‘ऐसे अफसरों को अपराधिक रूप से जिम्मेदार ठहराया जाए’; हाईकोर्ट ने यूपी सीएम से क्यों कहा ऐसा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक आदेश में यूपी के सीएम से अपील करते हुए कहा कि अफसरों को अपने अधीन काम करने वालों द्वारा किए गए गलत कामों या चूकों को रोकने या दंडित करने में उनकी विफलता के लिए आपराधिक रूप से भी ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अहम आदेश में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री सीएम योगी से अपील करते हुए कहा है ‘वह इस बात को स्वीकार करें कि अब समय आ गया है, जब वरिष्ठ अफसरों और शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों को उनके विभागों या उनके अधीन काम करने वालों की चूकों के लिए जवाबदेह के लिए आपराधिक रूप से भी ज़िम्मेदार ठहराया जाए. जस्टिस विनोद दिवाकर की बेंच ने कहा कि राज्य को इसके लिए ‘उच्च ज़िम्मेदारी’ का सिद्धांत अपनाना चाहिए.
हाईकोर्ट ने आगे कहा कि अफसरों को अपने अधीन काम करने वालों द्वारा किए गए गलत कामों या चूकों को रोकने या दंडित करने में उनकी विफलता के लिए आपराधिक रूप से भी ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. बेंच ने अपने आदेश में कहा, ‘वरिष्ठ अफ़सरों को अपने अधीन काम करने वालों के आचरण और प्रदर्शन के लिए जवाबदेह होना चाहिए, क्योंकि सार्वजनिक सेवाओं की प्रभावी डिलीवरी सुनिश्चित करना उनकी पेशेवर और प्रशासनिक, दोनों तरह की ज़िम्मेदारी है.
कोर्ट ने दो संस्थागत पतनों का किया जिक्र
कोर्ट ने अपने आदेश संस्थागत पतन के दो अलग-अलग रूपों के बारे में जिक्र किया. पहला ‘मन का भ्रष्टाचार’ जिसके तहत आधिकारिक सत्ता की आड़ में निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए निर्णय लेने की प्रक्रिया को जानबूझ कर खराब कर दिया जाता है. दूसरा ‘पैसे का भ्रष्टाचार’, जिसके तहत सार्वजनिक पद को व्यक्तिगत आर्थिक लाभ का ज़रिया बना लिया जाता है. बेंच ने कहा, ‘ऐसी जवाबदेही को वैध रूप से आपराधिक दायित्व तक बढ़ाया जा सकता है.
कोर्ट इस याचिका पर सुनवाई करते हुए दी टिप्पणी
कोर्ट ने यह टिप्पणी व्यवसायी अवनीश कुमार अग्रवाल द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए की. इस याचिका में बरेली स्पेशल कोर्ट द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसमें याचिकाकर्ता के पासपोर्ट के नवीनीकरण के लिए ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ जारी करने की उसकी अर्जी खारिज की गई थी. इसके अलावा याचिका में, ‘कुछ अज्ञात शरारती तत्वों’ द्वारा सरकारी कार्यालय में आग लगाकर आधिकारिक रिकॉर्ड को नष्ट करने के आरोप भी लगाए गए थे.
हाईकोर्ट के सामने याचिकाकर्ता ने दलील दी कि एक एफआईआर में जांच लगभग 2 दशकों से लंबित है. दूसरी एफआईआर में 18 वर्षों की देरी के बाद वर्ष 2024 में ही आरोप-पत्र दाखिल किया गया. उन्होंने यह भी कहा कि आरोप उन्हें परेशान करने के लिए ही लगाए गए थे. हाईकोर्ट की एक कोऑर्डिनेट बेंच ने उनके खिलाफ चल रही कार्यवाही पर पहले ही रोक लगा दी थी. याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वह एनओसी पाने का हकदार है. हालांकि, राज्य के वकील ने आरोपों की गंभीरता का हवाला दिया और याचिका में मांगी गई राहत का विरोध किया है.
हाईकोर्ट ने इस केस का भी जिक्र किया
हाईकोर्ट ने मनीष कुमार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में हाईकोर्ट के 2023 के आदेश का ज़िक्र किया, जिसमें राज्य सरकार को एक उच्च-स्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया गया. इस समिति का काम भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी के मामलों में सरकारी विभागों द्वारा दर्ज एफआईआर की जांच की निगरानी के लिए दिशा निर्देश तैयार करना था. उस मामले में अन्य निर्देशों के अलावा, डिवीज़न बेंच ने निर्देश दिया था कि जांच को चरणबद्ध तरीके से और तेज़ी से पूरा किया जाए. मौजूदा मामले में बेंच को बताया गया कि 2023 के फैसले के बाद उच्च-स्तरीय समिति का गठन दिसम्बर 2025 में ही किया गया.लगभग दो साल की देरी के बाद. वह भी तब, जब इस कोर्ट ने मौजूदा मामले का संज्ञान लिया.
जस्टिस दिवाकर ने राज्य को याद दिलाया कि नियम और कानून ठीक इसी अनियंत्रित शक्तियों को सीमित करने और एक नियम वाली संस्कृति को लागू करने के लिए ही बनाए गए हैं. बेंच ने आगे कहा कि फैसला सुरक्षित रखने के बाद उसने हाई-पावर्ड कमेटी द्वारा लिए गए फैसलों की प्रगति के बारे में अपडेट के लिए तीन महीने से ज़्यादा इंतज़ार किया, लेकिन फैसला सुनाए जाने की तारीख तक उसे कोई जानकारी नहीं मिली. इस स्थिति को ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ बताते हुए बेंच ने सरकार को याद दिलाया कि मुख्य सचिव राज्य प्रशासन की संरचना की मुख्य कड़ी होते हैं, और जो लोग उनका प्रतिनिधित्व करते हैं, उनसे असाधारण सतर्कता की उम्मीद की जाती है.
कोर्ट ने रजिस्ट्रार और मुख्य सचिव को दिया ये निर्देश
बेंच ने अपने रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि वे तुरंत इस फैसले की एक प्रमाणित प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को भेजें. साथ में यह निर्देश भी दें कि हाई-पावर्ड कमेटी की कार्यवाही समयबद्ध और प्रभावी तरीके से पूरी की जाए. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वह इस फैसले को सीधे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के समक्ष प्रस्तुत करें ताकि वह इसका व्यक्तिगत रूप से अवलोकन कर सकें और कोर्ट की चिंताओं पर उचित विचार किया जा सकें. कोर्ट ने क्षेत्रीय पासपोर्ट प्राधिकरण, बरेली को निर्देश दिया कि वह निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार याचिकाकर्ता के पक्ष में पासपोर्ट जारी-करें.