मनमाने तरीके से नहीं हो सकता संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल, राज्यपाल के इस पॉवर पर HC की सख्त टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्यपाल की संवैधानिक शक्तियों के मनमाने इस्तेमाल पर कड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 161 के तहत कैदियों की समय से पहले रिहाई की शक्ति का प्रयोग सरकार की नीतियों और लागू नियमों के अनुरूप ही होना चाहिए, मनमाने ढंग से नहीं. इस निर्णय ने राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को स्पष्ट किया है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्यपाल को संविधान में मिली विशेष शक्तियों को लेकर गंभीर टिप्पणी की है. हाईकोर्ट ने कहा कि इन शक्तियों का इस्तेमाल मनमाने तरीके से नहीं हो सकता. हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी समय से पहले कैदियों की रिहाई से संबंधित एक मामले की सुनवाई करते हुए की है. कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत राज्यपाल को समय से पहले रिहाई देने की शक्ति जरूर प्राप्त है, लेकिन यह संवैधानिक शक्ति है और इसका इस्तेमाल मनमाने तरीके से नहीं किया जा सकता.

हाईकोर्ट ने कहा कि यह शक्ति लागू नियमों और सरकार की रेमिशन यानी सजा में छूट की नीति के अनुरूप ही इस्तेमाल होनी चाहिए. यह टिप्पणी जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की बेंच ने की है. इस बेंच में फतेहपुर के राम प्रताप सिंह की याचिका पर सुनवाई हो रही थी. जानकारी के मुताबिक राम प्रताप सिंह को वर्ष 2002 में फतेहपुर के एडिशनल सेशन जज ने हत्या के प्रयास के मामले में IPC की धारा 307/34 के तहत दोषी ठहराया था.

7 साल की हुई थी सजा

सेशल कोर्ट ने राम प्रताप सिंह को इस मामले में सात साल के कठोर कारावास और दो हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी. इस सजा के खिलाफ राम प्रताप सिंह ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की, लेकिन यह अपील 2019 में खारिज हो गई. इसके बाद वह सुप्रीम कोर्ट गए, लेकिन राहत वहां से भी नहीं मिली थी. इसी दौरान सितंबर 2022 में राम प्रताप सिंह की समय से पहले रिहाई का प्रस्ताव जेल अधिकारियों और फतेहपुर के जिलाधिकारी के पास पहुंच गया.

हाईकोर्ट ने गलत ठहराया सरकारी आदेश

जेल रिकॉर्ड के मुताबिक उन्होंने बिना छूट के चार साल छह महीने और छह दिन की सजा काट ली थी, जबकि छूट को जोड़ने पर उनकी जेल अवधि पांच साल चार महीने हो चुकी थी. जेल में उनका आचरण भी संतोषजनक दर्ज किया गया था. इसी दौरान जून 2025 में उनकी समय से पहले रिहाई की अर्जी खारिज कर दी गई. इस फैसले में उनकी जेल में बिताई गई अवधि महज दो साल छह दिन बताई गई थी. हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच के बाद इसे गंभीर और स्पष्ट गलती माना है.

दोबारा फैसला करे सरकार

कोर्ट ने कहा कि यूपी कैदी प्रोबेशन पर रिहाई नियम, 1938 के तहत संबंधित श्रेणी का कैदी बिना छूट के अपनी सजा का एक-तिहाई हिस्सा पूरा करने के बाद समय से पहले रिहाई के लिए पात्र हो सकता है. राम प्रताप सिंह सात साल की सजा में से बिना छूट के ही चार साल छह महीने से ज्यादा जेल में रह चुके थे. हाईकोर्ट ने समय से पहले रिहाई से इनकार करने वाले 26 जून 2025 के आदेश को रद्द कर दिया. साथ ही सरकार को मामले पर नए सिरे से फैसला लेने का निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के आदेश की प्रति मिलने के एक महीने के भीतर याचिकाकर्ता की समय से पहले रिहाई की अर्जी पर दोबारा निर्णय लिया जाए.

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