‘मेरी बॉडी, मेरी मर्जी’, ट्रांस बिल को लेकर बवाल, लखनऊ की सड़कों पर LGBTQIA समुदाय

लखनऊ में प्रस्तावित 'ट्रांस बिल' के विरोध में ट्रांसजेंडर समुदाय सड़कों पर उतर आया है. समुदाय का कहना है कि यह विधेयक उनके आत्म-पहचान और अधिकारों को कमजोर करता है, 2019 के कानून का उल्लंघन है. प्रदर्शनकारियों ने बिल में संशोधन की मांग करते हुए उग्र आंदोलन की चेतावनी दी है.

लखनऊ में 'ट्रांस बिल' पर क्यों मचा है बवाल? Image Credit: PTI

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ट्रांसजेंडर बिल को लेकर विरोध तेज हो गया है, सोमवार को बड़ी संख्या में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए और सरकार के खिलाफ जमकर प्रदर्शन किया. ‘मेरी बॉडी, मेरी मर्जी’ के नारे, हाथों में बैनर और पोस्टर लेकर प्रदर्शनकारियों ने अपने अधिकारों की मांग उठाई. साथ ही उग्र आंदोलन की चेतावनी दी है.

प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि प्रस्तावित ट्रांसजेंडर पर्सन्स अमेंडमेंट बिल-2026 में उनकी वास्तविक समस्याओं और अधिकारों को नजरअंदाज किया गया है. आरोप लगाया कि बिना उनकी राय लिए ही कानून बनाया जा रहा है, जो उनके हित में नहीं है. इस बिल में मेडिकल जांच की बात कही गई है जो LGBTQIA समुदाय के निजता का सीधा हनन है.

बिल पर फिर से विचार करने की मांग, दी चेतावनी

लखनऊ में ट्रांसजेंडर बिल के ख़िलाफ़ जोरदार विरोध प्रदर्शन किया. इसमें सैकड़ो की संख्या में ट्रांसजेंडर और एलजीबीटी समुदायों के लोगो ने भाग लिया और केंद्र सरकार से बिल को वापस लेने की मांग उठाई. ट्रांसजेंडर समुदाय का कहना है कि उन्हें समान अधिकार, सम्मान और सुरक्षा चाहिए, सरकार को इस बिल पर पुनः विचार करने की आवश्यकता है.

प्रदर्शन के दौरान ट्रांसजेंडर समुदाय के नेताओं ने साफ तौर पर चेतावनी दी कि अगर उनकी मांगों पर जल्द ध्यान नहीं दिया गया और बिल में संशोधन नहीं किया गया, तो आंदोलन और उग्र रूप ले सकता है. उन्होंने कहा कि यह सिर्फ शुरुआत है, आगे बड़ा जनांदोलन खड़ा किया जाएगा. जब तक उनकी समुदाय की आवाज सुनी नहीं जाएगी, उनका संघर्ष जारी रहेगा.

ट्रांस बिल को लेकर बवाल क्यों, क्या नया है इसमें?

ट्रांसजेंडर पर्सन्स अमेंडमेंट बिल-2026 में LGBTQIA की पहचान को सीमित कर दी गई है. इसके मुताबिक, अब जो लोग अपनी यौन अभिवृत्ति या अपनी पहचान को खुद महसूस करते हैं, उन्हें ही ट्रांसजेंडर नहीं माना जाएगा. इसका मतलब है कि इस प्रस्तावित बिल में (जेंडर सेल्फ-आइडेंटिफिकेशन) खुद की जेंडर पहचान तय करने को मान्‍यता नहीं दी गई है.

प्रदर्शनकारियों का मानना है कि यह नया विधेयक उनकी स्व-पहचान के अधिकार को छीनकर राज्य के नियंत्रण में रखते हैं. उनका मानना है कि जेंडर भावना से तय होता है, न कि शारीरिक बनावट या मेडिकल रिपोर्ट से. यह बिल 2019 के कानून और सुप्रीम कोर्ट के नाल्सा (NALSA) फैसले के खिलाफ है, जिसमें उनको अपनी पहचान चुनने का अधिकार दिया गया था.

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