योगी सरकार की तीन शर्त से लेकर SC में सुनवाई तक… 69 हजार शिक्षक भर्ती केस में अबतक क्या-क्या हुआ?
उत्तर प्रदेश की 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने बड़ा रुख स्पष्ट किया है. सरकार ने हलफनामे में कहा है कि 2020 में नियुक्त 67,867 शिक्षकों की नौकरी सुरक्षित रहेगी और किसी की सेवा समाप्त नहीं की जाएगी. साथ ही संशोधित मेरिट सूची में पात्र पाए जाने वाले नए अभ्यर्थियों को उपलब्ध रिक्त पदों पर समायोजित कर नियुक्ति देने का प्रस्ताव रखा गया है. सरकार ने स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था केवल इसी भर्ती तक सीमित रहेगी. अब करीब 9 हजार अभ्यर्थियों की निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं.
उत्तर प्रदेश की सबसे चर्चित 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में योगी सरकार ने अपनी हलफनामा दाखिल किया. सरकार ने साफ कर दिया कि साल 2020 में नियुक्त 67,867 सहायक शिक्षकों की नौकरी पर कोई खतरा नहीं आएगा. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि अगर इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशानुसार तैयार की गई संशोधित मेरिट सूची में कुछ नए अभ्यर्थी पात्र पाए जाते हैं तो उन्हें पहले से कार्यरत शिक्षकों को हटाए बिना उपलब्ध रिक्त पदों पर समायोजित करते हुए नियुक्ति दी जाएगी.
यूपी सरकार ने यह भी साफ किया कि यह व्यवस्था केवल 69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती तक सीमित रहेगी और इसे भविष्य में किसी अन्य भर्ती प्रक्रिया या आरक्षण विवाद में नजीर के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाएगा. सरकार का यह रुख ऐसे समय सामने आया है जब सालों से आरक्षण, मेरिट सूची और नियुक्तियों को लेकर हजारों अभ्यर्थी न्याय की मांग कर रहे हैं. दूसरी ओर 2020 से नौकरी कर रहे हजारों शिक्षकों के सामने भी अपनी नौकरी बचाने का संकट बना हुआ था. ऐसे में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने समाधान रखा है.
सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा?
उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि सुप्रीम कोर्ट की पिछली सुनवाई में दिए गए सुझावों के बाद पूरे मामले की समीक्षा की गई. इसके बाद सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंची कि यदि संशोधित मेरिट सूची में कुछ नए अभ्यर्थी पात्र पाए जाते हैं तो उन्हें उपलब्ध रिक्त पदों पर नियुक्ति दी जा सकती है. सरकार ने यह भी भरोसा दिया कि सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला आने के बाद उसका अक्षरशः पालन किया जाएगा. सरकार ने अदालत के समक्ष तीन प्रमुख बातें रखीं—
- 2020 में नियुक्त 67,867 शिक्षकों की सेवाएं प्रभावित नहीं होंगी
- संशोधित मेरिट सूची में पात्र पाए जाने वाले अभ्यर्थियों को उपलब्ध रिक्त पदों पर नियुक्त किया जाएगा
- यह व्यवस्था केवल इसी भर्ती तक सीमित रहेगी
नौ हजार अभ्यर्थियों को मिल सकती है राहत
सरकार ने अदालत को बताया कि इस भर्ती विवाद से जुड़े लगभग 9 हजार अभ्यर्थी विभिन्न याचिकाओं के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं. इन अभ्यर्थियों का दावा है कि आरक्षण नियमों के सही अनुपालन की स्थिति में उन्हें नियुक्ति मिलनी चाहिए थी. सरकार ने कहा कि यदि संशोधित मेरिट सूची में ये अभ्यर्थी पात्र पाए जाते हैं और रिक्त पद उपलब्ध हैं तो उन्हें नियमों के अनुसार नियुक्ति देने में सरकार को कोई आपत्ति नहीं है.
आखिर 69 हजार शिक्षक भर्ती विवाद क्या है?
