इस्लाम कबूल करना बालिग का अधिकार; HC ने दो बहनों को दी राहत, 25 लाख मुआवजा भी मिलेगा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आगरा की दो सगी बहनों की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि बालिग व्यक्ति को अपनी आस्था, धर्म और जीवन से जुड़े फैसले लेने की संवैधानिक स्वतंत्रता है. कोर्ट ने माना कि माता-पिता की असहमति के आधार पर बालिग महिलाओं को उनकी इच्छा के खिलाफ घर में रखना गैरकानूनी हिरासत है. दोनों बहनों ने अदालत में कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम अपनाया और उन पर कोई दबाव नहीं था. हाईकोर्ट ने दोनों को स्वतंत्र जीवन जीने की अनुमति देते हुए पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को संयुक्त रूप से 25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने धर्म परिवर्तन और बालिग व्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता से जुड़े एक अहम मामले में कहा है कि किसी बालिग व्यक्ति को अपनी आस्था चुनने और अपने जीवन से जुड़े फैसले लेने का अधिकार है. अदालत ने कहा कि यदि कोई बालिग महिला अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन करती है तो केवल माता-पिता की असहमति के आधार पर उसकी स्वतंत्रता पर रोक नहीं लगाई जा सकती.
हाईकोर्ट ने आगरा की दो सगी बहनों की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनवाई करते हुए माना कि दोनों बालिग महिलाओं को उनके पिता ने उनकी इच्छा के विरुद्ध घर में रखा था. अदालत ने इसे गैरकानूनी हिरासत माना. कोर्ट ने दोनों बहनों को उनकी इच्छा के मुताबिक स्वतंत्र जीवन जीने की अनुमति देते हुए पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को मिलकर 25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया. मामले की सुनवाई जस्टिस संदीप जैन की पीठ ने की. याचिका आगरा की दीया भाटिया उर्फ जोया दीया भाटिया और अंशु भाटिया उर्फ अमीना अंशु भाटिया की ओर से दाखिल की गई थी.
कोर्ट ने कहा- बालिग को अपनी आस्था चुनने की पूरी आजादी
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि बालिग व्यक्ति को अपनी आस्था, विश्वास और जीवन से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता है। यह स्वतंत्रता संविधान से मिले मौलिक अधिकारों का हिस्सा है. कोर्ट ने कहा कि बालिग होने के बाद किसी व्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता और उसकी अपनी पसंद को माता-पिता की इच्छा से ऊपर रखा जाना चाहिए. माता-पिता केवल इसलिए अपने बालिग बच्चों को उनकी इच्छा के खिलाफ घर में नहीं रख सकते क्योंकि वे बच्चे के धर्म, विश्वास या निजी पसंद से सहमत नहीं हैं.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सामाजिक दबाव या माता-पिता की असहमति किसी बालिग व्यक्ति के संवैधानिक अधिकारों को खत्म नहीं कर सकती.
दोनों बहनों ने कहा- अपनी इच्छा से अपनाया इस्लाम
अदालत के सामने दोनों बहनों ने कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया है. उनका कहना था कि धर्म परिवर्तन का फैसला उन्होंने अपनी आस्था, अंतरात्मा, मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतुष्टि के लिए लिया. बड़ी बहन अंशु ने 2020 में जबकि छोटी बहन दीया ने 2021 में इस्लाम अपनाने की बात कही. दोनों ने अदालत में यह भी कहा कि धर्म परिवर्तन के दौरान उन पर किसी तरह का दबाव नहीं बनाया गया. न उन्हें डराया गया और न ही किसी तरह का धोखा या लालच दिया गया.
कोर्ट ने दोनों बहनों से की बातचीत
उनका आरोप था कि पिता उनके धर्म परिवर्तन के फैसले से नाराज थे और इसी कारण उन्हें उनकी इच्छा के खिलाफ पैतृक घर में रहने के लिए मजबूर किया गया. सुनवाई के दौरान अदालत ने दोनों बहनों से बातचीत भी की. कोर्ट ने कहा कि बातचीत और उपलब्ध सामग्री से ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया, जिससे यह माना जाए कि दोनों ने दबाव, डर या लालच में धर्म परिवर्तन किया था. अदालत ने दोनों को बालिग माना और कहा कि उन्हें अपने जीवन के संबंध में स्वतंत्र निर्णय लेने का संवैधानिक अधिकार है. कोर्ट ने यह भी माना कि धर्म परिवर्तन से जुड़ी जांच और किसी बालिग व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता दो अलग-अलग मुद्दे हैं.
सरकार ने कहा- बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है धर्म परिवर्तन
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अलग पक्ष रखा गया. सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि धर्म परिवर्तन किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है. सरकार की ओर से यह आशंका भी जताई गई कि इससे देश की संप्रभुता, अखंडता और एकता पर असर पड़ सकता है. सरकार ने यह भी तर्क दिया कि दोनों महिलाओं को रिहा करने से मामले की जांच प्रभावित हो सकती है.
