संपत्ति की मालकिन बनी महिलाएं लेकिन स्वास्थ्य की नहीं; चौंकाने वाली है ये रिपोर्ट

राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) की रिपोर्ट दर्शाती है कि उत्तर प्रदेश में महिलाओं के पास पारिवारिक संपत्ति का मालिकाना हक बढ़ा है, जो 20% से अधिक हो गया है. सरकारी योजनाओं और स्टांप ड्यूटी में छूट इसका प्रमुख कारण है. हालांकि, स्वास्थ्य संबंधी निर्णय लेने, बड़े खर्चों या रिश्तेदारों से मिलने के लिए उन्हें आज भी घर के पुरुषों की राय पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे उनकी स्वायत्तता पर प्रश्नचिह्न लगता है.

सांकेतिक तस्वीर, श्रोत META AI

उत्तर प्रदेश की महिलाओं के लिए एक अच्छी खबर है. बीते कुछ वर्षों में पारिवारिक संपत्तियों में उन्हें मालिकाना हक तेजी से मिला है. वह अपनी संपत्तियों की मालकिन बनी है. लेकिन एक बुरी खबर यह है कि आज भी उन्हें अपने स्वास्थ्य के लिए घर के पुरुषों की ही राय पर निर्भर रहना पड़ रहा है. यही नहीं, वह घर के पुरुषों की राय के बिना ना तो अपनी रिश्तेदारियों में जा सकती है और ना ही घर में किसी बड़े खर्च को लेकर कोई फैसला ले सकती हैं. यह खुलासा राष्ट्रीय परिवार एवं स्वास्थ्य सर्वेक्षण के छठें संस्करण की हालिया रिपोर्ट में हुआ है.
इस रिपोर्ट में दिए आंकड़ों के मुताबिक बीते दो साल में ही महिलाओं के मालिकाना हक में आठ फीसदी से अधिक की बढोत्तरी हुई है. पहले उत्तर प्रदेश की 12 फीसदी महिलाओं के पास ही प्रापर्टी का मालिकाना हक था, लेकिन अब यह आंकड़ा 20 फीसदी को पार कर गया है. इस हिसाब से प्रदेश में हर पांचवीं महिला अपने परिवार की संपत्ति की मालकिन है. ज्यादातर मामलों में यह मालिकाना हक एकल है. हालांकि बड़ी संख्या में संपत्तियों के मालिकाना हक में वह घर के पुरुषों के साथ भागीदार हैं.
ये है बड़ा कारण
जानकारों के मुताबिक महिलाओं को मालकिन बनाने की पीछे भी बड़ी वजह है. दरअसल उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से विभिन्न योजनाओं और स्टांप ड्यूटी में बड़ी छूट मिल रही है. इसकी वजह से बीते कुछ वर्षों में जो भी बैनामे हुए हैं, वह महिलाओं के नाम ही कराए गए हैं. इससे कागजों में ही सही, लेकिन महिलाएं अपनी संपत्तियों की मालकिन बनी है. शायद यही वजह है कि उत्तर प्रदेश में महिलाओं के मालिकान हक का औसत देश के औसत से भी ज्यादा हो गया है.
इन मामलों में क्यों हैं कमजोर?
इस रिपोर्ट के मुताबिक आज भी उत्तर प्रदेश की महिलाएं अपने स्वास्थ्य को लेकर आत्मनिर्भर नहीं हैं. यही नहीं, वह घर में होने वाले किसी बड़े खर्च को लेकर भी पुरुषों की राय पर निर्भर रहना पड़ता है. रिपोर्ट में कहा गया कि आज भी उत्तर प्रदेश की महिलाएं अपनी मर्जी से रिश्तेदारियों में भी नहीं जा सकती. इन तीनों श्रेणी में उनके लिए फैसले आमतौर पर घर के पुरुष ही लेते हैं.
ये हैं आंकड़े
इन आंकड़ों के मुताबिक दो साल पहले देश में महिलाओं के नाम पर जमीन या मकान का स्वामित्व 14 प्रतिशत था. यह अब बढ़कर 18.8 प्रतिशत हो गया है. हालांकि यूपी में दो साल पहले स्वामित्व महज 12 फीसदी था, जो अब बढ़कर 20.1 फीसदी के पार हो गया है.ये आंकड़ों साल 2021 से 2024 के बीच के हैं. इसमें एक और खास बात यह है कि स्वामित्व के मामले में देश में ग्रामीण और उत्तर प्रदेश में शहरी महिलाएं आगे हैं.

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