69 हजार सहायक शिक्षक भर्ती उत्तर प्रदेश की अब तक की सबसे बड़ी प्राथमिक शिक्षक भर्ती प्रक्रियाओं में शामिल है. इस भर्ती का विज्ञापन 2018 में जारी किया गया था. इसके तहत बेसिक शिक्षा परिषद के प्राथमिक विद्यालयों में 69 हजार सहायक अध्यापकों की नियुक्ति होनी थी. भर्ती प्रक्रिया के तहत 6 जनवरी 2019 को सहायक अध्यापक भर्ती परीक्षा (ATRE-2019) आयोजित की गई. इसके अगले ही दिन यानी 7 जनवरी 2019 को राज्य सरकार ने न्यूनतम उत्तीर्णांक निर्धारित किए—
सामान्य वर्ग – 65 प्रतिशत
आरक्षित वर्ग – 60 प्रतिशत
यहीं से विवाद की शुरुआत भी मानी जाती है. सरकार द्वारा न्यूनतम उत्तीर्णांक निर्धारित किए जाने के बाद कई अभ्यर्थियों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की. उनका कहना था कि सरकार भर्ती प्रक्रिया के बीच नियम नहीं बदल सकती. हालांकि 6 मई 2020 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकार के निर्णय को सही ठहराया. इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. 18 नवंबर 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने भी हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए सभी याचिकाएं खारिज कर दीं. इसके बाद भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ी.
67,867 शिक्षकों को मिली नियुक्ति
1 जून 2020 को बेसिक शिक्षा परिषद ने गुणवत्ता अंक के आधार पर 67,867 अभ्यर्थियों की चयन सूची जारी की. इन सभी अभ्यर्थियों को नियुक्ति दे दी गई और वे पिछले लगभग छह सालों से प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत हैं. हालांकि कुल 69 हजार पदों में से 1133 पद अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग के रिक्त रह गए क्योंकि उस वर्ग में पर्याप्त पात्र अभ्यर्थी उपलब्ध नहीं थे. यहीं से भर्ती का दूसरा विवाद शुरू हुआ.
आरक्षण को लेकर क्या आरोप लगे?
चयन सूची जारी होने के बाद बड़ी संख्या में अभ्यर्थी इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचे. उन्होंने आरोप लगाया कि भर्ती प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश आरक्षण अधिनियम-1994 और बेसिक शिक्षा सेवा नियमावली-1981 का पालन नहीं किया गया. अभ्यर्थियों का दावा था कि OBC वर्ग के लिए कुल 18,598 पद आरक्षित थे, लेकिन OBC अभ्यर्थियों को केवल 2637 नियुक्तियां मिलीं यानी उन्हें 27 प्रतिशत के बजाय लगभग 3.86 प्रतिशत प्रतिनिधित्व मिला. इसी तरह अनुसूचित जाति (SC) वर्ग को भी निर्धारित 21 प्रतिशत के मुकाबले 16.6% ही प्रतिनिधित्व मिलने का आरोप लगाया गया. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि आरक्षित वर्ग की हजारों सीटें सामान्य वर्ग में चली गईं.
हालांकि, सरकार का कहना है कि अनारक्षित कोटे में 34589 अभ्यर्थियों की भर्जी हुई (इसमें 20301 सामान्य, 12639 OBC, 1637 SC और 21 ST शामिल), OBC कोर्ट में 18598 (12639 को जोड़कर 31228), SC कोटे में 14459 (1637 को जोड़कर 17260) की भर्ती हुई. ST कोटे में 1354 अभ्यर्थी का चयन हुआ, लेकिन सिर्फ 211 को नौकरी मिली. सरकार का कहना था कि आरक्षण का पालन किया गया, लेकिन विवाद की वजह यही बनी.
मेरिटोरियस रिजर्व कैटेगरी (MRC) क्या है?
पूरा विवाद मुख्य रूप से Meritorious Reserved Category (MRC) को लेकर है. एमआरसी ऐसे अभ्यर्थियों को कहा जाता है जो आरक्षित वर्ग से होते हुए भी इतने अधिक अंक प्राप्त कर लेते हैं कि वे सामान्य वर्ग की मेरिट में स्थान प्राप्त कर लेते हैं. सुप्रीम कोर्ट के अनेक निर्णयों में यह सिद्धांत स्थापित है कि ऐसे अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग की सीटों पर समायोजित किया जाएगा. ऐसा करने से आरक्षित वर्ग की सीटें उसी वर्ग के अन्य अभ्यर्थियों के लिए उपलब्ध रहती हैं. याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि 69 हजार शिक्षक भर्ती में इस सिद्धांत का सही ढंग से पालन नहीं किया गया.
दूसरा पक्ष क्या कह रहा था?
भर्ती का समर्थन कर रहे अभ्यर्थियों का तर्क अलग था. उनका कहना था कि जिन आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने 5 प्रतिशत की छूट लेकर TET अथवा ATRE परीक्षा उत्तीर्ण की है, उन्हें सामान्य वर्ग में माइग्रेशन का लाभ नहीं मिल सकता. इसी कानूनी व्याख्या को लेकर मामला लगातार अदालतों में चलता रहा.
