क्षेत्रीय अध्यक्ष के बाद अब जिलाध्यक्ष भी… वाराणसी में पटेल वोट बैंक को साधने में क्यों जुटी है बीजेपी?

बीजेपी ने वाराणसी में राम सकल पटेल को नया जिलाध्यक्ष बनाया है. प्रदेश और क्षेत्रीय अध्यक्ष के बाद अब जिलाध्यक्ष पद भी पटेल समुदाय को मिला है. बीजेपी पूर्वी यूपी में पटेल वोट बैंक को साधने में जुटी है. यह सपा के पीडीए फॉर्मूले की काट भी है, विशेषकर वाराणसी में, जहां कुर्मी मतदाता निर्णायक हैं.

पीएम मोदी के साथ राम सकल पटेल (फाइल फोटो)

बीजेपी ने कई महीनों के इंतज़ार के बाद वाराणसी में जिलाध्यक्ष की घोषणा कर दी है. वाराणसी में राम सकल पटेल को नया जिलाध्यक्ष बनाया गया है. पहले प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी, फिर काशी क्षेत्र के क्षेत्रीय अध्यक्ष दिलीप पटेल और अब राम सकल पटेल. ऐसे में ये सवाल उठना स्वाभाविक है कि पटेल समाज के प्रति बीजेपी का इतना लगाव क्यों है?

यह बीजेपी की ओर से 2024 लोकसभा चुनाव के परिणाम से सबक लेते हुए लिया गया फ़ैसला है या फिर समाजवादी पार्टी के पीडीए फॉर्मूले की काट के रूप में लिया गया एक रणनीतिक फैसला? माना जा रहा है कि बीजेपी पूर्वी यूपी में पटेल वोट बैंक को साधने में जुटी है. विशेषकर वाराणसी जैसे पटेल बाहुल्य क्षेत्रों में, जहां कुर्मी मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

BJP के नए जिलाध्यक्ष राम सकल पटेल कौन हैं?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र बनारस के नए जिलाध्यक्ष राम सकल पटेल सेवापुरी के मेहंदी गंज के रहने वाले हैं. वह जिला पंचायत चुनाव भी लड़ चुके हैं. करीब 50 साल के राम सकल पटेल की पहचान एक जमीनी कार्यकर्ता के रूप में है. सवाल है कि प्रदेश अध्यक्ष और क्षेत्रीय अध्यक्ष के बाद जिलाध्यक्ष का पद भी पटेल समाज को ही क्यों मिला है?

वरिष्ठ राजनैतिक विश्लेषक प्रोफेसर दीपक मल्लिक कहते हैं कि वाराणसी का ग्रामीण इलाका कुर्मी बाहुल्य है. वरुणा इस पार पिंडरा से शिवपुर तक और वरुणा उस पार राम नगर से सेवापुरी तक के इलाके कुर्मी बाहुल्य हैं. 2024 चुनाव में अगर कांग्रेस के अजय राय की बजाय सपा के सुरेन्द्र पटेल लड़े होते तो पीएम मोदी के जीत का अन्तर और कम हो जाता.

पूर्वांचल में लव-कुश इक्वेशन 14% के आसपास

वहीं, राजनैतिक विश्लेषक विजय नारायण ने भी कुर्मी और मौर्या वोटरों को लव-कुश इक्वेशन बताया है. उन्होंने कहा कि पूर्वांचल में कुर्मी मतदाताओं की संख्या करीब 8% है और इसमें मौर्या वोटरों को भी जोड़ लें तो ये लवकुश इक्वेशन 14% के आसपास पहुंच जाता है. यादव के बाद पटेल वोटर्स ओबीसी वोट बैंक का सबसे बड़ा चंक है.

बीजेपी की सबसे बड़ी चिंता पूर्वांचल में जातीय समीकरण साधने की है. क्योंकि बनारस में पीएम मोदी का जो वोट कम हुआ उसमें पटेल वोटरों की बड़ी भूमिका रही. पटेल वोटर्स कांग्रेस और सपा गठबंधन के साथ चले गए. बीजेपी की विधानसभा चुनाव में यह बड़ी चुनौती है. इसलिए कुर्मी वोटरों को सपा से वापस लाने की रणनीति पर बीजेपी काम कर रही है.

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