‘बिजनेस का अड्डा बन गए थाने’, HC की सख्त टिप्पणी, DGP से 10 दिन में रिपोर्ट तलब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के पुलिसकर्मियों के कारोबार में शामिल होने के मामलों पर सख्त टिप्पणी की है. बलिया के रसड़ा थाने से जुड़े मामले की सुनवाई में कोर्ट ने कहा कि कई थाने अब कानून-व्यवस्था के बजाय व्यावसायिक गतिविधियों के केंद्र बनते जा रहे हैं. कोर्ट ने डीजीपी और अपर मुख्य सचिव (गृह) को पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए हैं.

हाई कोर्ट ( फाइल फोटो) Image Credit:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग में कथित भ्रष्टाचार और पुलिसकर्मियों के व्यावसायिक गतिविधियों में शामिल होने के मामलों पर कड़ी नाराजगी जताई है. कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रदेश के कई पुलिस थाने अब कानून-व्यवस्था बनाए रखने के केंद्र नहीं रह गए हैं, बल्कि वे व्यावसायिक गतिविधियों के संचालन का स्थान बनते जा रहे हैं. यह टिप्पणी उस वक्त आई, जब हाई कोर्ट में बलिया से जुड़े एक मामले की सुनवाई चल रही थी.

अदालत ने इस पूरे मामले को गंभीर मानते हुए पुलिस महानिदेशक (DGP) और अपर मुख्य सचिव (गृह) को जांच कर दोषी पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं. हाईकोर्ट ने डीजीपी को आदेश दिया है कि जांच पूरी कर 10 दिनों के भीतर की गई कार्रवाई का विस्तृत हलफनामा अदालत में दाखिल किया जाए. मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त को होगी.

बलिया के रसड़ा थाने से जुड़ा है मामला

यह मामला बलिया जिले के रसड़ा थाने में तैनात कांस्टेबल संतोष कुमार से जुड़ा है. याचिकाकर्ता हरेंद्र यादव की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया कि रसड़ा थाने में तैनात सिपाही संतोष कुमार स्वयं ट्रांसपोर्ट का कारोबार चला रहा था और विभागीय अधिकारियों का उसे संरक्षण प्राप्त था.

याचिका में यह भी कहा गया कि कांस्टेबल ने अपने जनरल प्रोविडेंट फंड (GPF) खाते से धनराशि निकालकर याचिकाकर्ता हरेंद्र यादव के नाम पर एक ट्रक खरीदा था. साथ ही आरोप लगाया गया कि सहायक क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी (ARTO), बलिया ने मनमाने ढंग से उस ट्रक को ब्लैकलिस्ट कर दिया.

हाईकोर्ट ने जताई गंभीर चिंता

मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकलपीठ ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर चिंता व्यक्त की. कोर्ट ने कहा कि यदि पुलिसकर्मी स्वयं व्यावसायिक गतिविधियों में संलिप्त पाए जाते हैं और उन्हें विभागीय संरक्षण मिलता है, तो यह केवल सेवा नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि पुलिस विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार का गंभीर संकेत है. अदालत ने टिप्पणी की कि पुलिस का प्राथमिक दायित्व कानून-व्यवस्था बनाए रखना है, लेकिन यदि थाने ही व्यवसायिक गतिविधियों का केंद्र बन जाएं तो यह अत्यंत चिंताजनक स्थिति है.

DGP और गृह विभाग को जांच के निर्देश

हाईकोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP) और अपर मुख्य सचिव (गृह) को निर्देश दिया कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए. साथ ही अदालत ने कहा कि यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो रसड़ा थाने में तैनात संबंधित पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय एवं अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल संबंधित कांस्टेबल ही नहीं, बल्कि यदि अन्य अधिकारी भी मामले में संरक्षण देने या लापरवाही के दोषी पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाए.

10 दिन में हलफनामा दाखिल करने का आदेश

हाईकोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया है कि जांच पूरी कर 10 दिनों के भीतर अदालत में शपथपत्र (हलफनामा) दाखिल करें. हलफनामे में यह स्पष्ट किया जाए कि— मामले की जांच किस स्तर तक पहुंची? किन अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका सामने आई? उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई? भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए क्या कदम उठाए गए? मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त को निर्धारित की गई है.

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