CM योगी के आदेश पर तगड़ा एक्शन, नगर निगम के 2 ठेकेदार को जेल; 125 करोड़ के 296 टेंडर रद्द
कानपुर नगर निगम में ₹125 करोड़ के 296 टेंडर रद्द कर दिए गए हैं. मुख्यमंत्री की नाराजगी के बाद यह कार्रवाई हुई, जिसमें टेंडर पूलिंग और अवैध वसूली के आरोप में दो बड़े ठेकेदारों को गिरफ्तार किया गया. जांच में एक शक्तिशाली ठेकेदार सिंडिकेट के सक्रिय होने का खुलासा हुआ है.
कानपुर नगर निगम में ठेकों को लेकर चल रहे कथित खेल पर आखिरकार बड़ी कार्रवाई हुई है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नाराजगी के बाद नगर निगम ने 125 करोड़ रुपये के 296 टेंडर निरस्त कर दिए हैं. वहीं, पुलिस ने अवैध वसूली, रंगदारी, धोखाधड़ी और धमकी देकर ठेके हासिल कराने के आरोप में दो बड़े ठेकेदारों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है.
जांच में सामने आया कि नगर निगम के ठेकों में कुछ ठेकेदारों का एक नेटवर्क सक्रिय था. आरोप है कि यह नेटवर्क पहले से तय कर लेता था कि किस काम का ठेका किसे मिलना है. इसके लिए टेंडर पूलिंग का सहारा लिया जाता था. यानी प्रतिस्पर्धा दिखाने के लिए दूसरे नामों से टेंडर डलवाए जाते और अंत में पसंदीदा ठेकेदार को काम मिल जाता.
15% कमीशन का आरोप, सरगना फरार
पुलिस के मुताबिक, इस कथित नेटवर्क का सरगना आगरा निवासी ठेकेदार गोविंद शर्मा बताया जा रहा है, जो फिलहाल फरार है. जांच में ठेका दिलाने के बदले करीब 15 प्रतिशत कमीशन लिए जाने का आरोप भी सामने आया है. नगर निगम में करीब 400 फर्में पंजीकृत हैं, जिनमें लगभग 27 बड़े ठेकेदारों के बीच कथित सिंडिकेट की जांच की जा रही है.
नगर आयुक्त अर्पित उपाध्याय की जांच में सात फर्मों में अनियमितताएं मिलीं. इन फर्मों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया. इनमें गिरफ्तार दोनों ठेकेदारों संदीप जैन की पारसनाथ बिल्डर्स और रज्जन बाजपेई की जगदंबा इंटरप्राइजेज शामिल हैं. इसके अलावा मेसर्स दिलीप बाजपेई, अजय इंटरप्राइजेज, कैलादेवी इंटरप्राइजेज, प्रार्थना शुक्ला की तिरुपति ट्रेडर्स भी हैं.
20-50 पैसे के अंतर से टेंडर ने बढ़ाया शक
जांच के दौरान नगर निगम में पंजीकृत हॉटमिक्स प्लांटों और ठेकेदारों के दस्तावेज भी खंगाले गए. कई जगह दस्तावेज अधूरे मिले. कुछ प्लांट बंद मिले तो कुछ जगह मशीनें ही मौजूद नहीं थीं. जांच में 27 बड़ी कंपनियों से जुड़े करीब 85 करोड़ रुपये के टेंडर भी सवालों के घेरे में आए हैं. इसके बाद एक मामला फजलगंज और 5 मुकदमे स्वरूप नगर थाने में दर्ज हुए हैं.
बताया गया है कि एक वार्ड में टेंडर डालने का तरीका भी जांच अधिकारियों के लिए खासा चौंकाने वाला रहा. आरोप है कि वहां कई बार टेंडर बेहद मामूली अंतर से डाले जाते थे. कुछ मामलों में बोली का अंतर महज 20 से 50 पैसे तक बताया गया है. इससे जांच एजेंसियों को टेंडर पहले से तय होने की आशंका हुई है.
एडीसीपी सेंट्रल के नेतृत्व में एसआईटी गठित
इस मामले में ठेकेदारों के बैंक खातों, लेनदेन, आय-व्यय और उनके आपसी नेटवर्क की भी जांच की जा रही है. इसके लिए एडीसीपी सेंट्रल डॉ. अर्चना सिंह के नेतृत्व में एसआइटी गठित की गई है. वहीं, मुख्यमंत्री की नाराजगी के बाद नगर निगम ने 15वें वित्त आयोग से जुड़े विकास कार्यों के भुगतान पर रोक लगाने के साथ नई फर्मों के पंजीकरण भी बंद कर दी है.
मैन्युअल टेंडर और लॉटरी की व्यवस्था खत्म कर अब सभी कामों में ई-टेंडरिंग लागू करने की तैयारी है. निरस्त किए गए टेंडरों के लिए नगर निगम जल्द नई तारीख तय करेगा. अब देखना यह है कि एसआइटी की जांच में इस कथित सिंडिकेट से जुड़े और कितने नाम सामने आते हैं और नगर निगम के भीतर किसी कर्मचारी की भूमिका थी या नहीं.
