2500 साल पहले के बनारसी क्या खाते थे? राजघाट में मिले कंकाल से खुलेगा राज, DNA जांच शुरू

करीब ढाई हजार साल पहले काशी में रहने वाले लोग क्या खाते थे? उनका गोत्र क्या था? वे यहीं के मूल निवासी थे या कहीं और से आकर बसे थे? इन सवालों के जवाब अब विज्ञान की मदद से तलाशे जाएंगे. BHU ने राजघाट से मिले लगभग 2500 साल पुराने मानव कंकाल का डीएनए और वैज्ञानिक परीक्षण शुरू कर दिया है.

काशी के 2500 साल पुराने कंकाल का DNA जांच शुरू

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) ने उस बनारसी को बॉक्स के बाहर ला दिया है, जो 2500 साल से अपनी पहचान बताने के लिए बेचैन है. राजघाट से मिले लगभग 2500 साल पुराने 5.3 फुट के मानव कंकाल का वैज्ञानिक परीक्षण शुरू हो गया है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह शोध गंगा घाटी के प्राचीन इतिहास से जुड़े कई अहम रहस्यों से पर्दा उठा सकता है.

यह कंकाल साल 1958 में राजघाट क्षेत्र में हुए पुरातात्विक उत्खनन के दौरान मिला था और तब से बीएचयू के पुरातत्व विभाग में सुरक्षित रखा है. बीएचयू के जीन वैज्ञानिक प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे और सेंटर फॉर डीएनए फिंगरप्रिंटिंग एंड डायग्नोस्टिक्स (सीडीएफडी), हैदराबाद के वैज्ञानिक डॉ. प्रज्वल प्रताप सिंह की टीम ने इसपर काम करना शुरू कर दिया है.

पुरातत्व, इतिहास और जेनेटिक्स के बीच का ब्रिज- VC

बीएचयू के वीसी प्रोफेसर अजित कुमार चतुर्वेदी ने रिसर्च की अनुमति दे दी है. उनका मानना है कि ‘राजघाट के इस कंकाल का अध्ययन पुरातत्व, इतिहास और जेनेटिक्स के बीच ब्रिज का काम करेगा.’ बीएचयू के पुरातत्व विभाग के एचओडी एमपी अहिरवार ने कहा कि यह कंकाल इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय को उजागर करने की क्षमता रखता है.

उन्होंने कहा कि इससे इस प्राचीन भारतीय सभ्यता के बारे में नई जानकारी प्राप्त होगी बल्कि यह भी स्पष्ट होगा कि उस समय के लोग किस प्रकार की जीवनशैली जीते थे. उनका मानना है कि ये कंकाल राखी गढ़ी में मिले कंकाल की ही तरह बेहद महत्वपूर्ण है. इस कंकाल से मिलने वाले तथ्य गंगा घाटी के इतिहास को बदल देने वाला साबित होगा.

2500 साल पहले कैसी थी सामाजिक-सांस्कृतिक संरचना

जीन वैज्ञानिक प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि कंकाल के डीएनए अध्ययन से यह भी स्पष्ट होगा कि उस समय की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना कैसी थी. बनारस के लोगों में खान पान कैसा था? जाति और गोत्र व्यवस्था किस तरह की थी? यह भी पता लगाने की कोशिश होगी कि वह काशी का मूल निवासी था या बाहर से आकर यहां बसा था.

हालांकि अभी ये जांच का विषय है कि कंकाल किसी मेल का है या फिर फीमेल का. लेकिन देख कर ये लग रहा है कि ये मेल स्केलेटॉन है. रिब्स जिस प्रकार से बिस्कुट की तरह से टूट रहे हैं उससे और कई अन्य विशेषताओं से ऐसा लग रहा है कि ये 2500 साल पुराना हो सकता है. प्रोफेसर ने बताया कि इस रिसर्च पर करीब तीन महीने का वक़्त लगेगा.

कैसे पता चलेगा खान-पान, जाति-गोत्र और निवास?

प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि हड्डियों और दांतों के डीएनए से यह पता लगाया जा सकेगा कि उस समय के लोग शाकाहारी थे या मांसाहारी, वे गेहूं, बाजरा या अन्य अनाज खाते थे और दूध पचाने की क्षमता रखते थे या नहीं. उनका कहना है कि ऑक्सीजन-कॉर्बन आइसोटोप एनालिसिस से ये संभव है. इससे खान-पान की शैली को समझने में मदद मिलेगी.

इसके अलावा डीएनए से उस व्यक्ति के गोत्र, आनुवंशिक पहचान और यह भी पता लगाने की कोशिश होगी. प्रोफेसर ने बताया इसके लिए आज के गोत्र के वाई क्रोमोसोम को इस कंकाल के वाई क्रोमोसोम से मैच कराएंगे. इसके अलावा, इंडिया का डीएनए से मैच कर पता लगाया जाएगा कि वह काशी का मूल निवासी था या बाहर से आकर यहां बसा था.

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