चुनाव लड़ना है तो संगठन छोड़ें… अखिलेश यादव ने टिकट के लिए क्यों रखी अनोखी शर्त?
अखिलेश यादव ने सपा नेताओं के लिए नई शर्त रखी है. 2027 चुनाव लड़ने के लिए संगठन पद से इस्तीफा दें... कई नेताओं ने इस पर अमल करते हुए चुनाव लड़ने के लिए संगठन से इस्तीफा भी दे दिया है. वहीं, राजनैतिक विश्लेषक इस फैसले को डिफेंसिव पॉलिटिक्स के तौर पर देख रहे हैं.
समाजवादी पार्टी के लिए 2027 का चुनाव ‘डू ओर डाई’ वाला है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव कोई भी पॉलिटिकल रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं. अखिलेश यादव का ताजा फैसला कम से कम इसी ओर इशारा कर रहा है. समाजवादी पार्टी ने संगठन से जुड़े नेताओं के लिए अब ये फरमान जारी किया है कि अगर चुनाव लड़ना है तो संगठन से इस्तीफा दीजिए.
इस फैसले पर पार्टी की तरफ से कोई भी खुलकर बोलने से बच रहा है. लेकिन सपा सूत्रों का दावा है कि अखिलेश यादव के इस फैसले से संगठन में मजबूती बनी रहेगी. क्योंकि संगठन में रहकर अगर नेता चुनाव लड़ते हैं तो जिले में संगठन कमजोर होगा. वहीं, अखिलेश यादव की इस स्ट्रेटेजी को राजनैतिक विश्लेषक डिफेंसिव पॉलिटिक्स के तौर पर देख रहे हैं.
कई जिलाध्यक्षों ने इस्तीफा भी देना शुरू कर दिया
सपा के कई नेताओं ने इस पर अमल करते हुए चुनाव लड़ने के लिए संगठन से इस्तीफा भी देना शुरू कर दिया है. रीबू श्रीवास्तव, मुनीन्द्र शुक्ला और बरेली के सपा अध्यक्ष शिवचरण कश्यप जैसे नेताओं ने चुनाव लड़ने के लिए संगठन से इस्तीफा भी दे दिया है. इस तरह मुजफ्फरपुर के जिला अध्यक्ष जिया चौधरी भी इस्तीफा देकर चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की.
बिठूर से टिकट की दावेदारी करने वाले मुनीन्द्र शुक्ला 18 साल तक ग्रामीण जिला की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं. लेकिन जब उनको चुनाव लड़ना है तो पहले उन्होंने जिलाध्यक्ष के पद से इस्तीफा दिया. समाजवादी महिला सभा की प्रदेश अध्यक्ष रहीं रीबू श्रीवास्तव ने भी अपना पद छोड़ दिया. उनको वाराणसी के कैंट से चुनाव लड़ना है. वह इसी सीट की प्रभारी भी हैं.
ऐसा एक छोटा प्रयोग लोकसभा चुनाव में भी किया
हालांकि, अखिलेश यादव ने ऐसा ही एक छोटा सा प्रयोग लोकसभा चुनाव में भी किया था. नरेश उत्तम पटेल को प्रदेश अध्यक्ष से इस्तीफा दिलवाकर लोकसभा का चुनाव लड़ाया था और वह फतेहपुर से सांसद बने. पूरा संगठन नरेश उत्तम पटेल को जिताने में लगा था. फतेहपुर के उस चुनावी मॉडल को अखिलेश विधानसभा चुनाव में बड़े पैमाने पर लेकर आ रहे हैं.
कुछ दिन पहले अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर एक बैठक की थी. इसमें सपा के जिलाध्यक्षों को चेतावनी दी थी कि वे किसी को टिकट दिलाने का ठेका न लें. अगर शिकायत मिली तो कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने यह भी कहा था कि कोई जिलाध्यक्ष चुनाव लड़ने का इच्छुक है तो वह पहले अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे और फिर इस बारे में बताए.
जिसने चुनाव लड़ने का मन बना लिया है वो लड़ेगा ही
वहीं, समाजवादी पार्टी की इस स्ट्रेटेजी को राजनैतिक विश्लेषक डिफेंसिव पॉलिटिक्स के तौर पर देख रहे हैं. वरिष्ठ पत्रकार और राजनैतिक विश्लेषक राजेंद्र कुमार ने कहा कि पूर्व के चुनावों से सबक लेते हुए अखिलेश यादव ने ये फ़ैसला लिया है. समाजवादी पार्टी को इससे लाभ तो होगा लेकिन इससे असंतोष खत्म हो जाएगा? ऐसा भी नही है.
उन्होंने कहा कि जो जिलाध्यक्ष या संगठन में कोई और नेता अगर चुनाव लड़ने का मन बना लिया है वो तो लड़ेगा ही. भले आप टिकट ना दें वो दूसरे विकल्पों पर विचार करेगा लेकिन लड़ेगा. इसमें एक खतरा ये भी है कि अगर कोई जिलाध्यक्ष पद छोड़कर चुनाव लड़ता है और हार जाता है तो फिर दोनों जगह से गया. लेकिन अखिलेश की इस रणनीति से लाभ तो मिलेगा ही.
2027 चुनाव की तैयारी के लिए सपा का एजेंडा साफ
राजेंद्र कुमार कहते हैं कि ज्यादातर जिलाध्यक्ष टिकट दिलाने के जुगत को लेकर गुणा गणित में लगे रहते हैं. स्थानीय सांसद से लेकर प्रदेश कार्यकारिणी तक के नेताओं को सेट करने में लगे रहते हैं. ऐसे नेताओं पर इस फैसले से लगाम लगेगी. इस फैसले का दूसरा बड़ा कारण कांग्रेस को संदेश देना है कि हमारी तैयारी शुरू है और एक-एक सीट को लेकर हम गंभीर हैं.
उन्होंने कहा कि आगे चलकर अगर कांग्रेस और सपा में कोई गठबंधन होता भी है तो अखिलेश के इस फैसले का असर गठबंधन पर भी दिखेगा. कुल मिलाकर देखा जाएं तो सपा ने 2027 की तैयारी के लिए अपना एजेंडा साफ कर दिया है. पार्टी और संगठन में जो लोग पदाधिकारी हैं और चुनाव भी लड़ना चाहते हैं. उनको पहले इस्तीफा देना होगा..