6800 अभ्यर्थियों की दूसरी सूची क्यों रुकी?
पहली चयन सूची के बाद सरकार ने 5 जनवरी 2022 को लगभग 6800 अभ्यर्थियों की दूसरी चयन सूची जारी की, लेकिन यह सूची अदालत में चुनौती दी गई. 27 जनवरी 2022 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस सूची पर रोक लगा दी. बाद में 15 मार्च 2022 को विशेष अपील में भी यह रोक बरकरार रखी गई. यानी दूसरी चयन सूची कभी लागू ही नहीं हो सकी.
हाईकोर्ट की सिंगल बेंच और डिवीजन बेंच के फैसलों ने बदली पूरे मामले की दिशा
69 हजार शिक्षक भर्ती विवाद में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट की सिंगल बेंच और बाद में डिवीजन बेंच ने अलग-अलग फैसले दिए. दोनों फैसलों की कानूनी व्याख्या अलग थी और इन्हीं आदेशों के कारण मामला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया.
सिंगल बेंच ने क्या कहा?
13 मार्च 2023 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. कोर्ट ने कहा कि जिन आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने 60 प्रतिशत से अधिक लेकिन 65 प्रतिशत से कम अंक प्राप्त किए हैं और जिन्होंने आरक्षित वर्ग को दी गई 5 प्रतिशत की छूट का लाभ लेकर परीक्षा उत्तीर्ण की है, उन्हें सामान्य वर्ग में माइग्रेशन का लाभ नहीं दिया जा सकता. कोर्ट का कहना था कि ऐसे अभ्यर्थियों की नियुक्ति केवल उनके आरक्षित वर्ग की सीटों पर ही की जाएगी.
सिंगल बेंच ने सरकार को कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए—
- 1 जून 2020 को जारी चयन सूची में संशोधन किया जाए.
- 5 जनवरी 2022 को जारी 6800 अभ्यर्थियों वाली दूसरी चयन सूची रद्द की जाए.
- यदि संशोधित चयन सूची लागू होने से पहले से कार्यरत शिक्षकों की नौकरी प्रभावित होती है तो सरकार उनके संबंध में अलग नीति बनाने पर विचार कर सकती है.
यह फैसला आते ही भर्ती से जुड़े दोनों पक्षों के बीच विवाद और गहरा गया.
डिवीजन बेंच ने पलट दिया फैसला
सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ बड़ी संख्या में विशेष अपीलें दायर की गईं. इन अपीलों पर सुनवाई करते हुए 13 अगस्त 2024 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच का फैसला रद्द कर दिया. डिवीजन बेंच ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया में मेरिट सूची तैयार करने का तरीका ही सही नहीं अपनाया गया. कोर्ट ने सरकार को नई मेरिट सूची तैयार करने का आदेश देते हुए कहा—
- पहले सभी अभ्यर्थियों की क्वालिटी प्वाइंट के आधार पर मेरिट सूची तैयार की जाए.
- उसके बाद उत्तर प्रदेश आरक्षण अधिनियम के अनुसार आरक्षण लागू किया जाए.
- मेरिटोरियस रिजर्व कैटेगरी (MRC) के अभ्यर्थियों को सामान्य वर्ग में ही समायोजित किया जाए.
- इसके बाद क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation) लागू किया जाए.
क्षैतिज आरक्षण क्या होता है?
डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि मेरिट और आरक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद क्षैतिज आरक्षण लागू किया जाएगा. क्षैतिज आरक्षण का अर्थ है कि प्रत्येक सामाजिक वर्ग (General, OBC, SC, ST) के भीतर महिलाओं, दिव्यांगों, स्वतंत्रता सेनानी आश्रितों, पूर्व सैनिकों और अन्य विशेष श्रेणियों को निर्धारित आरक्षण दिया जाता है. कोर्ट का कहना था कि पूरी प्रक्रिया इसी क्रम में पूरी होनी चाहिए.
