ मुक्तेश्वर गुड़ के व्यापार का प्रमुख केंद्र था. उन दिनों गंगा में उत्तराखंड से गंगा सागर तक व्यापारिक नावें चलती थीं. जो उत्तराखंड से बांस और इमारती लकड़ी लेकर आती. इन लकड़ियों से यहां मूढ़ा बनाया जाता था. इन्हीं नावों से यहां से गुड़ की खेप कई राज्यों में गंगा के जलमार्ग से भेजा जाता था. आज भी यह शहर व्यापार का बड़ा केंद्र है, लेकिन अब यह व्यापार जलमार्ग के बजाय रेल और सड़क मार्ग से होता है.

ऐसे जा सकते हैं गढ़ मुक्तेश्वर

दिल्ली, मेरठ और मुरादाबाद से गढ़मुक्तेश्वर के लिए सीधी सड़क आती है और 24 घंटे बसों का संचालन होता है. इसी प्रकार यह शहर रेल नेटवर्क से भी कनेक्टेड है. यहां निकटतम रेलवे स्टेशन दिल्ली-मुरादाबाद रूट पर गढ़ मुक्तेश्वर है. इसके अलावा बृजघाट रेलवे स्टेशन भी यहां पर है. जेवर एयरपोर्ट शुरू होने के बाद यह शहर हवाई नेटवर्क से भी कनेक्ट हो जाएगा. इसके लिए जेवर से गंगा एक्सप्रेसवे को जोड़ने वाली ग्रीन फील्ड एक्सप्रेसवे का निर्माण कार्य शुरू हो गया है.

पर्यटन के लिहाज से भी अहम

गढ़ मुक्तेश्वर धाम केवल मोक्ष के लिए ही नहीं, बल्कि ध्यान, तप और मौज मस्ती के लिए भी काफी अहम है. यहां गंगा किनारे स्थित देवी गंगा को समर्पित मुक्तेश्वर महादेव मंदिर, गंगा मंदिर, मीराबाई की रेती, गुदडी़ मेला, बृज घाट, झारखंडेश्वर महादेव, कल्याणेश्वर महादेव का मंदिर आदि प्रमुख तीर्थ है. गढ़मुक्तेश्वर से 3 किमी दूर बृजघाट पर्यटन का प्रमुख केंद्र है. यहां बने नवनिर्मित गंगा घाट, फव्वारा लेजर शो, घंटाघर, गंगा आरती, प्राचीन हनुमान मंदिर, वेदांत मंदिर, अमृत परिसर लोगों को खूब आकर्षित करते हैं.