UP में जीत की हैट्रिक लगाने की जिम्मेदारी अब विनोद तावड़े के पास, क्यों हैं खास?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा ने चुनावी तैयारियों को तेज करते हुए महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े को यूपी का चुनाव प्रभारी बनाया है. उनके साथ जगदीश पटेल को सह-प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई है. 2024 लोकसभा चुनाव में यूपी में लगे झटके के बाद तावड़े के सामने भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता तक पहुंचाने की चुनौती होगी. हरियाणा, बिहार और केरल समेत कई राज्यों में संगठन और चुनावी प्रबंधन का अनुभव रखने वाले तावड़े अब यूपी में बूथ संगठन, सामाजिक समीकरण, टिकट चयन और चुनावी रणनीति को मजबूत करने पर काम करेंगे.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी हैं. पार्टी ने महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता और राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े को उत्तर प्रदेश का नया चुनाव प्रभारी बनाया है. अब यूपी में भाजपा को लगातार तीसरी बार सत्ता तक पहुंचाने की बड़ी जिम्मेदारी तावड़े के कंधों पर होगी. तावड़े के साथ जगदीश पटेल को यूपी का सह-प्रभारी बनाया गया है. भाजपा के लिए यह नियुक्ति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में पार्टी को बड़ा झटका लगा था. ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी परीक्षा होगी.
विनोद तावड़े की सबसे बड़ी ताकत उनका संगठनात्मक अनुभव माना जाता है. राष्ट्रीय राजनीति में आने बनने के बाद उन्हें नवंबर 2020 में हरियाणा का प्रभारी बनाया गया. सितंबर 2022 तक उन्होंने हरियाणा में संगठन की जिम्मेदारी संभाली. इसके बाद सितंबर 2022 से जुलाई 2024 तक वह बिहार के प्रभारी रहे. लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान उन्हें बिहार में पार्टी का विशेष चुनाव प्रभारी भी बनाया गया था. इस दौरान उन्होंने संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने और चुनावी रणनीति को लागू कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
इसके बाद जनवरी 2026 से उन्हें केरल की जिम्मेदारी दी गई. 2026 केरल विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी ने उन्हें मुख्य चुनाव प्रभारी बनाया. अब अगस्त 2026 में उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी मिलने के साथ तावड़े के सामने देश के सबसे बड़े राजनीतिक राज्य में भाजपा के चुनावी अभियान को संभालने की चुनौती है.
पांच राज्यों का अनुभव यूपी में आएगा काम
तावड़े का संगठनात्मक सफर देखें तो महाराष्ट्र, हरियाणा, बिहार और केरल के बाद अब यूपी उनके लिए पांचवा बड़ा चुनावी मैदान है. हरियाणा में उन्होंने संगठनात्मक जिम्मेदारी संभाली, बिहार में लोकसभा चुनाव की रणनीति पर काम किया और केरल जैसे राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण राज्य में चुनावी जिम्मेदारी संभाली. यूपी में उन्हें इन सभी अनुभवों को एक साथ इस्तेमाल करना होगा.
महाराष्ट्र सरकार में मंत्री से राष्ट्रीय संगठन तक
संगठन में बड़ी जिम्मेदारी संभालने से पहले विनोद तावड़े महाराष्ट्र सरकार में वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री रह चुके हैं. 2014 से 2019 के बीच उन्होंने कई महत्वपूर्ण विभाग संभाले. उनके पास स्कूल शिक्षा और उच्च तकनीकी शिक्षा, खेल एवं युवा कल्याण, सांस्कृतिक कार्य और मराठी भाषा विभाग जैसे मंत्रालयों की जिम्मेदारी रही. वह विधान परिषद में विपक्ष के नेता भी रहे हैं. यानी तावड़े के पास सरकार चलाने के साथ-साथ संगठन और चुनावी राजनीति का भी लंबा अनुभव है.
ABVP से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
विनोद तावड़े का राजनीतिक और संगठनात्मक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ. वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी ABVP के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं. इसके अलावा महाराष्ट्र भाजपा के प्रदेश संगठन में उन्होंने लंबे समय तक महामंत्री की जिम्मेदारी निभाई. मुंबई बीजेपी के अध्यक्ष रह चुके हैं. साथ ही महाराष्ट्र विधान परिषद में वह नेता प्रतिपक्ष की भूमिका भी निभा चुके हैं. यही संगठनात्मक पृष्ठभूमि उन्हें भाजपा के उन नेताओं में शामिल करती है जिन्हें चुनावी प्रबंधन और संगठन को साथ लेकर चलने का अनुभव है.
