महंगी गैस ने तोड़ी कमर, दिहाड़ी मजदूरों पर गहराया संकट; काम छोड़ पलायन को मजबूर
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में रहने वाले अधिकांश दिहाड़ी मजदूर दूसरे राज्यों से आते हैं. अब ये गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों और किल्लत के कारण पलायन को मजबूर हैं. उन्हें काम छोड़कर अपने घरों को लौटना पड़ रहा है. इसका सीधा असर निर्माण कार्यों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है.
अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्द में LPG और ईंधन की आपुर्ती श्रंखला बाधित हो रही है. भारत में इसका असर सबसे ज्यादा LPG के कॉमर्शियल गैस सिलेंडर पर हो रहा है. इसकी बढ़ती कीमतों और किल्लत के कारण अब नोएडा-ग्रेटर नोएडा जैसे शहरों में दिहाड़ी मजदूर पलायन को मजबूर है, उन्हें काम छोड़कर अपने घरों को लौटना पड़ रहा है.
गैस संकट और बढ़ती महंगाई ने मजदूरों को शहर छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया है. कई मजदूर पहले ही अपने गांव लौट चुके हैं जबकि कई जाने की तैयारी में है. दिहाड़ी मजदूरों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है. इसका सीधा असर निर्माण कार्यों और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. उन्हें प्रशासन से इस संकट के समाधान की उम्मीद है.
400-500 रुपए KG गैस, परेशानी का कारण
नोएडा और ग्रेटर नोएडा में अधिकांश दिहाड़ी मजदूर बिहार बंगाल झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों से आते हैं. यह लोग किराए के छोटे-छोटे कमरों में रहते हैं और उनके पास एलपीजी का आधिकारिक कनेक्शन नहीं होता. ऐसे में यह मजदूर खुले बाजार से छोटे सिलेंडर में गैस भरवाकर अपना काम चलाते हैं, जो उनके रसोई का सहारा होती है.
लेकिन अब यही व्यवस्था उनके लिए परेशानी का कारण बन गई है. ग्रेटर नोएडा में रहने वाले मजदूर अंकित ने बताया कि पहले उन्हें गैस 200 रुपये प्रति किलो तक मिल जाती थी जिससे वह किसी तरह अपने गुजारा कर लेते थे. लेकिन अब वही गैस 400 से 500 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गई है, जिस रोज सिलेंडर भरवाना अब महंगा पड़ रहा है.
एक दिन की पूरी मजदूरी गैस भरवाने में जाएगी
दूसरे मजदूर नूरे आलम जो कि पिछले 20 वर्षों से रहकर पेंट मजदूरी का काम करते हैं. उनका कहना है कि एक मजदूर की रोजाना की कमाई करीब 400 से 600 के बीच होती है. अब ऐसे में हर तरफ गैस सिलेंडर और गैस की भारी किल्लत देखने को मिल रही है अगर एक दिन की पूरी मजदूरी गैस भरवाने में ही खर्च हो जाएगी तो बाकी खर्च कैसे पूरे होंगे?
उनका कहना है कि प्रतिदिन खाना अगर हम बाजार से खाते हैं तो उसका खर्चा 200 रुपये से लेकर 300 रुपये तक आ रहा है, जिससे अब जीवन यापन करना मुश्किल हो गया है. अब अपने घर बिहार जाने को मजबूर हैं. दिहाड़ी मजदूर अधिकतक छोटे सिलेंडर रखते हैं, जिसे हर दो दिन दिन में भरवानी पड़ती है, रोजाना का खर्च अब उनके लिए अहसान्य हो गया है.
शहर के इन इलाकों में पलायन का असर दिखा
मजदूरों का कहना है कि गांव में काम से कम भोजन की समस्या नहीं होती जबकि शहर में कमाई के बावजूद दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. इस पलायन का असर अब साफ तौर पर प्रमुख लेबर चौक, सेक्टर 62, हरौला, भंगेल, सूरजपुर, हल्द्वानी मोड़, दादरी, सिरसा, डेल्टा वन, गोल चक्कर, कासना और दनकौर पर दिखने भी लगा है.
इन जगहों पर जहां सुबह होते ही सैकड़ो मजदूर काम की तलाश में खड़े हो जाते थे अब वहां मजदूरों की संख्या लगातार घटती जा रही है. पहले जहां ठेकेदारों को मजदूर चुनने में समय लगता था अब स्थिति उलट गई है. कई जगहों पर ठेकेदारों को पर्याप्त मजदूर नहीं मिल पा रहे हैं जिस काम भी प्रभावित हो रहा है. इस बदलती तस्वीर ने शहर की चिंता बढ़ा दी है.
निर्माण कार्य में बाधा, प्रशासन आखरी उम्मीद
मजदूरों की कमी का असर अब निर्माण कार्य और छोटे-बड़े प्रोजेक्ट पर भी दिखने लगा है. ठेकेदारों और मजदूरों का कहना है कि अगर जल्द ही गैस की कीमतों और आपूर्ति पर नियंत्रण नहीं किया गया तो यह संकट और गहरा हो सकता है. अगर स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो मजदूर का पलायन और तेज होगा जिससे शहर के विकास कार्यों के रफ्तार पर भी असर पड़ेगा.
गौतम बुध नगर में अब आखरी उम्मीद जिला प्रशासन पर टिकी हुई है. जिन लोगों के पास एलपीजी गैस कनेक्शन नहीं है उनके लिए प्रशासन की तरफ से अस्थाई समाधान की जरूरत है. जिला आपूर्ति अधिकारी स्मृति गौतम ने बताया कि इसके संबंध में अभी कोई जानकारी नहीं है, इनको किस तरह से गैस की आपूर्ति दी जाएगी इसको लेकर विचार किया जाएगा.