इस पर अदालत ने कहा कि यदि धर्म परिवर्तन तय कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप नहीं हुआ है तो भी किसी पिता को अपनी बालिग बेटियों को उनकी इच्छा के खिलाफ हिरासत में रखने का अधिकार नहीं मिल जाता. कोर्ट ने साफ किया कि धर्म परिवर्तन की वैधता की जांच अलग विषय है और किसी बालिग महिला को उसकी इच्छा के विरुद्ध हिरासत में रखना अलग मुद्दा है. अदालत ने कहा कि केवल आशंका के आधार पर किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकार नहीं छीने जा सकते.
FIR की जांच जारी रहेगी
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अदालत के आदेश का मतलब यह नहीं है कि धर्म परिवर्तन से जुड़े मामले की जांच रोक दी जाएगी. कोर्ट ने कहा कि संबंधित FIR की जांच कानून के अनुसार जारी रह सकती है. अदालत की ओर से दोनों महिलाओं की स्वतंत्रता को लेकर की गई टिप्पणियों का जांच की प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा. इस तरह अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और आपराधिक जांच के बीच अंतर को स्पष्ट किया.
24 मार्च 2025 को घर से निकली थीं दोनों बहनें
पूरा मामला आगरा के सदर थाना क्षेत्र का है. दोनों सगी बहनें 24 मार्च 2025 को घर से चली गई थीं. उनके पिता ने पुलिस में दोनों के लापता होने की शिकायत दर्ज कराई थी. पिता के मुताबिक, बड़ी बेटी ने डीईआई से पढ़ाई की है और वह एमफिल है. पिता ने पुलिस को यह भी बताया था कि बड़ी बेटी इससे पहले 2021 में भी घर से चली गई थी. पिता ने आरोप लगाया था कि उसकी दोस्ती जम्मू-कश्मीर के उधमपुर की रहने वाली साइमा उर्फ खुशबू से थी.
पिता का दावा था कि साइमा ने उनकी बेटी का ‘ब्रेनवॉश’ किया. काफी समझाने के बाद बड़ी बेटी घर वापस आई थी. इसके बाद पिता ने आरोप लगाया कि उसने छोटी बहन को भी प्रभावित किया और बाद में दोनों बहनें घर से चली गईं.
41 दिन बाद दर्ज हुआ अपहरण का मुकदमा
दोनों बहनों के घर से जाने के करीब 41 दिन बाद, 4 मई 2025 को पुलिस ने अपहरण का मुकदमा दर्ज किया. इस मामले में साइमा उर्फ खुशबू को नामजद किया गया था. पुलिस ने दोनों बहनों की तलाश शुरू की और मामले की जांच आगे बढ़ाई. जांच के दौरान पुलिस को दोनों बहनों के धर्म परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों में शामिल होने की जानकारी मिलने का दावा किया गया. पुलिस ने मामले की तुलना फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ में दिखाए गए घटनाक्रम से भी की थी. इसके बाद जांच साइबर क्राइम पुलिस को सौंप दी गई.
डीजीपी ने लिया संज्ञान, सात टीमें लगाई गईं
मामले का संज्ञान तत्कालीन डीजीपी ने भी लिया था. आगरा पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार ने खुद जांच की निगरानी शुरू की. मामले की जांच के लिए एडीसीपी सिटी आदित्य के नेतृत्व में सात टीमें गठित की गई थीं. पुलिस टीमों ने अलग-अलग स्थानों पर दबिश दी और दोनों बहनों की तलाश शुरू की. जांच के दौरान पुलिस की एक टीम कोलकाता के बैरकपुर पहुंची. वहां दोनों बहनों के बारे में जानकारी जुटाई गई और बाद में उन्हें बरामद कर लिया गया.
1300 किलोमीटर दूर कोलकाता में मिली थीं दोनों
दोनों बहनें आगरा से करीब 1300 किलोमीटर दूर कोलकाता में मिली थीं. पुलिस ने उन्हें वहां से बरामद किया और वापस आगरा लेकर आई. इसके बाद मामला अदालत तक पहुंचा. दोनों बहनों की ओर से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई और अदालत के सामने उनकी स्वतंत्रता का सवाल उठाया गया. हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान दोनों बहनों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन किया है और उन्हें किसी तरह के दबाव में नहीं रखा गया था.
धर्मांतरण मामले में दिल्ली से हुई थी गिरफ्तारी
मामले की जांच के दौरान पुलिस ने धर्म परिवर्तन से जुड़े आरोपों की भी पड़ताल की. इसी क्रम में अब्दुल रहमान कुरैशी को दिल्ली से गिरफ्तार किए जाने की बात सामने आई थी. पुलिस ने इस मामले में कुल 10 लोगों की गिरफ्तारी की थी. हालांकि, हाईकोर्ट के सामने मुख्य सवाल दोनों बालिग बहनों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उनकी कथित हिरासत से जुड़ा था.
25 लाख मुआवजे का आदेश
अदालत ने दोनों महिलाओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध घर में रखे जाने को गैरकानूनी हिरासत माना और इसी आधार पर पिता और उत्तर प्रदेश सरकार को 25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया.
