नोएडा से 10 मिनट में दिल्ली, लेकिन गाजियाबाद जाने के लिए 2 घंटे खाने पड़ते हैं धक्के; रोज जूझते हैं 80 हजार लोग

नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद के बीच सार्वजनिक परिवहन की कमी से 80 हजार से अधिक लोग प्रतिदिन संघर्ष करते हैं. जहां नोएडा से दिल्ली 10 मिनट में पहुंचा जा सकता है, वहीं गाजियाबाद जाने में 2 घंटे धक्के खाने पड़ते हैं. हैदराबाद की तर्ज पर इन शहरों के लिए एक एकीकृत परिवहन प्रणाली (कॉमन मोबिलिटी प्लान) की सख्त आवश्यकता है.

नोएडा से गाजियाबाद जाने के लिए खाने पड़ते हैं धक्के

देश में हैदराबाद और सिकंदराबाद की पहचान ट्विन सिटी के रूप में है. यहां रहने वाले ज्यादातर लोग रोजी-नौकरी के लिए एक दूसरे शहरों में आते जाते हैं. इन दोनों शहरों का ट्रांसपोर्ट मॉडल भी इस प्रकार तैयार किया गया है कि लोगों को परेशान ना होना पड़े. लेकिन उत्तर प्रदेश को सबसे ज्यादा राजस्व देने वाले ट्राई सिटी नोएडा-ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद के लिए कोई ट्रांसपोर्ट मॉडल ही नहीं है. नोएडा से दिल्ली जाना हो तो मेट्रो से 10 मिनट में जा सकते हैं, लेकिन ग्रेटर नोएडा या गाजियाबाद जाना हो तो कम से कम दो घंटे तो धक्के खाने ही होंगे.

एक अनुमान के मुताबिक नोएडा की कंपनियों में काम करने वाले करीब दो लाख से अधिक लोग गाजियाबाद में रहते हैं. इनमें से ज्यादातर लोग अपने खुद के वाहनों से आवागमन करते हैं. इसकी वजह से सड़कों पर भारी जाम की स्थिति बनती है. वहीं करीब 80 हजार से अधिक लोग ऐसे भी हैं, जिनके पास खुद के वाहन नहीं हैं और वह आम तौर पर बसों या ऑटो टैंपू में धक्का खाते हुए रोजी रोटी के लिए भाग दौड़ करते हैं.

तीनों शहरों में नहीं हैं कॉमन ट्रांसपोर्ट सिस्टम

जानकारी के मुताबिक नोएडा की बसावट 80 के दशक में हुई थी. उस समय प्लानिंग इसे देश का अत्याधुनिक शहर बनाना था. जहां विश्वस्तरीय ट्रांसपोर्ट सिस्टम से लेकर बाकी सुविधाएं दी जानी थी. कभी यह शहर गाजियाबाद जिले का हिस्सा था और आम तौर पर यहां तमाम औद्योगिक यूनिटों में काम करने वाले लोग गाजियाबाद में ही रहते थे. कमोबेस यही स्थिति आज भी है. इसी प्रकार बाद में ग्रेटर नोएडा भी विकसित हुआ, लेकिन इन तीनों शहरों के लिए कॉमन ट्रांसपोर्ट सिस्टम को लेकर कभी चर्चा तक नहीं हुई.

अभी क्या है स्थिति?

गाजियाबाद में अभी दो मेट्रो लाइन है. इसमें एक दिल्ली के द्वारका से चलकर वैशाली तक आती है तो दूसरी लाइन दिल्ली के वेलकम से गाजियाबाद के नए बस अड्डे तक आती है. इनमें से कोई भी लाइन नोएडा को टच नहीं करती. ऐसे में गाजियाबाद से नोएडा आकर नौकरी करने वालों के लिए यह दोनों मेट्रो लाइन किसी काम की नहीं. अभी मेरठ से सराय काले खां के लिए चलने वाली नमो भारत की भी नोएडा से कनेक्टिविटी नहीं दी गई है. इसी प्रकार गाजियाबाद से नोएडा के लिए कोई सीधी बस सेवा भी नहीं है. जो नोएडा से मेरठ के लिए बसें चलती भी हैं तो बाहर ही बाहर निकल जाती हैं.

ग्रेटर नोएडा आने जाने के भी नहीं हैं साधन

नोएडा में स्थापित कंपनियों में काम करने वाले लोग गाजियाबाद के अलावा ग्रेटर नोएडा में भी रहते हैं. इन लोगों के लिए न तो नोएडा जाने के लिए कोई ठोस इंतजाम है और ना ही गाजियाबाद आने जाने के लिए ही कोई साधन. ऐसी स्थिति में नोएडा गाजियाबाद में रहने वालों को आवागमन के लिए अपने साधन रखना मजबूरी है. जिनके पास अपने साधन नहीं हैं, उन्हें ऑटो-टैंपू में धक्का खाने ही पड़ते हैं. इसका परिणाम यहां प्रदूषण के रूप में सामने आ रहा है.

हैदराबाद जैसे ट्रांसपोर्ट सिस्टम की दरकार

नोएडा-गाजियाबाद और ग्रेटर नोएडा में रहने वाले लोग यहां भी हैदराबाद की तर्ज पर कॉमन मोबिलिटी प्लान की मांग करते रहे हैं. स्थानीय लोगों के मुताबिक इन तीनों शहरों के लिए ऐसा ट्रांसपोर्ट सिस्टम होना चाहिए, जिससे यहां रहने वाले लोग बिना सड़कों पर धक्के खाए अपने गंतव्य पर सही सलामत पहुंच सकें. यह व्यवस्था मेट्रो नेटवर्क के विस्तार और बसों के नेटवर्क को बढ़ा हो सकती है.