छात्रों की पढ़ाई प्रभावित न हो, इसलिए दिया था ‘सेशन बेनिफिट’
डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में एक और महत्वपूर्ण बात कही. कोर्ट ने माना कि यदि नई मेरिट सूची लागू होने से पहले से कार्यरत शिक्षकों की नियुक्ति प्रभावित होती है तो इसका असर लाखों विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ेगा. इसी वजह से अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि यदि किसी शिक्षक की सेवा प्रभावित होती है तो उसे तत्काल हटाने के बजाय छात्रों के हित को ध्यान में रखते हुए सेशन बेनिफिट दिया जाए. यानी शैक्षणिक सत्र के बीच स्कूलों में पढ़ाई बाधित नहीं होनी चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
हाईकोर्ट के डिवीजन बेंच के फैसले के खिलाफ कई पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे. कुछ याचिकाकर्ता चाहते थे कि हाईकोर्ट का फैसला लागू किया जाए और नई मेरिट सूची तुरंत जारी हो. दूसरी ओर पहले से कार्यरत हजारों शिक्षकों ने अपनी नौकरी सुरक्षित रखने की मांग की. मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 9 सितंबर 2024 को हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि फिलहाल नई मेरिट सूची लागू नहीं की जाएगी. साथ ही सभी पक्षों से विस्तृत लिखित जवाब दाखिल करने को कहा गया.
सालों तक चलता रहा कानूनी संघर्ष
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की कई बार सुनवाई हुई. एक ओर आरक्षित वर्ग के वे अभ्यर्थी थे जो नई मेरिट सूची लागू कराकर नियुक्ति चाहते थे. दूसरी ओर छह सालों से सेवा दे रहे लगभग 68 हजार शिक्षक थे, जिन्हें डर था कि यदि नई मेरिट सूची लागू हुई तो उनकी नौकरी चली जाएगी. सरकार भी ऐसी स्थिति से बचना चाहती थी जिसमें एक पक्ष को राहत मिले और दूसरे पक्ष को भारी नुकसान उठाना पड़े. इसी दौरान अदालत ने कई बार सरकार से पूछा कि क्या ऐसा कोई व्यावहारिक समाधान निकाला जा सकता है जिससे दोनों पक्षों के हित सुरक्षित रह सकें.
4 फरवरी 2026 की सुनवाई बनी निर्णायक
4 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार को सुझाव दिया कि वह ऐसा व्यावहारिक समाधान तलाशे जिससे पहले से नियुक्त शिक्षकों की सेवा भी सुरक्षित रहे और यदि कुछ अभ्यर्थी वास्तव में पात्र हैं तो उन्हें भी न्याय मिल सके. सुप्रीम कोर्ट के इस सुझाव के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने पूरे मामले की नए सिरे से समीक्षा शुरू की. सरकार ने संबंधित विभागों से रिपोर्ट मांगी, उपलब्ध रिक्त पदों का आंकड़ा जुटाया और संशोधित मेरिट सूची तैयार करने की प्रक्रिया भी शुरू कराई. यहीं से उस समाधान की रूपरेखा तैयार हुई, जिसे अब सरकार ने हलफनामे के रूप में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया है.
सुप्रीम कोर्ट के सुझाव के बाद सरकार ने बदला रुख
सुप्रीम कोर्ट में 4 फरवरी 2026 को हुई सुनवाई के दौरान अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा था कि क्या ऐसा कोई समाधान संभव है, जिससे वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों की नौकरी भी सुरक्षित रहे और यदि संशोधित मेरिट सूची में कुछ नए अभ्यर्थी पात्र पाए जाते हैं तो उन्हें भी न्याय मिल सके. अदालत के इसी सुझाव के बाद राज्य सरकार ने पूरे मामले की दोबारा समीक्षा शुरू की. बेसिक शिक्षा विभाग, विधि विभाग और अन्य संबंधित अधिकारियों के साथ कई स्तर पर विचार-विमर्श हुआ. इसके बाद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में संकेत दिया कि वह एक संतुलित समाधान के लिए तैयार है.
19 मई 2026 को सरकार ने क्या कहा?
19 मई 2026 की सुनवाई में उत्तर प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि यदि इलाहाबाद हाईकोर्ट के 13 अगस्त 2024 के आदेश के अनुरूप संशोधित मेरिट सूची तैयार करने पर कुछ नए अभ्यर्थी पात्र पाए जाते हैं, तो सरकार उन्हें नियुक्ति देने पर विचार करने के लिए तैयार है. हालांकि सरकार ने इसके साथ तीन महत्वपूर्ण शर्तें भी रखीं.
सरकार की पहली शर्त: संशोधित मेरिट सूची में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों के पास नियुक्ति के लिए आवश्यक सभी शैक्षणिक एवं वैधानिक योग्यताएं होनी चाहिए. यानी केवल मेरिट सूची में नाम आ जाने भर से नियुक्ति नहीं मिलेगी.
दूसरी शर्त: सरकार ने कहा कि नियुक्ति केवल उपलब्ध रिक्त पदों पर ही दी जाएगी. यदि रिक्त पद उपलब्ध नहीं होंगे तो नियुक्ति स्वतः नहीं दी जा सकती. यही वह आधार है जिसके सहारे सरकार वर्तमान में कार्यरत शिक्षकों की नौकरी सुरक्षित रखने की बात कह रही है.
