नोएडा DM को राहत, लेकिन HC के पूरे फैसले पर रोक नहीं… SC ने किया साफ

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा छात्रा आकृति चौधरी के खिलाफ NSA रद्द करने का आदेश बरकरार है. अदालत ने केवल DM मेधा रूपम को 5 लाख रुपये के मुआवजे और उनके खिलाफ टिप्पणियों वाले हिस्सों पर रोक लगाई है.

सुप्रीम कोर्ट Image Credit:

सुप्रीम कोर्ट ने गौतमबुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम को राहत देने के आदेश में गुरूवार को स्पष्ट किया कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूरे आदेश पर रोक नहीं लगाई गई है. रोक सिर्फ हाईकोर्ट के उन हिस्सों पर है जिसमें डीएम को छात्रा आकृति को 5 लाख रुपये का मुआवाजा देने को कहा गया था और उनके खिलाफ कदम उठाने समेत टिप्पणियां की गई थीं. जबकि छात्रा पर तामील एनएसए को रद्द करने के आदेश पर रोक नहीं लगाई गई है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 सिंतबर को नोएडा में मज़दूरों के विरोध-प्रदर्शन के सिलसिले में एनएसए के तहत हिरासत में ली गई छात्रा के खिलाफ कार्रवाई को रद्द किया था. साथ ही डीएम को छात्रा को 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया था. सर्वोच्च अदालत ने बुधवार को इस मसले पर आदेश दिया था जिसमें हाईकोर्ट के पैरा 27 से 33 पर रोक लगा दी थी.

इस वजह से SC ने अपने आदेश को किया साफ

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पैरा 27 से 33 में ही डीएम के खिलाफ टिप्पणियों करते हुए कदम उठाने का आदेश दिया था. छात्रा के खिलाफ एनएसए रद्द करने के आदेश का जिक्र पैरा 25 में हाईकोर्ट था जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक नहीं लगाई थी. लेकिन बड़े पैमाने पर यह खबर सार्वजनिक हुई कि देश की सबसे बड़ी अदालत ने पूरे फैसले पर रोक लगा दी.

यही वजह है कि सर्वोच्च अदालत ने गुरूवार यानी आज अपने आदेश में छोटा सा बदलाव कर यह स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के पूरे फैसले पर रोक नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले में नोटिस जारी कर दिया है और अगली सुनवाई 7 अक्टूबर 2026 को तय की है.

मामले में दो याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल

गौरतलब है कि इस मामले में दो याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थीं. एक डीएम मेधा रूपम की ओर से और दूसरी यूपी सरकार की ओर से, डीएम ने अपने खिलाफ आदेश पर रोक की मांग की थी जिस पर सर्वोच्च अदालत ने उन्हें राहत दी. लेकिन यूपी सरकार की ओर से पूरे फैसले पर रोक लगाने की मांग पर आदेश नहीं दिया.

डीएम मेधा रूपम और यूपी सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी को हिरासत में लेने की प्रक्रिया एक बहु-स्तरीय प्रशासनिक प्रक्रिया होती है, जिसमें ऊपर से नीचे तक कई अधिकारी शामिल होते हैं. इसलिए इस फैसले के लिए केवल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (DM) को अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता.

रिपोर्ट- पीयूष पांडेय, टीवी9 भारतवर्ष

Follow Us