166 दिन की जेल, टॉर्चर… इनामी बदमाश समझ कैसे कांस्टेबल को उठा ले गई राजस्थान पुलिस? बड़ा खुलासा
राजस्थान पुलिस ने एक बड़ी गलती करते हुए यूपी के कांस्टेबल अखिलेश त्रिपाठी को 166 दिनों तक जेल में बंद रखा. इनामी बदमाश समझकर उन्हें गिरफ्तार किया गया, जबकि वे निर्दोष थे और असली आरोपी कोई और था. जयपुर हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद रिहाई मिलने पर अब पीड़ित कांस्टेबल अपने साथ हुए अन्याय के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं.
राजस्थान पुलिस ने एक ऐसा कारनामा कर दिखाया है, जिससे पूरे देश में राजस्थान पुलिस की किरकिरी हो रही है. राजस्थान पुलिस ने छह महीने पहले एक इनामी बदमाश को पकड़ने के लिए राजधानी लखनऊ में दबिश दी थी. इस दौरान राजस्थान पुलिस यूपी पुलिस के कांस्टेबल अखिलेश त्रिपाठी को ही उठा ले गई और जेल में डाल दिया. कांस्टेबल ने लाख सबूत दिखाए, लेकिन किसी ने उसकी एक ना सुनी. आखिर में जयपुर हाईकोर्ट में चली लंबी लड़ाई के बाद अब इस कांस्टेबल को रिहाई मिल सकी है.
जानकारी के मुताबिक पीड़ित कांस्टेबल अखिलेश त्रिपाठी की ड्यूटी सुरक्षा वाहिनी गोमतीनगर में थी. छह महीने पहले शिवरात्रि के दिन वह शिव मंदिर में अपने बच्चों के साथ जल चढ़ाने गए थे. वापस लौटते वक्त एक बिना नंबर वाली काली स्कॉर्पियो में से उतरे चार लोगों ने जबरन उन्हें गाड़ी में बैठा लिया और सीधे राजस्थान के गंगापुर सिटी जिला सवाई माधोपुर थाने पहुंच गए. पुलिस में शिकायत करने पर पता चला कि उनके खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज है.
क्या है पूरा मामला?
रिहाई के बाद पीड़ित ने बताया कि उसे अरेस्ट करने आई राजस्थान पुलिस के खिलाफ उनके खिलाफ ना तो कोई मुकदमा था, और ना ही कोई वारंट. जिस मुकदमे की ये बात कर रहे थे, वो किसी और के नाम पर था. संयोग से उसका नाम भी अखिलेश त्रिपाठी ही था. वह अपनी बेगुनाही का सबूत देते रह गए, लेकिन किसी ने उनकी एक ना सुनी और लॉकअप में डाल दिया गया. रात में नौ बजे राजस्थान पुलिस ने उनकी पत्नी से बात कराई. इसके बाद अगली सुबह उनके परिवार के लोग गंगापुर सिटी पहुंचे.
कोर्ट ने भी नहीं सुनी गुहार
पीड़ित ने बताया कि अगले दिन उन्हें न्यायालय सीजीएम फर्स्ट के यहां पेश किया गया. जहां उन्होंने एफिडेविट लगाया कि मैं वह व्यक्ति ही नहीं हूं, लेकिन कोर्ट ने भी पुलिस के साक्ष्य को सही माना और उन्हें जेल भेज दिया गया. फिर अगले दिन वापस कोर्ट लाया गया और कहा गया कि आपके सारे साक्ष्य झूठे हैं और एफिडेविट पर दस्तक करने के लिए कहा गया. उन्होंने मना किया तो उन्हें भरतपुर सेंट्रल जेल में शिफ्ट कर दिया गया.
ऐसे चली इंसाफ की लड़ाई
पीड़ित के मुताबिक उनकी पत्नी ने हार नहीं मानी और जयपुर हाईकोर्ट में जमानत अर्जी दाखिल की. वहां करीब साढे तीन महीने बाद सुनवाई हुई. जज ने सवाल किया कि जब पीड़ित लगातार कह रहा है कि वह वो व्यक्ति नहीं है तो इसकी सुनवाई क्यों नहीं हो रही? पीड़ित के मुताबिक जो असली आरोपी था, वो अखिलेश त्रिपाठी पुत्र विश्वनाथ है. उसके नाम से कंपनी रजिस्टर्ड है और वह अलीगंज के रहने वाला है. उसकी कंपनी कानपुर में जब रजिस्टर हुई, तब पीड़ित नाबालिग था. यह खुलासा संबंधित दस्तावेजों से हुए हैं.
पुलिस ने मानी गलती
इस खुलासे के बाद हाईकोर्ट ने पुलिस को यह साबित करने के लिए कहा कि जिसे अरेस्ट किया गया है, वही आरोपी है. इसके बाद पुलिस ने 30 जुलाई को उनके वकील से संपर्क किया, बताया कि पीड़ित के खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं है. फिर पुलिस ने कोर्ट में भी बताया कि गलत व्यक्ति को उठाया गया है. पुलिस ने बताया कि जिस अखिलेश त्रिपाठी सन ऑफ विश्वनाथ को अरेस्ट करना था, वह 1999 में ही मर चुका है. इसके बाद कोर्ट ने पीड़ित को निर्दोष मानते हुए बरी कर दिया है.
इंसाफ के लिए कोर्ट जाएगा पीड़ित
पीड़ित के मुताबिक बेगुनाह होने के बावजूद उसे 166 दिन जेल काटी है. यातनाएं सही हैं. इसके लिए जो लोग भी जिम्मेदार हैं, उनके खिलाफ वह जयपुर हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल करेंगे. कहा कि उनके दो मासूम बच्चे हैं, उनकी पढ़ाई प्रभावित हुई है. कानूनी लड़ाई में पैसों की व्यवस्था लेकर अन्य इंतजाम उनकी पत्नी ने कैसे किया, यह कोई और नहीं समझ सकता. राजस्थान पुलिस ने 25000 रुपये इनाम के चक्कर में उन्हें 166 दिन की जेल कराई है.