तीसरी शर्त: सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट कहा कि यदि इस व्यवस्था को अदालत स्वीकार करती है तो इसे केवल 69 हजार शिक्षक भर्ती तक सीमित माना जाए. भविष्य में किसी अन्य भर्ती या किसी दूसरे आरक्षण विवाद में इसे मिसाल के रूप में इस्तेमाल न किया जाए. सरकार का तर्क है कि यह एक विशेष परिस्थिति में निकाला गया समाधान है.
सुप्रीम कोर्ट ने दिया छह हफ्ते का समय
सरकार का प्रस्ताव सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने उसे पूरी प्रक्रिया पूरी करने के लिए छह हफ्ते का समय दिया. साथ ही अदालत ने सरकार को निर्देश दिया कि वह संशोधित मेरिट सूची तैयार करने के बाद विस्तृत स्थिति रिपोर्ट अदालत के समक्ष दाखिल करे.
सरकार ने तैयार कर ली संशोधित मेरिट सूची
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के 13 अगस्त 2024 के आदेश के अनुसार संशोधित मेरिट सूची तैयार कर ली. 20 जुलाई 2026 को दाखिल हलफनामे में सरकार ने अदालत को बताया कि संशोधित मेरिट सूची तैयार हो चुकी है. अब सरकार ने इस मेरिट सूची के आधार पर पात्र पाए जाने वाले अभ्यर्थियों को उपलब्ध रिक्त पदों पर समायोजित करने का प्रस्ताव तैयार किया है.
सबसे बड़ी राहत— 67,867 शिक्षकों की नौकरी नहीं जाएगी
हलफनामे का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यही है. सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को स्पष्ट रूप से बताया कि 2020 में नियुक्त 67,867 शिक्षकों की सेवाएं समाप्त नहीं की जाएंगी. यानी पिछले लगभग छह सालों से प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ा रहे शिक्षकों की नौकरी सुरक्षित रखने की योजना सरकार ने अदालत के सामने रख दी है. यह उन हजारों शिक्षकों के लिए बड़ी राहत मानी जा रही है, जो लंबे समय से इस आशंका में थे कि संशोधित मेरिट सूची आने के बाद उनकी नियुक्ति रद्द हो सकती है.
नए अभ्यर्थियों को कैसे मिलेगा लाभ?
सरकार का प्रस्ताव यह है कि यदि संशोधित मेरिट सूची में कुछ नए अभ्यर्थी पात्र पाए जाते हैं तो उन्हें पहले से कार्यरत शिक्षकों को हटाकर नियुक्त नहीं किया जाएगा. बल्कि सरकार उपलब्ध रिक्त पदों पर उनका समायोजन करेगी. यानी वर्तमान टीचर अपनी नौकरी जारी रखेंगे. नए पात्र अभ्यर्थियों को भी नियुक्ति देने का प्रयास किया जाएगा. दोनों पक्षों के हितों के बीच संतुलन बनाया जाएगा.
करीब नौ हजार अभ्यर्थियों की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर
इस पूरे विवाद में लगभग 9 हजार अभ्यर्थी स्वयं को नियुक्ति का पात्र बताते हुए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे हैं. इनका कहना है कि यदि शुरू से आरक्षण नियमों और मेरिटोरियस रिजर्व कैटेगरी (MRC) का सही अनुपालन किया गया होता तो उन्हें वर्ष 2020 में ही नियुक्ति मिल गई होती. अब सरकार के नए हलफनामे से इन अभ्यर्थियों को भी उम्मीद जगी है. हालांकि अंतिम फैसला सुप्रीम कोर्ट को ही करना है.
सालों से आंदोलन कर रहे हैं अभ्यर्थी
69 हजार शिक्षक भर्ती विवाद केवल अदालत तक सीमित नहीं रहा. पिछले कई वर्षों में अभ्यर्थियों ने लखनऊ सहित प्रदेश के कई शहरों में लगातार प्रदर्शन किए. कई बार अभ्यर्थियों ने विधानसभा के सामने धरना दिया. कुछ प्रदर्शन ऐसे भी रहे जिनमें अभ्यर्थी सड़कों पर रेंगते हुए विरोध दर्ज कराते नजर आए. भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आजाद भी एक समय अभ्यर्थियों के आंदोलन में शामिल हुए थे. अभ्यर्थियों का कहना था कि आरक्षण नियमों का सही पालन होने तक उनका संघर्ष जारी रहेगा. अब पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर निर्भर है.
