अजब-गजब! सरेंडर करने पहुंचे थे आरोपी, अदालत ने सुना दी 6 महीने की सजा; HC ने लगाई फटकार

कानपुर में निचली अदालत की गंभीर न्यायिक चूक सामने आई है. सरेंडर आवेदन को गुनाह कबूलना मानकर आरोपियों को बिना सुनवाई सजा सुना दी गई थी. सेशन कोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा.वहीं, हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया है. साथ ही मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेजा.

इलाहाबाद हाईकोर्ट Image Credit:

कानपुर में निचली अदालत की कार्यप्रणाली से जुड़ा एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है. यहां आरोपी अदालत में आत्मसमर्पण करने पहुंचे थे, लेकिन कोर्ट ने उनके सरेंडर आवेदन को ही कबूलनामा मान लिया. यही नहीं, इसके बाद बिना नियमित सुनवाई के दोनों आरोपियों को 6 महीने की साधारण कैद और जुर्माने की सजा सुना दी गई.

मामला कानपुर के कल्याणपुर थाने में साल 1998 में दर्ज एक आपराधिक मुकदमे से जुड़ा है. एसीजेएम कोर्ट नंबर-2, कानपुर नगर ने पिछले साल 28 नवंबर 2025 को दोनों आरोपियों को सजा सुनाई थी. अब जब मामला हाईकोर्ट पहुंचा तो अदालत ने इसे गंभीर चूक माना और दोषसिद्धि के साथ-साथ अपीलीय अदालत के आदेश को भी रद्द कर दिया.

गिरफ्तारी वारंट के बाद सरेंडर करने गए थे कोर्ट

इस मामले में कन्हैया लाल और एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ आईपीसी की धारा 452, 323, 324, 504 और 506 के तहत आरोप लगाए गए थे. मुकदमे के दौरान आरोपियों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी हुए थे. इसके बाद दोनों ने अदालत के सामने सरेंडर एप्लीकेशन दाखिल की थी और कोर्ट में आत्मसमर्पण करने की इच्छा जताई.

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अनंत शर्मा के अनुसार, इस आदेश के खिलाफ सेशन कोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की. लेकिन अपील खारिज हो गई. कोर्ट ने माना कि यदि दोषसिद्धि आरोपियों की दोष स्वीकार के आधार पर हुई है तो धारा 375 CrPC के तहत अपील का दायरा सीमित है और मुख्य रूप से सजा की मात्रा को ही चुनौती दी जा सकती है.

HC पहुंचा मामला तो सामने आई पूरी सच्चाई

इसके बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट में आपराधिक पुनरीक्षण दाखिल किया. साथ ही स्पष्ट किया कि उन्होंने कभी भी अपराध स्वीकार नहीं किया था. उन्होंने केवल अदालत के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए सरेंडर आवेदन दिया था. सुनवाई के दौरान सरकारी अधिवक्ता ने भी स्वीकार किया कि सरेंडर आवेदन में दोष स्वीकार करने संबंधी कोई बात नहीं थी.

इसके बाद हाईकोर्ट ने निचली अदालत की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए. हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने बेहद कैजुअल अप्रोच अपनाते हुए सरेंडर आवेदन को दोष स्वीकारोक्ति मान लिया. वहीं, अपीलीय अदालत ने भी रिकॉर्ड की वास्तविक स्थिति की जांच करने के बजाय अपील के स्वरूप को देखकर फैसला कर दिया.

दोनों आदेश रद्द, अब नए सिरे से होगा मुकदमा

कोर्ट ने कहा कि अपीलीय अदालत को CrPC की धारा 386 के तहत पूरे रिकॉर्ड की विधिवत जांच करनी चाहिए थी. केवल इस आधार पर अपील को सीमित नहीं माना जा सकता कि निचली अदालत ने दोष स्वीकार के आधार पर सजा सुनाई है. साथ ही 28 नवंबर 2025 के दोषसिद्धि आदेश और 12 मार्च 2026 के अपीलीय आदेश को रद्द कर दिया.

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने मामला ट्रायल कोर्ट को वापस भेजते हुए कानून के अनुसार नए सिरे से सुनवाई का निर्देश दिया. अब आरोपियों के खिलाफ मुकदमे में साक्ष्य, गवाहों और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर फैसला होगा. यानी जिस मामले में सरेंडर करने पहुंचे आरोपियों को सजा सुना दी गई थी, उसमें अब विधिवत सुनवाई के बाद फैसला होगा.

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