2024 के झटके के बाद बड़ी चुनौती
उत्तर प्रदेश में भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद बने राजनीतिक माहौल को बदलने की है. पार्टी को 2014 और 2019 के मुकाबले 2024 में यूपी में नुकसान हुआ. इसके बाद भाजपा ने संगठन और सामाजिक समीकरण दोनों स्तरों पर अपनी रणनीति में बदलाव शुरू किया है. हाल ही में पार्टी ने यूपी से राज्यसभा सांसद अमरपाल मौर्य को ओबीसी मोर्चे की कमान सौंपी है. ऐसे में तावड़े की नियुक्ति को संगठनात्मक रणनीति के साथ जोड़कर देखा जा रहा है.
OBC से लेकर बूथ संगठन तक बड़ी जिम्मेदारी
2027 के चुनाव में भाजपा के सामने सिर्फ सरकार विरोधी माहौल से निपटने की चुनौती नहीं होगी. उसे पिछड़े वर्ग, दलित, सवर्ण, महिला और युवा मतदाताओं के बीच अपना आधार मजबूत रखना होगा. समाजवादी पार्टी लगातार PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश कर रही है. ऐसे में भाजपा को अपने गैर-यादव ओबीसी आधार को बनाए रखने के साथ-साथ अन्य सामाजिक समूहों के बीच भी पकड़ मजबूत करनी होगी. तावड़े को प्रदेश संगठन के साथ मिलकर बूथ स्तर तक इस रणनीति को लागू करना होगा.
टिकट बंटवारे से लेकर स्थानीय समीकरण तक परीक्षा
उत्तर प्रदेश में 403 विधानसभा सीटें हैं और हर सीट का राजनीतिक-सामाजिक समीकरण अलग है. ऐसे में टिकट वितरण से लेकर उम्मीदवारों के चयन तक तावड़े की भूमिका अहम होगी. मौजूदा विधायकों का प्रदर्शन, स्थानीय संगठन की स्थिति, जातीय समीकरण और जीत की संभावनाओं के आधार पर उम्मीदवारों का चयन भाजपा के लिए बड़ा फैसला होगा. इसके साथ ही पार्टी के भीतर नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल बनाए रखना भी प्रभारी के सामने बड़ी चुनौती होगी. विनोद तावड़े के पास संगठन, सरकार और चुनावी प्रबंधन यानी तीनों का अनुभव है.
लंबे समय से सक्रिय नहीं थे राधा मोहन सिंह
अब तक राधा मोहन सिंह उत्तर प्रदेश के प्रभारी की जिम्मेदारी संभाल रहे थे, लेकिन पिछले काफी समय से उनकी सक्रियता यूपी में कम हो गई थी. संगठन से जुड़े कार्यक्रमों और बैठकों में उनकी मौजूदगी भी लगातार कम होती गई. इसी बीच प्रदेश में सरकार और संगठन के बीच कई मुद्दों को लेकर मतभेद सामने आए. इसके बाद केंद्रीय नेतृत्व ने विनोद तावड़े को यूपी भेजकर सरकार और संगठन के नेताओं के साथ बैठकें कराईं. तावड़े ने संगठन से जुड़े कई अहम मुद्दों पर नेताओं के साथ मंथन किया और यूपी बीजेपी के संगठनात्मक चुनाव की प्रक्रिया में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
सरकार-संगठन के बीच समन्वय की जिम्मेदारी
राधा मोहन सिंह के बाद उत्तर प्रदेश में सरकार, संगठन और संघ के बीच होने वाली बैठकों में भी तावड़े की सक्रियता देखने को मिली. ऐसे में अब उन्हें औपचारिक तौर पर प्रदेश प्रभारी की जिम्मेदारी दिए जाने को पार्टी की आगामी चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. बीजेपी के सामने यूपी में संगठन को मजबूत करने के साथ-साथ सरकार और संगठन के बीच बेहतर समन्वय बनाए रखने की चुनौती है. नए प्रभारी के सामने पार्टी के भीतर सभी खेमों को साथ लेकर चलने और चुनावी तैयारियों को गति देने की बड़ी जिम्मेदारी होगी.
