जज्बे को सलाम! जनगणना में लगी ड्यूटी कटवाने की होड़, लेकिन इन दिव्यांगों ने पेश कर दी मिशाल

उत्तर प्रदेश में जहां स्वस्थ कर्मचारी जनगणना ड्यूटी से बचने के बहाने ढूंढ रहे हैं, वहीं कानपुर के दिव्यांग कर्मचारियों ने आगे बढ़कर कर्तव्यनिष्ठा का अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है. विजय बहादुर, जयप्रकाश शर्मा और मधु सिंह जैसे इन दिव्यांगों ने साबित किया है कि शारीरिक अक्षमताएं नहीं, बल्कि इरादों की कमी राष्ट्र सेवा में बाधा बनती है. इनका यह जज्बा दूसरों के लिए सच्ची प्रेरणा है.

जनगणना की सांकेतिक तस्वीर

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय जनगणना का शुभारंभ एक मई से होने जा रहा है. इसके लिए सभी जिलों में कर्मचारियों की ड्यूटी लगाने के साथ ही ट्रेनिंग शुरू हो गई है. इसी बीच बड़ी संख्या में कर्मचारी ड्यूटी कटवाने के लिए सिफारिश लगाने के साथ ही अपनी मेडिकल हिस्ट्री बनवाने और लगाने में जुट गए हैं. कई ऐसे कर्मचारियों ने भी बीमारी का बहाना कर ड्यूटी कटवाने की गुहार की है, जो पूरी तरह स्वस्थ हैं.

ऐसे में कानपुर के कुछ दिव्यांगों ने ड्यूटी के लिए आगे आकर अपनी कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्र के प्रति सेवा भाव की अनूठी मिशाल पेश की है. इन दिव्यांग कमर्चारियों ने साबित किया है कि राष्ट्रीय महत्व के कार्यों में जब ‘स्व’ से ऊपर ‘सेवा’ का भाव आ जाए, तो शारीरिक अक्षमताएं भी छोटी पड़ जाती हैं. इनमें विजय बहादुर, जयप्रकाश शर्मा और मधु सिंह जैसे दर्जनों की संख्या में दिव्यांग कर्मचारी शामिल हैं. इन्होंने अन्य कर्मचारियों को बताया है कि बाधा पैरों में नहीं, बल्कि इरादों में होती हैं.

80 फीसदी दिव्यांग हैं विजय बहादुर

​पं. जवाहर लाल नेहरू इंटर कॉलेज, जामू के सहायक अध्यापक विजय बहादुर 80 प्रतिशत दिव्यांगता की श्रेणी में आते हैं. उनके एक पैर में पोलियो है और इसकी वजह से वह जनगणना ड्यूटी से वैधानिक छूट के पात्र हैं, लेकिन उन्होंने खुद आगे बढ़कर ड्यूटी स्वीकार की है. 2011 की जनगणना का अनुभव रखने वाले विजय बहादुर कहते हैं, “जनगणना देश के भविष्य की योजनाओं की नींव है. यदि हम ही पीछे हटेंगे, तो राष्ट्र निर्माण का यह पहिया कैसे घूमेगा?”

प्रेरणा श्रोत है जयप्रकाश का संकल्प

हरजिंदर नगर इंटर कॉलेज के सहायक अध्यापक जयप्रकाश शर्मा की कहानी प्रेरणा श्रोत है. कृत्रिम पैर के सहारे चलने वाले जयप्रकाश ने ड्यूटी कटवाने के बजाय जिम्मेदारी को खुद आगे बढ़कर स्वीकार किया है. उनका कहना है कि शारीरिक सीमाएं तब तक बाधा नहीं बनतीं, जब तक व्यक्ति का मन हार न मान ले. उनका यह रुख उन तमाम कार्मिकों के लिए एक मौन चुनौती है जो छोटे-छोटे बहानों से राष्ट्रीय कार्य से मुंह मोड़ रहे हैं.

मधु सिंह बोली- मैं क्यों नहीं

​शिवराजपुर के प्राथमिक विद्यालय सदिकामऊ में कार्यरत शिक्षा मित्र मधु सिंह ने एक नया उदाहरण पेश किया है. वह दाहिने पैर से दिव्यांग हैं, उनकी ड्यूटी कट भी रही थी, लेकिन मधु ने खुद ड्यूटी मांगी. कहा कि बस इतनी रियायत मिले कि घर के पास वाले इलाके में उनकी ड्यूटी लगे. उन्होंने जिलाधिकारी से इस तरह का अनुरोध करते हुए कहा कि इस अभियान में वह अपना शत-प्रतिशत योगदान देना चाहती हैं. जिलाधिकारी ने भी उनकी सोच को सलाम किया है.

Follow Us