ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने पर अंतरिम रोक, HC का आदेश, अगली सुनवाई 13 जुलाई को
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं, जिसमें कार्यकाल समाप्त होने के बाद ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने की व्यवस्था की गई थी. अदालत ने माना कि यह कदम संविधान और पंचायती राज व्यवस्था की भावना के अनुरूप नहीं हो सकता और इस पर अंतरिम रोक लगा दी है. मामला अब 13 जुलाई को अगली सुनवाई में तय होगा.
उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों में कार्यकाल समाप्त होने के बाद मौजूदा ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने की व्यवस्था पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं और इसे संवैधानिक रूप से संदिग्ध माना है. अदालत ने इस व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगाते हुए अगली सुनवाई की तारीख 13 जुलाई तय की है. दरअसल, राज्य सरकार द्वारा ग्राम प्रधानों के कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्हें ही प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंपने के निर्णय को चुनौती दी गई थी.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट संकेत दिए कि ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने की प्रक्रिया संविधान की भावना और पंचायत राज व्यवस्था के मूल सिद्धांतों के अनुरूप नहीं प्रतीत होती. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि कार्यकाल समाप्त होने के बाद निर्वाचित प्रतिनिधियों को ही प्रशासनिक अधिकार देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करता है और यह पंचायती राज अधिनियम तथा संविधान के अनुच्छेद 243 की भावना के खिलाफ है.
सरकार के आदेश पर लगी अंतरिम रोक
अदालत ने इस दलील को गंभीरता से लेते हुए कहा कि पंचायतों में लोकतांत्रिक निरंतरता और समयबद्ध चुनाव व्यवस्था को कमजोर नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार द्वारा जारी उस व्यवस्था पर रोक लगा दी है, जिसके तहत ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में कार्य करने की अनुमति दी गई थी. अब जब तक अगली सुनवाई नहीं होती, तब तक यह व्यवस्था लागू नहीं रहेगी. अगली सुनवाई के लिए 13 जुलाई की तारीख तय की गई है.
क्या है पूरा विवाद?
13 जुलाई को अदालत यह तय करेगी कि क्या राज्य सरकार की यह व्यवस्था संवैधानिक रूप से सही है या नहीं. अगली सुनवाई में राज्य सरकार को अपने फैसले के पक्ष में ठोस संवैधानिक और प्रशासनिक आधार पेश करने होंगे. यह विवाद तब शुरू हुआ जब पंचायत चुनावों में देरी और प्रशासनिक आवश्यकताओं का हवाला देते हुए राज्य सरकार ने कार्यकाल समाप्त होने के बाद भी मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक बनाकर पंचायतों का काम चलाया जाएगा.
सरकार का तर्क था कि इससे प्रशासनिक रिक्तता नहीं होगी और विकास कार्य बाधित नहीं होंगे, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने इसे लोकतांत्रिक सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए चुनौती दी. उनका कहना है कि जब निर्वाचित कार्यकाल समाप्त हो जाता है, तो उसी व्यक्ति को पुनः प्रशासनिक शक्ति देना संविधान की मूल भावना के विपरीत है.
अखिलेश ने क्या कहा?
इस मामले में समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने ट्वीट करके कहा, ‘एक तरफ़ झूठी तारीफ़ के प्रायोजित कार्यक्रम करवाये जा रहे हैं तो उसी समय माननीय इलाहाबाद हाईकोर्ट की फटकार ने ये कहकर रंग मे भंग कर दिया कि कार्यकाल ख़त्म होने के बावजूद ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने का यूपी सरकार का फ़ैसला असंवैधानिक है. जनता पूछ रही है कि ‘असंवैधानिक’ काम करने की सज़ा क्या होती है?’
अखिलेश यादव आगे कहा, ‘अब यही ग्राम प्रधान भाजपाइयों को इसलिए गांवों में घुसने नहीं देंगे क्योंकि इस तरह के आदेश ने उनमें कुछ नये काम करने की उम्मीद जगाई थी, जिसका वादा वो जनता से कर चुके थे, अब जनता तो तकनीकी पक्ष समझती नहीं है कि क्या हुआ वो तो यही मानेगी कि प्रधान जी ने अपना वादा पूरा नहीं किया और सारा फ़ंड-बजट-पैसा डबल इंजन के साथ मिल बांटकर खा गये. प्रधानों में इस बात का भी डर है कि कहीं इन बीच के दिनों के ख़र्चे का ख़ामियाज़ा उनको अपनी जेब से न भरना पड़े. अगले चुनाव में भाजपा का धान, काटेंग प्रधान.’
