कैसे चोरी हुआ चढ़ावा? सामने आया राम मंदिर का लूप होल, ट्रस्ट कर्मियों के आगे बेअसर हो गए सुरक्षा इंतजाम
अयोध्या राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले एक बड़े लूप होल का खुलासा हुआ है. दरअसल यह खेल वर्षों से चल रहा था और सुरक्षा के पुख्ता इंतजामों के बावजूद ट्रस्ट कर्मियों की मिलीभगत से हो रहा था. ट्रस्ट के कर्मचारियों के दबदबे के चलते सुरक्षाकर्मी उन्हें चेक नहीं करते थे. इसकी वजह से बड़े पैमाने पर दान राशि का हेरफेर संभव हो सका. एसआईटी की जांच में यह सुरक्षा चूक और ट्रस्ट के भीतर की मिलीभगत उजागर हुई है.
अयोध्या के रामजन्मभूमि परिसर में चढ़ावा चोरी का खेल वर्षों से चल रहा था. यह खेल परिसर में तैनात सुरक्षा इंतजामों के बावजूद बदतूर चलता रहा, लेकिन ट्रस्ट कर्मियों के दबदबे और रसूख के आगे यहां तैनात सुरक्षाकर्मी उन्हें चेक करने की हिम्मत तक नहीं जुटा सके. जबकि यहां केंद्र व प्रदेश सरकार की दस से अधिक सुरक्षा एजेंसियां तैनात हैं. इनके अलावा तीन निजी सुरक्षा एजेंसियों को भी लगाया गया है.
कायदे से मंदिर में आने और जानें वालों की चेकिंग होती है, लेकिन सुरक्षाकर्मी ट्रस्ट कर्मियों के गले में लगे कार्ड को देखते ही उन्हें जाने देते थे. अब तक की जांच में पाया गया है कि सुरक्षा में इसी चूक का फायदा उठाकर ट्रस्ट कर्मियों ने राम मंदिर की दानराशि में गबन किया. बड़ी बात यह कि यह केवल एक दो बार नहीं, बल्कि सालों साल चलता रहा. अधिकारियों के मुताबिक यदि निकास के समय इन ट्रस्ट कर्मियों की भी तलाशी हुई होती तो शायद यह खेल पहले ही उजागर हो जाता.
कैसे उजागर हुआ गबन?
बहुत संभव है कि इस तरह का खेल ही नहीं होता. अधिकारियों के मुताबिक इसी लूप होल का फायदा उठाकर अनुकल्प मिश्र, लवकुश मिश्र, मनीष यादव जैसे लोग घोटाले को अंजाम देते रहे हैं. जानकारी के मुताबिक राम मंदिर के दानपात्रों से धनराशि गबन का मामला 5 जून को सामने आया. इसमें विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और ट्रस्ट से जुड़े लोग ही इसमें सूत्रधार पाए गए थे. इसके बाद ट्रस्ट के महासचिव चंपतराय ने सुरक्षाकर्मियों के माध्यम से संदिग्ध कर्मी की तलाशी कराई तो रुपये बरामद हुए. इसके बाद अन्य कर्मियों को भी पकड़ा गया.
नृपेंद्र मिश्रा ने स्वीकार किया गबन
मामला बढ़ने पर प्रदेश सरकार ने मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित की. फिर राम मंदिर निर्माण समिति के चेयरमैन नृपेंद्र मिश्र ने मीडिया के सामने स्वीकार किया कि गबन हुआ है. ट्रस्ट के पूर्व लेखा प्रभारी महिपाल सिंह और इंजीनियर दीनानाथ वर्मा ने भी खुलकर आरोप लगाए. इसमें इन्होंने ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्र, महासचिव चंपतराय, व्यवस्थापक गोपाल राव समेत अन्य पदाधिकारियों का भी नाम लिया. इससे मामले की चर्चा पूरे देश में होने लगी.
क्यों फेल हुए सुरक्षा इंतजाम?
सूत्रों के मुताबिक मामला सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ में इसलिए नहीं आ सका, क्योंकि परिसर में ट्रस्ट कर्मियों और ट्रस्ट पदाधिकारियों से जुड़े लोगों की काफी हनक थी. सुरक्षाकर्मी भी उनकी चेकिंग करने से घबराते थे. साधारण कर्मियों की चेकिंग तो होती थी, लेकिन पदाधिकारियों के करीबियों या चर्चित चेहरों की नहीं. रामशंकर यादव टिन्नू भी इसी सूची में शामिल रहा, जो मंदिर व्यवस्था से जुड़ा था. एसआईटी की जांच में इस सुरक्षा चूक को गबन का प्रमुख कारण माना गया है.
टिन्नू के पास था प्रशासन का वाकी-टाकी
दानराशि हेराफेरी उजागर होने के बाद पता चला कि रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू को प्रशासन की ओर से वाकी-टाकी भी उपलब्ध कराया गया था. वह इसी के जरिए दिशा-निर्देश देता रहता था. जांच का विषय है कि उसे वाकी-टाकी किसके आदेश पर और क्यों दिया गया? टिन्नू इसी हनक का फायदा उठाकर मनमाने तरीके से काम करता था. रामजन्मभूमि जैसे अत्यंत संवेदनशील स्थल पर सुरक्षा व्यवस्था में आई इस बड़ी चूक पर अब सवाल उठ रहे हैं. एसआईटी जांच में और कितने बड़े खुलासे होते हैं, यह देखना बाकी है.